हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार, बनारस के नायब ए इमामे जुमा मौलाना अमीन हैदर हुसैनी की इक्तिदा में जुमे की नमाज़ अदा की गई। खुत्बा-ए-जुमा में उन्होंने क़ुरआन की आयत “وَلِبَاسُ التَّقْوَىٰ ذَٰلِكَ خَيْرٌ” का उल्लेख करते हुए कहा कि परवरदिगार-ए-आलम ने तक़वा को इंसान के लिए सबसे बेहतरीन लिबास बताया है।
उन्होंने कहा कि इंसान लिबास का इस्तेमाल अपनी ज़ीनत के लिए करता है और यह उसके शरीर की कमियों को भी ढकता है। इसी तरह तक़वा इंसान के अंदर मौजूद बुराइयों से उसकी हिफ़ाज़त करता है और उसे नैतिक तथा आध्यात्मिक रूप से सुसज्जित करता है। अल्लाह चाहता है कि इंसान बुराइयों से दूर रहे, इज़्ज़त और कामयाबी हासिल करे और जन्नत की राह पर चले।
मौलाना अमीन हैदर हुसैनी ने कहा कि हमारा दीन और शरीअत समाज को हर प्रकार की बुराई से पाक रखना चाहते हैं। चाहे मामला पारिवारिक हो, सामाजिक हो या व्यक्तिगत, इस्लाम ने हर क्षेत्र के लिए मार्गदर्शन प्रदान किया है। क़ुरआन और अहले बैत (अ) की शिक्षाओं का पालन ही इंसान को दुनिया और आख़िरत में कामयाबी की ओर ले जाता है।
उन्होंने इमाम मुहम्मद बाक़िर (अ) की एक रिवायत का हवाला देते हुए कहा कि अल्लाह उस व्यक्ति पर रहमत करे जो अपने दो दोस्तों के बीच मोहब्बत पैदा करे। उन्होंने कहा कि इस शिक्षा से स्पष्ट होता है कि हमें लोगों के बीच दुश्मनी और मतभेद पैदा करने के बजाय मोहब्बत और उल्फ़त पैदा करने की कोशिश करनी चाहिए।
बनारस के नायब इमामे जुमा ने कहा कि पति-पत्नी, भाई-भाई, भाई-बहन, माता-पिता और बच्चों या दो मोमिनों के बीच किसी को भी मतभेद पैदा करने का अधिकार नहीं है। आज समाज में यह एक कड़वी सच्चाई है कि छोटी-छोटी बातों को लेकर परिवारों और लोगों के बीच दूरियां पैदा हो जाती हैं। ऐसे मामलों में इंसान को सूझबूझ और अक़्ल से काम लेना चाहिए।
उन्होंने कहा कि यदि किसी विवाद की स्थिति में एक पक्ष खामोशी और धैर्य से काम ले तो कई बार मामला वहीं समाप्त हो जाता है। इंसान को यह देखने की कोशिश करनी चाहिए कि किस तरह परिवार और रिश्तों को बचाया जा सकता है। कभी-कभी अपनी गलती न होने के बावजूद खामोश रहना और अच्छे व्यवहार का प्रदर्शन करना परिवार को टूटने से बचा सकता है।
मौलाना अमीन हैदर हुसैनी ने कहा कि इस्लाम इंसान को केवल अपने लिए सोचने की शिक्षा नहीं देता, बल्कि दूसरों और पूरे समाज की भलाई का भी ध्यान रखने की ताकीद करता है। जब समाज के लोग एक-दूसरे का ख्याल रखते हैं और भलाई के कामों में आगे बढ़ते हैं तो समाज में शांति पैदा होती है और आपसी संबंध मजबूत होते हैं।
उन्होंने इमाम-ए-जमाना (अ) से मंसूब रिवायत का उल्लेख करते हुए कहा कि अगर इस्तिग़फ़ार न होता तो ज़मीन पर रहने वाले लोग हलाक हो जाते। इसलिए इंसान को अपने साथ-साथ दूसरों के लिए भी इस्तिग़फ़ार करना चाहिए और दूसरों की भलाई के लिए भी प्रयास करना चाहिए।
बनारस के नायब इमामे जुमा मौलाना अमीन हैदर हुसैनी ने कहा कि केवल क़ुरआन सुन लेना या पढ़ लेना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसके संदेश को समझना और उस पर अमल करना ज़रूरी है। क़ुरआन हिदायत के लिए नाज़िल हुआ है और इसका उद्देश्य इंसान को सही रास्ता दिखाना, उसे नेक बनाना तथा अच्छे अख़लाक़ से सुसज्जित करना है।
उन्होंने अमीरुल मोमेनीन हज़रत अली (अ) की शिक्षा का हवाला देते हुए कहा कि जिस क़ुरआन की तिलावत में तदब्बुर, ग़ौर और फ़िक्र न हो, उसका वास्तविक उद्देश्य पूरा नहीं होता। इसलिए हमें क़ुरआन को पढ़ने के साथ-साथ उसके अर्थ और संदेश को समझना तथा अपनी ज़िंदगी में लागू करना चाहिए।
बनारस के खतीब-ए-जुमा ने स्वयं को और मोमिनों को तक़वा-ए-इलाही की दावत देते हुए कहा कि तक़वा इंसान को हर क्षेत्र में कामयाबी और कामरानी प्रदान करता है। अल्लाह के नज़दीक इंसान की इज़्ज़त और करामत का आधार उसका तक़वा है। मुत्तक़ी और परहेज़गार इंसान के अंदर एक ऐसी मानवीय शक्ति पैदा होती है जो उसे मुश्किल परिस्थितियों में भी डटे रहने का हौसला देती है।
उन्होंने कहा कि जिस व्यक्ति का संबंध अल्लाह से मजबूत होता है, वह दुनिया की भौतिक शक्तियों से भयभीत नहीं होता, क्योंकि वह जानता है कि वास्तविक शक्ति केवल अल्लाह के पास है। क़ुरआन में पिछले लोगों और उम्मतों के अनेक वाक़िआत मौजूद हैं जिनसे इंसान को सबक लेना चाहिए।
मौलाना अमीन हैदर हुसैनी ने काबा पर हमला करने के लिए अबरहा के विशाल लश्कर के आने और अल्लाह की ओर से अबाबील पक्षियों के ज़रिए उस लश्कर को तबाह किए जाने के वाक़िये का उल्लेख करते हुए कहा कि इससे यह संदेश मिलता है कि जब इंसान अल्लाह पर भरोसा रखता है और उसके अंदर तक़वा व ईमान होता है तो उसे किसी भी शक्ति से भयभीत होने की आवश्यकता नहीं होती।
बनारस की शिया मरकज़ी जामा मस्जिद के नायब इमामे जुमा ने कहा कि हमें अपनी ज़िंदगी में क़ुरआन और अहले बैत (अ) की शिक्षाओं को केवल सुनने तक सीमित नहीं रखना चाहिए, बल्कि उन पर अमल करना चाहिए। वास्तविक कामयाबी आख़िरत की कामयाबी है और जो व्यक्ति क़ुरआन तथा अहले बैत (अ) से मज़बूती के साथ जुड़ा रहेगा, वह दुनिया और आख़िरत दोनों में कामयाबी हासिल करेगा।
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