मंगलवार 11 अगस्त 2026 - 16:27
28 सफ़र की रात और दिन के आमाल; पैग़म्बरे इस्लाम और इमाम हसनؑ की ज़ियारत का तरीका

धार्मिक स्रोतों में 28 सफ़र के दिन आध्यात्मिक लाभ प्राप्त करने के लिए कुछ आमाल और आदाब बताए गए हैं। इनमें ग़ुस्ल, रोज़ा और «या शदीदल-क़ुवा» दुआ पढ़ने से लेकर पैग़म्बरे इस्लाम की ज़ियारत, नमाज़-ए-ज़ियारत अदा करना और दूर से इमाम हसन मुज्तबाؑ की ज़ियारत करना शामिल है।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, शिया मुसलमानों के कैलेंडर में 28 सफ़र पैग़म्बरे इस्लाम की रेहलत और इमाम हसन मुज्तबाؑ की शहादत की वर्षगांठ के साथ आता है। इबादत से संबंधित स्रोतों में इस दिन ग़ुस्ल, रोज़ा, दुआ, पैग़म्बरे इस्लाम की ज़ियारत, नमाज़-ए-ज़ियारत और इमाम हसनؑ की ज़ियारत जैसे आमाल बताए गए हैं।

आगे 28 सफ़र के आमाल और «मफ़ातीहुल जिनान» नामक पुस्तक में शेख़ अब्बास क़ुम्मी द्वारा इस दिन के बारे में बताए गए आमाल का उल्लेख किया जा रहा है।

  1. ग़ुस्ल करना

28 सफ़र के आमाल में से एक पैग़म्बरे इस्लाम की ज़ियारत पढ़ना है। इसलिए ज़ियारत पढ़ने से पहले ग़ुस्ल करना मुस्तहब है।

  1. रोज़ा रखना

महीने के आरंभ, मध्य और अंतिम दिनों में रोज़ा रखने की सिफ़ारिश की गई है। इसी कारण 28 सफ़र, जो सफ़र महीने के अंतिम दिनों में से है, इस दिन रोज़ा रखने का विशेष महत्व है।

  1. 10 बार «या शदीदल-क़ुवा व या शदीदल-मिहाल» दुआ पढ़ना

ऐ अत्यंत शक्तिशाली और ऐ कठोर दंड देने वाले! ऐ अज़ीज़, ऐ अज़ीज़, ऐ अज़ीज़! तेरी महानता के सामने तेरी सारी मख़लूक़ ज़लील है। अतः अपनी मख़लूक़ के बुरे लोगों के शर से मेरी रक्षा कर।

ऐ उपकार करने वाले! ऐ सुंदरता प्रदान करने वाले! ऐ नेमत देने वाले! ऐ कृपा करने वाले! तेरे अलावा कोई पूज्य नहीं है। तू पाक है। निस्संदेह मैं ज़ालिमों में से था।

फिर हमने उसकी दुआ स्वीकार की और उसे ग़म से निजात दी और इसी प्रकार हम मोमिनों को भी निजात देते हैं। और अल्लाह मुहम्मद और उनके पाक व पवित्र वंश पर दुरूद भेजे।

  1. दूर से पैग़म्बरे इस्लाम की ज़ियारत पढ़ना

शेख़ मुफ़ीद, शहीद और सैयद इब्ने ताऊस (र) ने कहा है कि यदि आप मदीना के अलावा किसी अन्य स्थान से पैग़म्बरे इस्लामؐ की ज़ियारत करना चाहते हैं, तो पहले ग़ुस्ल करें और उसके बाद उनकी ज़ियारत पढ़ें।

हज़रत रसूलुल्लाह की ज़ियारत और उसका अनुवाद:

اَلسَّلامُ عَلَیک یا رَسُولَ

सलाम हो आप पर, ऐ अल्लाह के रसूल!

اللّهِ اَلسَّلامُ عَلَیک یا نَبِی اللّهِ اَلسَّلامُ عَلَیک یا مُحَمَّدَُ بْنَ عَبْدِ اللّهِ

सलाम हो आप पर, ऐ अल्लाह के नबी! सलाम हो आप पर, ऐ मुहम्मद बिन अब्दुल्लाह!

