शुक्रवार 9 अक्टूबर 2026 - 11:12
फितनों की पहचान, हक़ और बातिल में अंतर करने के लिए तक़वा और बसीरत ज़रूरी हैः सय्यद महदी अब्बास ज़ैदी

छजुपुरा सादात मे 9 अक्टूबर 2026 को हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लेमीन मौलाना सय्यद महदी अब्बास ज़ैदी साहब ने नमाज़ ए जुमा के खुत्बे मे कहा कि हक़ और बातिल के बीच अंतर करने, फितनों की पहचान करने तथा समाज में तक़वा, बसीरत और सही जानकारी के महत्व पर ज़ोर दिया। उन्होंने कहा कि मौजूदा दौर में केवल जानकारी हासिल करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि हर खबर, बयान और दावे की जाँच-पड़ताल करना भी ज़रूरी है, ताकि इंसान वास्तविकता को समझ सके और किसी भ्रम का शिकार न हो।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, छजुपुरा सादात मे 9 अक्टूबर 2026 को हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लेमीन मौलाना सय्यद महदी अब्बास ज़ैदी ने अपने ख़ुत्बा-ए-जुमा में हक़ और बातिल के बीच अंतर करने, फितनों की पहचान करने तथा समाज में तक़वा, बसीरत और सही जानकारी के महत्व पर ज़ोर दिया। उन्होंने कहा कि मौजूदा दौर में केवल जानकारी हासिल करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि हर खबर, बयान और दावे की जाँच-पड़ताल करना भी ज़रूरी है, ताकि इंसान वास्तविकता को समझ सके और किसी भ्रम का शिकार न हो।

उन्होंने क़ुरआन मजीद की सूरह अल-अनफ़ाल की आयत 29 का हवाला देते हुए कहा कि अल्लाह तआला फ़रमाता है: “ऐ ईमान लाने वालो! अगर तुम अल्लाह का तक़वा अपनाओगे, तो वह तुम्हें हक़ और बातिल के बीच अंतर करने की क्षमता प्रदान करेगा।” उन्होंने कहा कि क़ुरआन का आदेश “फ़तबय्यनू” यानी “जाँच-पड़ताल करो” हमें सिखाता है कि किसी भी बात को बिना सत्यापन के स्वीकार नहीं करना चाहिए और न ही उसे दूसरों तक पहुँचाना चाहिए।

सय्यद महदी अब्बास ज़ैदी ने कहा कि कभी-कभी मामला केवल सच्ची और झूठी खबर के बीच अंतर करने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि हक़ और बातिल इस तरह आपस में मिल जाते हैं कि सही निर्णय लेना कठिन हो जाता है। जब दोनों पक्ष धार्मिक भाषा का इस्तेमाल करें, अपनी बात के समर्थन में दलीलें पेश करें और दोनों ओर जानी-मानी हस्तियाँ मौजूद हों, तो आम इंसान के लिए हक़ को पहचानना चुनौतीपूर्ण हो जाता है। ऐसे हालात में केवल जानकारी नहीं, बल्कि तक़वा और बसीरत की भी आवश्यकता होती है।

उन्होंने अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली (अ.) के कथन का हवाला देते हुए कहा कि यदि बातिल हक़ की मिलावट से पूरी तरह अलग होता, तो सत्य के खोजियों से छिपा न रहता। इसी तरह यदि हक़ बातिल के संदेह से पूरी तरह पाक होकर सामने आता, तो विरोध करने वालों को उसका विरोध करने का अवसर न मिलता। लेकिन वास्तविकता यह है कि बातिल में हक़ के कुछ अंश मिला दिए जाते हैं और दोनों को इस तरह पेश किया जाता है कि लोगों के लिए उनके बीच अंतर करना कठिन हो जाता है। यह कथन नहजुल बलाग़ा के ख़ुत्बा नंबर 50 में मिलता है।

छजुपुरा के इमाम जुमा ने कहा कि फितने की असली समस्या उस समय पैदा होती है, जब ज़ुल्म को इंसाफ़, पक्षपात को धार्मिक गैरत और निजी हितों को सामूहिक भलाई का नाम दिया जाने लगता है। जब बातिल अपने असली रूप में सामने आता है, तो उसे पहचानना अपेक्षाकृत आसान होता है। लेकिन जब उसमें हक़ के कुछ अंश शामिल कर दिए जाते हैं, तो आम लोगों के लिए सही और गलत के बीच अंतर करना मुश्किल हो जाता है।

