शुक्रवार 9 अक्टूबर 2026 - 21:09
बसीरत के बिना सही और गलत की पहचान संभव नहीं; इस्लामी नारों के बजाय आचरण को देखें: मौलाना सय्यद अब्बास बाक़री

अमलापुरम के इमामे जुमा मौलाना सय्यद अब्बास बाक़री ने जुमे के ख़ुत्बे में बसीरत (सही समझ) के महत्व पर ज़ोर देते हुए कहा कि हक और बातिल की पहचान केवल धार्मिक नारों और बाहरी पहचान से नहीं, बल्कि व्यक्तियों और सरकारों के व्यावहारिक आचरण से होती है। उन्होंने इस्लाम के इतिहास की लड़ाइयों और हज़रत अम्मार बिन यासिर (रज़ि.) का उदाहरण देते हुए कहा कि मोमिन को परिस्थितियों की वास्तविकता समझकर निर्णय लेना चाहिए। उन्होंने कुछ मुस्लिम देशों के शासकों की नीतियों की आलोचना करते हुए ईरान और फ़िलिस्तीन के संबंध में उनके रवैये को बसीरत की कसौटी पर परखने की आवश्यकता पर भी बल दिया।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, 9 अक्टूबर को आंध्र प्रदेश के अमलापुरम शहर में नमाज़े जुमा के ख़ुत्बे को संबोधित करते हुए आंध्र प्रदेश शिया उलमा बोर्ड के अध्यक्ष और आंध्र प्रदेश सरकार के शिया क़ाज़ी मौलाना सैयद अब्बास बाक़री ने बसीरत के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि जिस व्यक्ति में बसीरत नहीं होती, वह ईमान की वास्तविक अपेक्षाओं को समझने और हक़ व बातिल के बीच अंतर करने से वंचित रह जाता है। मोमिन के लिए आवश्यक है कि वह बाहरी रूप, धार्मिक नारों और दावों से प्रभावित होने के बजाय वास्तविकता को पहचाने और बसीरत के आधार पर निर्णय ले।

मौलाना ने अपने ख़िताब में क़ुरआन मजीद की सूरा अल-अनआम की आयत 104 की तिलावत की:

قَدْ جَاءَكُم بَصَائِرُ مِن رَّبِّكُمْ ۖ فَمَنْ أَبْصَرَ فَلِنَفْسِهِ ۖ وَمَنْ عَمِيَ فَعَلَيْهَا

“तुम्हारे पास तुम्हारे पालनहार की ओर से स्पष्ट प्रमाण आ चुके हैं। अतः जो बसीरत से काम लेगा, उसका लाभ स्वयं उसी को होगा और जो अंधा बना रहेगा, उसका नुकसान भी उसी को होगा।”

इस आयत की व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा कि ‘बَसाइर’ शब्द ‘बَसीरतन’ का बहुवचन है, जिसका अर्थ प्रमाण, स्पष्ट निशानियाँ और रोशन दलीलें हैं। बसीरत का मूल शब्द ‘अल-बसर’ है, जिसका अर्थ देखना है। इसी से ‘बसरत’ और ‘बसीरत’ जैसे शब्द बने हैं। हालांकि, दोनों में मूल अंतर है। बसरत का संबंध आँखों से देखने से है, जबकि बसीरत का अर्थ बुद्धि और हृदय की आँखों से वास्तविकता को समझना और उसकी सही पहचान करना है।

उन्होंने स्पष्ट किया कि देखने की क्षमता केवल मनुष्यों तक सीमित नहीं है। जानवर और पक्षी भी देखते हैं, बल्कि कुछ की देखने की क्षमता मनुष्यों से अधिक होती है। लेकिन बसीरत वह क्षमता है, जिसके माध्यम से मनुष्य बुद्धि और चेतना के सहारे वास्तविकता को पहचानता है। मनुष्य की वास्तविक श्रेष्ठता केवल आँखों से देखने में नहीं, बल्कि सही और गलत, हक और बातिल तथा मित्र और शत्रु के बीच अंतर करने में है।

मौलाना सय्यद अब्बास बाक़री ने बसीरत की परिभाषा देते हुए कहा:

الْبَصِيرَةُ نُورٌ يَقْذِفُهُ اللَّهُ فِي قَلْبِ الْعَبْدِ يُمَيِّزُ بِهِ بَيْنَ الْحَقِّ وَالْبَاطِلِ

अर्थात,बसीरत वह प्रकाश है, जिसे अल्लाह अपने बंदे के दिल में डालता है और जिसके माध्यम से वह हक तथा बातिल के बीच अंतर करता है।

उन्होंने कहा कि दिखाई देने वाली चीज़ों को देख लेना कोई बड़ी उपलब्धि नहीं है। वास्तविक कमाल यह है कि मनुष्य उन तथ्यों को भी पहचान सके, जो बाहरी आँखों से दिखाई नहीं देते। बहुत से लोग अपनी आँखों से सब कुछ देखते हैं, लेकिन वास्तविकता को समझने में असफल रहते हैं। इसका कारण बसीरत की कमी है।

इस संदर्भ में उन्होंने पैग़म्बरे इस्लाम (स) की हदीस पेश की:

اتَّقُوا فِرَاسَةَ الْمُؤْمِنِ، فَإِنَّهُ يَنْظُرُ بِنُورِ اللَّهِ “मोमिन की फ़िरासत से सावधान रहो, क्योंकि वह अल्लाह के नूर से देखता है।”

मौलाना ने कहा कि यदि मनुष्य में बसीरत न हो, तो उसके लिए मित्र और शत्रु को पहचानना कठिन हो जाता है और वह हक़ व बातिल के बीच अंतर करने में गलती कर सकता है। इसलिए धार्मिक जीवन के साथ-साथ सामाजिक, राजनीतिक और ऐतिहासिक मामलों में भी बसीरत का बहुत महत्व है।