اَلسَّلامُ عَلَیک یا خاتَِمَ النَّبِیینَ اَشْهَدُ اَنَّک قَدْ بَلَّغْتَ الرِّسالَةَ وَاَقَمْتَ

सलाम हो आप पर, ऐ अंतिम पैग़म्बरों के पैग़म्बर! मैं गवाही देता हूं कि आपने पैग़ाम पहुंचाया और नमाज़ स्थापित की।

الصَّلوةَ وَ اتَیتَ الزَّکوةَ وَاَمَرْتَ بِالْمَعْرُوفِ وَنَهَیتَ عَنِ الْمُنْکرِ

आपने ज़कात अदा की, नेकी का आदेश दिया और बुराई से रोका।

وَعَبَدْتَ اللّهَ مُخْلِصاً حَتّی اَتیک الْیقینُ فَصَلَواتُ اللّهِ عَلَیک وَرَحْمَتُهُ

और आपने पूरी निष्ठा के साथ अल्लाह की इबादत की, यहां तक कि यक़ीन अर्थात मृत्यु आपके पास आ गई। अतः अल्लाह की ओर से आप पर दुरूद और उसकी रहमत हो।

وَعَلی اَهْلِ بَیتِک الطّاهِرینَ

और आपके पाक परिवार पर भी।

اَشْهَدُ اَنْ لا اِلهَ اِلا اللّهُ وَحْدَهُ لا شَریک لَهُ

मैं गवाही देता हूं कि अल्लाह के अलावा कोई पूज्य नहीं है। वह अकेला है और उसका कोई साझीदार नहीं।

وَاَشْهَدُ اَنَّ مُحَمَّداً عَبْدُهُ وَرَسُولُهُ وَاَشْهَدُ اَنَّک رَسُولُ اللّهِ وَاَنَّک

और मैं गवाही देता हूं कि मुहम्मद उसके बंदे और उसके रसूल हैं। और मैं गवाही देता हूं कि आप अल्लाह के रसूल हैं और आप मुहम्मद बिन अब्दुल्लाह हैं।

مُحَمَّدُ بْنُ عَبْدِاللّهِ وَاَشْهَدُ اَنَّک قَدْ بَلَّغْتَ رِسالاتِ رَبِّک وَنَصَحْتَ

तुम मुहम्मद बिन अब्दुल्लाह हो और मैं गवाही देता हूं कि तुमने अपने पालनहार के संदेश पहुंचाए और अपनी उम्मत की भलाई चाही।

لاُِمَّتِک وَجاهَدْتَ فی سَبیلِ اللّهِ وَعَبَدْتَ اللّهَ حَتّی اَتیک الْیقینُ

और तुमने अल्लाह के मार्ग में संघर्ष किया तथा अल्लाह की इबादत की, यहां तक कि तुम्हारी मृत्यु का समय आ गया।

بِالْحِکمَةِ وَالْمَوْعِظَةِ الْحَسَنَةِ وَاَدَّیتَ الَّذی عَلَیک مِنَ الْحَقِّ وَاَنَّک

हिकमत और अच्छी नसीहत के माध्यम से तुमने वह अधिकार अदा किया जो तुम पर था

قَدْ رَؤُفْتَ بِالْمُؤْمِنینَ وَغَلُظْتَ عَلَی الْکافِرینَ فَبَلَّغَ اللّهُ بِک اَفْضَلَ

और निस्संदेह तुम मोमिनों के प्रति अत्यंत दयालु तथा काफ़िरों के प्रति सख़्त थे। अतः अल्लाह ने तुम्हें सम्मानित लोगों के सबसे श्रेष्ठ स्थान तक पहुंचाया।

شَرَفِ مَحَلِّ الْمُکرَّمینَ اَلْحَمْدُ لِلّهِ الَّذی اِسْتَنْقَذَنا بِک مِنَ الشِّرْک

सारी प्रशंसा उस अल्लाह के लिए है, जिसने तुम्हारे माध्यम से हमें शिर्क और गुमराही से बचाया।

وَالضَّلالَةِ اَللّهُمَّ فَاجْعَلْ صَلَواتِک وَصَلَواتِ مَلاَّئِکتِک الْمُقَرَّبینَ