उनहोने अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली (अ.) के एक अन्य कथन का उल्लेख करते हुए कहा कि फितनों की शुरुआत उन ख़्वाहिशों से होती है, जिनका अनुसरण किया जाता है, और उन नए नियमों से होती है, जिन्हें अपनी ओर से गढ़ लिया जाता है। उन्होंने कहा कि हर समस्या ज्ञान की कमी से शुरू नहीं होती। कई बार इंसान पहले अपनी पसंद और ख़्वाहिश के अनुसार नतीजा तय कर लेता है और फिर उसे सही साबित करने के लिए दलीलें तलाश करता है। वह किसी व्यक्ति, संगठन या विचारधारा से जुड़ने के बाद उसकी हर बात का बचाव करने लगता है। ऐसे में अक़्ल सच्चाई तलाश करने के बजाय अपनी ख़्वाहिशों का बचाव करने लगती है और इंसान की बसीरत कमज़ोर पड़ने लगती है।

मौलाना अब्बास महदी ज़ैदी ने कहा कि इस्लामी इतिहास की घटना जंगे-जमल का उल्लेख करते हुए कहा कि यह घटना इस बात का उदाहरण है कि जब किसी विवाद में जानी-मानी धार्मिक और सामाजिक हस्तियाँ शामिल हों, तो लोगों के लिए सही पक्ष की पहचान करना कठिन हो सकता है। उस समय भी लोगों के सामने ऐसे नाम थे, जिन्हें मुस्लिम समाज में जाना जाता था। इसलिए केवल किसी व्यक्ति की प्रसिद्धि या सामाजिक प्रतिष्ठा के आधार पर उसके पक्ष को सही नहीं माना जा सकता। असल सवाल यह है कि हक़ किसके साथ है। उन्होंने कहा कि जब व्यक्तियों को ही सत्य का मापदंड बना लिया जाता है, तो हक़ उनकी पहचान और प्रतिष्ठा के पीछे छिप सकता है।

छजुपुरा के इमाम जुमा ने कहा कि वर्तमान अरब जगत की परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए कहा कि धार्मिक पहचान और पवित्र स्थलों से जुड़ी भावनाओं को राजनीतिक हितों के लिए इस्तेमाल किए जाने की संभावना से भी सतर्क रहना चाहिए। उनके अनुसार, यदि कोई व्यक्ति लंबे समय तक हरमैन शरीफ़ैन के सेवक के रूप में पहचाना जाता रहा हो, लेकिन बाद में दुनिया की लालच और निजी हितों में उलझ जाए, तो उसके व्यक्तित्व और उसके कार्यों के बीच अंतर करना आवश्यक है। किसी पवित्र स्थान का नाम लेना अपने आप में किसी राजनीतिक दावे की सत्यता का प्रमाण नहीं है।

मौलाना ने कहा कि जब किसी कार्रवाई को काबा या किसी अन्य पवित्र स्थान पर हमले के रूप में प्रस्तुत किया जाए, तो उसके बारे में किए गए दावों की भी निष्पक्ष जाँच होनी चाहिए। उन्होंने अपने विचार में कहा कि कुछ लोग अपने हितों और कार्यों पर पर्दा डालने के लिए पवित्र स्थलों का सहारा लेते हैं। इसके विपरीत, तक़वा और बसीरत रखने वाले लोग केवल व्यक्तियों को नहीं देखते, बल्कि यह समझने का प्रयास करते हैं कि वास्तविकता क्या है और हक़ किस ओर है।

हुज्जतुल इस्लाम महदी अब्बास जैदी ने कहा कि इस प्रकार की परिस्थितियों में सही निर्णय लेने के लिए केवल ज्ञान पर्याप्त नहीं होता, बल्कि ज्ञान के साथ तक़वा, बसीरत और सत्य को पहचानने की क्षमता भी आवश्यक है। इतिहास में ऐसे लोग भी रहे हैं जिन्होंने प्रसिद्ध व्यक्तियों की प्रतिष्ठा को प्राथमिकता दी, जबकि बसीरत रखने वालों ने उनके दावों और कार्यों को सिद्धांतों की कसौटी पर परखा।

अंत में छजुपुरा के इमाम जुमा ने लोगों से अपील की कि वे ज्ञान हासिल करें, तक़वा अपनाएँ और अपनी बसीरत को मजबूत बनाएँ। किसी भी खबर, बयान या राजनीतिक दावे को स्वीकार करने से पहले उसके स्रोत और प्रमाण की जाँच करें। उन्होंने कहा कि हक़ की पहचान व्यक्तियों की लोकप्रियता, भावनात्मक नारों या धार्मिक शब्दावली से नहीं, बल्कि सच्चाई, प्रमाण और न्याय के आधार पर की जानी चाहिए। फितनों के दौर में यही सोच इंसान को भ्रम से बचाकर हक़ और बातिल के बीच सही अंतर करने में मदद कर सकती है।

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