हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार , हज़रत सैय्यदुश्शोहदा इमाम हुसैन (अ.स.) और उनके वफ़ादार साथियों के अरबईन के ग़म में मरहूम आयतुल्लाहिल उज़्मा लुत्फ़ुल्लाह साफ़ी गुलपायगानी की एक भावपूर्ण और मार्मिक नज़्म प्रस्तुत है।
अरबईन-ए-शहीदान
अरबईन का दिन है और शहीदाने कर्बला के ग़म में दिल ख़ून के आँसू रो रहा है। जिसे भी देखता हूँ, वह शोक और उदासी में डूबा हुआ दिखाई देता है।
ऐसा प्रतीत होता है मानो हज़रत ज़ैनब (स.अ.) शाम-ए-बला से लौटकर आई हों, या हज़रत रबाब (स.अ.) अपने मासूम बेटे हज़रत अली असग़र (अ.) के ग़म में व्यथित खड़ी हों।
मानो हज़रत लैला (स.अ.) अपने पुत्र की क़ब्र पर आई हों और उनकी अश्रुपूर्ण आँखों से जयहून नदी की तरह आँसू बह रहे हों।
या यह हज़रत क़ासिम (अ.स.) की माँ हैं, जो अपने अरमानों से भरे युवा पुत्र के सुंदर चेहरे और सुडौल व्यक्तित्व को याद कर विलाप कर रही हैं।
कूफ़ा से लेकर शाम तक, यज़ीद के अत्याचारों के दौर में किसी ने इमाम सज्जाद (अ.स.) से यह नहीं पूछा कि उन पर क्या बीती।
शेर-ए-ख़ुदा हज़रत अली (अ.स.) की बेटी और आल-ए-रसूल (स.) की प्रवक्ता हज़रत ज़ैनब (स.अ.) ने ऐसे रौब और शान के साथ सत्य का ऐलान किया कि कुफ्र और अत्याचार की बुनियादें हिल गईं।
उन्होंने ऐसा ऐतिहासिक ख़ुत्बा दिया जिसने सिद्ध कर दिया कि यज़ीद दीन-ए-ख़ुदा से बाहर था।
दीन-ए-इस्लाम, इमाम हुसैन (अ.स.) के संकल्प, त्याग और बलिदान की बदौलत आज भी जीवित है। सत्य, स्वतंत्रता और इस्लाम उनके एहसानमंद हैं।
आओ, देखो! अल्लाह की राह में जंग का मैदान शहीदों के पवित्र रक्त से एक गुलशन बन गया है।
हाय अफ़सोस! प्यासे होंठों वाले इमाम को शहीद कर दिया गया और उनके पवित्र शरीर पर असंख्य घाव लगाए गए।
कर्बला की दास्तान धैर्य, संघर्ष, त्याग, बलिदान और दीन की बुलंदी की अमर गाथा है।
इतिहास में हुसैन इब्ने अली (अ.स.) का नाम सदैव सत्य पर अडिग रहने और ईश्वरीय सहायता के प्रतीक के रूप में जीवित रहेगा।
हिज़्बुल्लाह और अल्लाह के सहायकों का सम्मान सदैव कायम रहेगा, जबकि असत्य के सभी शिविर और उसके समर्थक अंततः पराजित होंगे।
जो व्यक्ति पूरे ख़ुलूस के साथ विलायत के मज़बूत क़िले में प्रवेश करता है, वह जहन्नम की आग, भय और हर प्रकार के ख़तरे से सुरक्षित रहता है।
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