ऐ अल्लाह! अपने दुरूद, अपने निकटस्थ फ़रिश्तों के दुरूद,

وَاَنْبِیاَّئِک الْمُرْسَلینَ وَعِبادِک الصّالِحینَ وَاَهْلِ السَّمواتِ

अपने भेजे हुए पैग़म्बरों, अपने नेक बंदों और आसमानों तथा ज़मीनों के निवासियों

وَالاْرَضینَ وَمَنْ سَبَّحَ لَک یا رَبَّ الْعالَمینَ مِنَ الاْوَّلینَ وَالاْ خِرینَ

और उन सभी लोगों के दुरूद को, जो पहले और बाद के लोगों में, ऐ संसारों के पालनहार, तेरी तस्बीह करते हैं—

عَلی مُحَمَّدٍ عَبْدِک وَرَسُولِک وَنَبِیک وَاَمینِک وَنَجِیک وَحَبیبِک

अपने बंदे, अपने रसूल, अपने नबी, अपने अमानतदार, अपने राज़दार, अपने प्रिय,

وَصَفِیک وَخآصَّتِک وَ صَفْوَتِک وَخِیرَتِک مِنْ خَلْقِک اَللّهُمَّ اَعْطِهِ

अपने विशेष बंदे, अपने चुने हुए और अपनी मख़लूक़ में अपने सर्वश्रेष्ठ बंदे मुहम्मद पर भेज।

الدَّرَجَةَ الرَّفیعَةَ وَ اتِهِ الْوَسیلَةَ مِنَ الْجَّنَةِ وَابْعَثْهُ مَقاماً مَحْمُوداً

ऐ अल्लाह! उन्हें ऊंचा दर्जा प्रदान कर, उन्हें जन्नत में वसीला प्रदान कर और उन्हें उस प्रशंसित मकाम पर पहुंचा,

یغْبِطُهُ بِهِ الاْوَّلُونَ وَالاْ خِرُونَ اَللّهُمَّ اِنَّک قُلْتَ وَلَوْ اَنَّهُمْ اِذْ ظَلَمُوا

जिससे पहले और बाद के सभी लोग ईर्ष्या करें। ऐ अल्लाह! तूने कहा है: «और यदि वे लोग, जब उन्होंने अपने ऊपर अत्याचार किया था, तुम्हारे पास आते और अल्लाह से क्षमा मांगते तथा रसूल भी उनके लिए क्षमा मांगते, तो वे निश्चित रूप से अल्लाह को बहुत तौबा स्वीकार करने वाला और अत्यंत दयावान पाते।»

اَنْفُسَهُمْ جآؤُک فَاسْتَغْفَرُوا اللّهَ وَاسْتَغْفَرَ لَهُمُ الرَّسُولُ لَوَجَدُوا اللّهَ

और मैं अपने गुनाहों की क्षमा मांगते हुए और उनसे तौबा करते हुए तुम्हारे पास आया हूं। और मैं तुम्हारे माध्यम से अपने पालनहार और तुम्हारे पालनहार अल्लाह की ओर रुख करता हूं,

تَوّاباً رَحیماً وَاِنّی اَتَیتُک مُسْتَغْفِرًا تآئِباً مِنْ ذُنُوبی وَاِنّی اَتَوَجَّهُ بِک

बहुत तौबा स्वीकार करने वाला और अत्यंत दयावान है। और मैं अपने गुनाहों की क्षमा मांगते हुए तेरी बारगाह में आया हूं और अपने गुनाहों से तौबा की है।और मैं तुम्हारे माध्यम से उस अल्लाह की ओर रुख करता हूं,

اِلَی اللّهِ رَبّی وَرَبِّک لِیغْفِرَ لی ذُنُوبی

जो मेरा और तुम्हारा पालनहार है, ताकि वह मेरे गुनाहों को क्षमा कर दे।

  1. नमाज़ पढ़ना

इसके बाद चार रकअत नमाज़-ए-ज़ियारत पढ़ें और हर रकअत में अपनी पसंद की कोई भी सूरह पढ़ें। हर दो रकअत के बाद सलाम फेरें और नमाज़ पूरी करने के बाद हज़रत फ़ातिमा ज़हरा की तस्बीह पढ़ें।

दूर से इमाम हसन मुज्तबा की ज़ियारत पढ़ना

اَلسَّلامُ عَلَیْکَ یَا بْنَ رَسُولِ رَبِّ الْعالَمینَ

सलाम हो आप पर, ऐ संसारों के पालनहार के रसूल के पुत्र!

