हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार ,हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन सैयद शम्स अल हसन उर्फ तालीब रज़ा ने घोडवाल फैज़ाबाद में जुमआ का खुत्बा देते हुए कहां,कि मौत इंसान की ज़िंदगी का अंत नहीं, बल्कि एक दूसरे चरण की शुरुआत है। अल्लाह तआला फ़रमाता है: कुल्लु नफ़्सिन् ज़ाइक़तुल मौत हर शय को मौत का स्वाद चखना है। (सूरह आले) इस आयत में किसी एक व्यक्ति या क़ौम की बात नहीं, बल्कि पूरी इंसानियत के लिए एक अटल हक़ीक़त बयान की गई है। दुनिया में इंसान को जितनी भी मोहलत मिली है, वह सीमित है और आख़िरकार उसे अपने रब की तरफ़ लौटना है।
उन्होंने कहा कि इंसान अक्सर दुनिया की ज़िंदगी को स्थायी समझकर आख़िरत को भूल जाता है, जबकि उसी आयत में अल्लाह फ़रमाता है कि दुनिया की ज़िंदगी केवल धोखे का सामान है। इसलिए अक़्लमंद इंसान को अपनी ज़िंदगी का हिसाब करते रहना चाहिए हमने क्या कमाया, किसका हक़ अदा किया, किससे ज़ुल्म किया और किन गुनाहों से तौबा करनी बाकी है। इमाम अलीؑ ने नहजुल बलाग़ा में मौत को याद रखने और मौत से पहले नेक अमल की तैयारी करने की नसीहत की है।

मौलाना ने कहा कि मौत का समय किसी इंसान को मालूम नहीं। क़ुरआन बताता है कि अल्लाह ही मौत के समय जानों को क़ब्ज़ करता है और नींद की हालत में भी इंसान की रूह के बारे में उसका पूरा इख़्तियार है। (सूरह अज़-ज़ुमर, 39:42) इसलिए यह सोचकर तौबा को टालना कि अभी बहुत समय बाकी है, इंसान के लिए बड़ी ग़फ़लत है।
उन्होंने अमीरुल मोमिनीन इमाम अलीؑ अ.स. की नसीहत का हवाला देते हुए कहा कि इंसान को मौत को बार-बार याद करना चाहिए और दुनिया की चमक-दमक से धोखा नहीं खाना चाहिए। नहजुल बलाग़ा में इमाम अलीؑ अपने बेटे को समझाते हैं कि इंसान आख़िरत की ओर जाने वाला मुसाफ़िर है और मौत उसका पीछा कर रही है। इसलिए मौत के आने से पहले अपने लिए नेक अमल का ज़ख़ीरा तैयार करना चाहिए।
मौलाना सैयद तालिब ने कहा कि मौत की याद इंसान को निराश करने के लिए नहीं, बल्कि ज़िंदगी को सही दिशा देने के लिए है। जब इंसान को यक़ीन होता है कि एक दिन उसे अपने आमाल का जवाब देना है, तो वह नमाज़ की पाबंदी करता है, लोगों के अधिकार अदा करता है, माता-पिता का सम्मान करता है, ज़रूरतमंदों की मदद करता है और गुनाहों से बचने की कोशिश करता है। क़ुरआन के अनुसार असली कामयाबी यह है कि इंसान जहन्नम से बचाकर जन्नत में दाख़िल किया जाए। (आले-इमरान, 3:185)

ख़ुत्बे के अंत में मौलाना ने कहा कि हमें हर दिन अपने आमाल का जायज़ा लेना चाहिए और मौत को याद रखते हुए तौबा, नमाज़, सदक़ा, रिश्तेदारों के अधिकार और बंदों के हक़ अदा करने की कोशिश करनी चाहिए।
अहले-बैतؑ की सीरत हमें सिखाती है कि इंसान दुनिया में रहते हुए आख़िरत के लिए तैयारी करे। इसलिए मौत को दूर की चीज़ समझकर ग़फ़लत में रहने के बजाय आज ही अपने रब से रिश्ता मज़बूत करें, क्योंकि मौत का वक़्त निश्चित है, लेकिन उसके लिए हमारी तैयारी कैसी होगी, यह हमारे आज के अमल पर निर्भर है।
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