हौज़ा न्यूज़ एजेंसी | हाल ही में बारहवीं सरकार के प्रमुख ने अपने कार्यकाल के मंत्रियों और राज्यपालों की एक बैठक में पैगंबर-ए-अकरम (स) के जीवन और शासन की शैली को आदर्श बनाने की आवश्यकता पर जोर देते हुए कुछ विचारणीय बातें कहीं। उन्होंने कहा कि पैगंबर (स) की सरकार की बुनियाद “समझौते” पर आधारित थी। उन्होंने “पहली और दूसरी अक़बा” की घटनाओं का हवाला दिया और “बैअत” का नाम बदलकर “समझौता” बताते हुए बातचीत, समझौते और विरोधी पक्षों, यहां तक कि शक्तिशाली और दबंग दुश्मनों के साथ नरमी को सही ठहराने के लिए ऐतिहासिक आधार पेश करने की कोशिश की। उन्होंने अपने आलोचकों की ओर इशारा करते हुए कहा, “ऐसा लगता है कि कुछ लोगों को समझौते पसंद नहीं हैं... अगर सामने वाला शक्तिशाली और दबंग हो तो क्या करें? आखिर कब तक इसे जारी रखा जाए?”
इस तरह इस्लामी इतिहास को देखने के लिए गहराई से जांच और वैज्ञानिक जवाब की जरूरत है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि “इतिहास से प्रमाण लेने” और “राजनीतिक उद्देश्यों के लिए इतिहास को बदलने” के बीच अंतर कहां है।
पहला भाग: ऐतिहासिक समीक्षा — बैअत और बातचीत में अंतर
इस विश्लेषण की पहली और सबसे बड़ी गलती शब्दों को जानबूझकर या अनजाने में बदलना है। यह हैरानी की बात है कि “बैअत” नाम और स्पष्ट स्वरूप वाली एक घटना, जिसका अर्थ निष्ठा और आज्ञापालन की प्रतिज्ञा है, उसे आज के अर्थ में राजनीतिक बातचीत के समझौते के रूप में पेश किया जा रहा है।
हिजरत से पहले इस्लाम के बारहवें वर्ष में औस और ख़ज़रज कबीले के कुछ लोग मक्का आए। उन्होंने इस्लाम स्वीकार किया, पैगंबर (स) से बैअत की और पूरी निष्ठा के साथ उनकी रक्षा करने का वचन दिया। यही कारण है कि सभी इतिहासकार और इस्लामी विद्वान इस घटना को “बैअते अक़बा” के नाम से याद करते हैं।
इस घटना में किसी भी प्रकार की सामान्य राजनीतिक बातचीत नहीं हुई थी। कूटनीतिक अर्थ में बातचीत में सौदेबाजी, रियायत देना या दुश्मन के साथ विवाद समाप्त करने के लिए बातचीत करना शामिल होता है। इसलिए बैअते अक़बा को अमेरिका जैसे दबंग दुश्मनों के साथ राजनीतिक समझौतों और लेन-देन के लिए आदर्श नहीं बनाया जा सकता।
दूसरा भाग: वक्ता की बात की समीक्षा — अनदेखी या अपने हित के अनुसार इतिहास की व्याख्या?