اَلسَّلامُ عَلَیْکَ یَا بْنَ اَمیرِ الْمُؤْمِنینَ اَلسَّلامُ عَلَیْکَ یَا بْنَ فاطِمَةَ الزَّهْراَّءِ

सलाम हो आप पर, ऐ अमीरुल मोमिनीन के पुत्र! सलाम हो आप पर, ऐ फ़ातिमा ज़हरा के पुत्र!

اَلسَّلامُ عَلَیْکَ یا حَبیبَ اللّهِ اَلسَّلامُ عَلَیْکَ یا صِفْوَةَ اللّهِ

सलाम हो आप पर, ऐ अल्लाह के प्रिय! सलाम हो आप पर, ऐ अल्लाह के विशेष रूप से चुने हुए बंदे!

اَلسَّلامُ عَلَیْکَ یا اَمینَ اللّهِ اَلسَّلامُ عَلَیْکَ یا حُجَّةَ اللّهِ اَلسَّلامُ عَلَیْکَ یا نُورَ اللّهِ

सलाम हो आप पर, ऐ अल्लाह के अमानतदार! सलाम हो आप पर, ऐ अल्लाह की हुज्जत! सलाम हो आप पर, ऐ अल्लाह के नूर!

السَّلامُ عَلَیْکَ یا صِراطَ اللّهِ اَلسَّلامُ عَلَیْکَ یا بَیانَ حُکْمِ اللّهِ

सलाम हो आप पर, ऐ अल्लाह के सीधे मार्ग! सलाम हो आप पर, ऐ अल्लाह के आदेश को बयान करने वाले!

اَلسَّلامُ عَلَیْکَ یا ناصِرَ دینِ اللّهِ اَلسَّلامُ عَلَیْکَ اَیُّهَا السَّیِدُ الزَّکِیُّ

सलाम हो आप पर, ऐ अल्लाह के धर्म के सहायक! सलाम हो आप पर, ऐ पाक और पवित्र स्वामी!

اَلسَّلامُ عَلَیْکَ اَیُّهَا الْبَرُّ الْوَفِیُّ اَلسَّلامُ عَلَیْکَ اَیُّهَا الْقاَّئِمُ الاْمینُ

सलाम हो आप पर, ऐ नेक और वफ़ादार! सलाम हो आप पर, ऐ अल्लाह के आदेश के लिए क़ायम रहने वाले और अमानतदार!

اَلسَّلامُ عَلَیْکَ اَیُّهَا الْعالِمُ بِالتَّأویلِ اَلسَّلامُ عَلَیْکَ اَیُّهَا الْهادِی الْمَهْدِیُّ

सलाम हो आप पर, ऐ क़ुरआन के अर्थों के ज्ञाता! सलाम हो आप पर, ऐ मार्गदर्शन करने वाले और स्वयं मार्गदर्शित!

اَلسَّلامُ عَلَیْکَ اَیُّهَا الطّاهِرُ الزَّکِیُّ اَلسَّلامُ عَلَیْکَ اَیُّهَا التَّقِیُّ النَّقِیُّ

सलाम हो आप पर, ऐ पाक और पवित्र! सलाम हो आप पर, ऐ परहेज़गार और निष्कलंक!

السَّلامُ عَلَیْکَ اَیُّهَا الْحَقُّ الْحَقیقُ اَلسَّلامُ عَلَیْکَ اَیُّهَا الشَّهیدُ الصِّدّیقُ

सलाम हो आप पर, ऐ सच्चा और सत्य के योग्य! सलाम हो आप पर, ऐ सच्चे शहीद!

اَلسَّلامُ عَلَیْکَ یا اَبا مُحَمَّدٍ الْحَسَنَ بْنَ عَلِی وَ رَحْمَةُ اللّهِ وَ بَرَکاتُهُ

सलाम हो आप पर, ऐ अबू मुहम्मद हसन बिन अली! और अल्लाह की रहमत और उसकी बरकतें आप पर हों।

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