इस तरह के कमजोर तर्क किसी धार्मिक विद्वान की ओर से दिए जाने के दो ही कारण हो सकते हैं:
पहला यह कि कई दशकों तक प्रशासनिक और राजनीतिक मामलों में व्यस्त रहने के कारण वे शैक्षिक और ऐतिहासिक चर्चाओं से दूर हो गए हैं और अब उन्हें इन विषयों की सही जानकारी याद नहीं है। यह कुछ वैसा ही है जैसे कोई विशेषज्ञ वर्षों तक अपने पेशे से दूर रहने के कारण अपनी पेशेवर योग्यता खो दे।
दूसरा कारण, जो अधिक चिंता का विषय है, यह हो सकता है कि वे “अक़बा में विश्वासियों की बैअत” और “किसी अत्याचारी सरकार के साथ समझौते” के बीच मौजूद गहरे अंतर को अच्छी तरह जानते हैं, लेकिन अपने राजनीतिक उद्देश्यों और अपने पिछले रास्ते को सही ठहराने के लिए इतिहास की अपनी सुविधा के अनुसार व्याख्या करने को तैयार हैं।
तीसरा भाग: तर्क को पूरा करना — हुदैबिया की संधि और समझौता तोड़ने वालों का मामला
अगर हम उनकी अधूरी दलील को आगे बढ़ाने की कोशिश करें, तो कहना होगा कि बातचीत को सही ठहराने के लिए “सुल्हे हुदैबिया” का हवाला देना, जैसा कि कुछ अन्य राजनीतिक लोगों ने भी किया है, ऐतिहासिक दृष्टि से अधिक उचित होता। हम भी मानते हैं कि कुछ विशेष परिस्थितियों में दुश्मन के साथ समझौता या शांति संधि करना संभव है। पैगंबर-ए-इस्लाम (स) ने भी हुदैबिया में कुछ विशेष हितों और परिस्थितियों को देखते हुए शांति समझौता किया था। लेकिन इन लोगों के विश्लेषण में असली मुद्दा और छूटा हुआ महत्वपूर्ण पहलू कुछ और है।
वह स्वयं स्वीकार करते हैं कि हमारा सामना एक दबंग, अत्याचारी और “समझौता तोड़ने वाले” दुश्मन से है। मूल सवाल यह है कि यदि दुश्मन समझौता तोड़ दे तो पैगंबर (स) का उसके साथ व्यवहार का तरीका क्या था? इतिहास का यही वह हिस्सा है जिसे यह राजनीतिक धारा दोबारा पढ़ने में रुचि नहीं रखती।
निष्कर्ष: दबंग और समझौता तोड़ने वाले दुश्मन के सामने पैगंबर (स) की वास्तविक परंपरा
समझौता तोड़ने वाले दुश्मन के सामने पैगंबर-ए-इस्लाम (स) की नीति हमेशा स्पष्ट और दृढ़ रही है। हुदैबिया की संधि के दौरान जब मक्का के कुरैश ने समझौता तोड़ दिया, तो पैगंबर (स) ने दोबारा बातचीत की मेज पर लौटने की कोशिश नहीं की, बल्कि उन्होंने इस समझौता तोड़ने की कार्रवाई के सामने दृढ़ता से रुख अपनाया और इसका परिणाम मक्का की विजय के रूप में सामने आया। खास बात यह है कि बाद में कुरैश के नेताओं की विनती और अनुरोध के बावजूद पैगंबर (स) उस टूटे हुए समझौते पर दोबारा वापस नहीं लौटे। दुर्भाग्य से हुदैबिया की संधि का यह महत्वपूर्ण पहलू इन लोगों के भाषणों में हमेशा छिपा दिया जाता है।
सच्चाई यह है कि आज हम “समझौता लिखने और उस पर हस्ताक्षर करने” के चरण में नहीं हैं कि बार-बार बैअते अक़बा या हुदैबिया की संधि की बात करें। बल्कि हम उस चरण में हैं, जब दबंग दुश्मन पहले ही समझौता तोड़ चुका है। आज पैगंबर (स) के वास्तविक आदर्श का पालन करने का अर्थ इस्लामी सम्मान और पहचान की रक्षा करना तथा आक्रमणकारी के सामने दृढ़ता से खड़े रहना है।
इसी वास्तविक परंपरा को समझकर ही हम “रबीअ” यानी विजय की बहार की ओर आगे बढ़ सकते हैं। अन्यथा, निष्क्रियता और टूटे हुए वादों पर भरोसा करते रहने के कारण देश के सामने कठिन पतझड़ और सर्दी का दौर आ सकता है।
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