इस्लाम के प्रारंभिक इतिहास की घटनाओं का उल्लेख करते हुए मौलाना सैयद अब्बास बाक़री ने कहा कि अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली इब्ने अबी तालिब (अ) के ख़िलाफ़त काल में तीन प्रमुख लड़ाइयाँ हुईं—जंगे जमल, जंगे सिफ़्फ़ीन और जंगे नहरवान। इन घटनाओं में कुछ लोग हक को इसलिए नहीं पहचान सके, क्योंकि उन्हें दोनों पक्षों में कलिमा पढ़ने वाले, नमाज़ अदा करने वाले और क़ुरआन मजीद के हाफ़िज़ दिखाई दे रहे थे।

कुछ लोग युद्ध के मैदान तक पहुँच गए थे, लेकिन जब उन्होंने विरोधी सेना के हाथों में इस्लामी झंडे, उनके माथों पर सज्दे के निशान और उनकी ज़बान पर हक की बातें सुनीं, तो वे असमंजस में पड़ गए। उन्होंने सोचा कि जब दोनों पक्षों में मुसलमान हैं, तो फिर किससे युद्ध किया जाए?

कुछ लोग इसी असमंजस में अपनी तलवारें छोड़कर युद्ध के मैदान से लौट गए और अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली (अ) से कहने लगे, “ऐ रसूल के उत्तराधिकारी! क्या आप हमें मुसलमानों का हत्यारा बनाना चाहते हैं?”

मौलाना ने कहा कि यह स्थिति वास्तव में बसीरत की कमी का परिणाम थी। उन लोगों ने विरोधी सेना के बाहरी इस्लामी प्रतीकों को तो देखा, लेकिन उसके आचरण, दृष्टिकोण और व्यावहारिक कदमों की वास्तविकता समझने का प्रयास नहीं किया। वे धार्मिक प्रतीकों से प्रभावित हो गए और हक का समर्थन करने में दृढ़ नहीं रह सके।

इसी ऐतिहासिक संदर्भ में उन्होंने हज़रत अम्मार बिन यासिर (रज़ि.) का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि जहाँ कुछ लोग विरोधी सेना के इस्लामी झंडों, माथों पर सज्दे के निशानों और उनकी ज़बान पर कलिमा देखकर असमंजस में पड़ गए, वहीं हज़रत अम्मार बिन यासिर जैसे बसीरत रखने वाले व्यक्ति इन बाहरी प्रतीकों से बिल्कुल प्रभावित नहीं हुए।

मौलाना ने बताया कि हज़रत अम्मार बिन यासिर (रज़ि.) ने विरोधी सेना को देखकर मुस्कराते हुए स्पष्ट किया कि उनके विचार में जंगे बद्र और जंगे उहुद में रसूलुल्लाह (स) के सामने आने वाले मुशरिकों और काफ़िरों तथा अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली (अ) के सामने आने वालों के बीच मूल अंतर नहीं था। अंतर केवल इतना था कि बद्र और उहुद के विरोधी खुले तौर पर काफ़िर थे, जबकि ये लोग इस्लाम का मुखौटा पहने हुए थे।

उन्होंने कहा कि यही अहले बसीरत की दृष्टि है। वे बाहरी वेशभूषा, धार्मिक पहचान और इबादत के प्रतीकों से धोखा नहीं खाते, बल्कि परिस्थितियों की वास्तविकता को पहचानते हैं। हज़रत अम्मार बिन यासिर (रज़ि.) का उदाहरण हमें सिखाता है कि हक की पहचान केवल नारों और बाहरी इस्लामी प्रतीकों से नहीं, बल्कि बसीरत और वास्तविकता की समझ से होती है।

वर्तमान वैश्विक और राजनीतिक परिस्थितियों पर प्रकाश डालते हुए मौलाना सय्यद अब्बास बाक़री ने कुछ मुस्लिम देशों के शासकों की नीतियों की कड़ी आलोचना की। उन्होंने कहा कि कुछ मुस्लिम देशों के शासक अमेरिका और इज़राइल की सेवा कर रहे हैं, उन्हें विभिन्न तरीकों से सहायता दे रहे हैं और ईरान को नुकसान पहुँचाने तथा उसे बर्बाद करने के प्रयासों में उनका साथ दे रहे हैं।

उन्होंने कहा कि ऐसे शासकों को भी आज के दौर के ‘अहले जमल’, ‘अहले सिफ़्फ़ीन’ और ‘अहले नहरवान’ के संदर्भ में देखने की आवश्यकता है। जिस प्रकार इस्लाम के इतिहास में कुछ लोग बाहरी धार्मिक प्रतीकों के कारण वास्तविकता को नहीं पहचान सके, उसी प्रकार आज भी कुछ लोग शासकों की मुस्लिम पहचान, उनके झंडों और धार्मिक दावों को देखकर उनके वास्तविक आचरण की अनदेखी कर देते हैं।

मौलाना ने स्पष्ट शब्दों में कहा, “उनके झंडों को मत देखो, बल्कि उनके कर्मों को देखो।” किसी सरकार या शासक की वास्तविकता का निर्धारण केवल उसकी धार्मिक पहचान से नहीं किया जा सकता। यह देखना आवश्यक है कि उसकी नीतियाँ किसके हित में हैं, वह मज़लूमों के साथ खड़ा है या ज़ालिमों की सहायता कर रहा है और उसके व्यावहारिक कदम हक तथा इंसाफ़ के अनुरूप हैं या नहीं।

उन्होंने कहा कि यदि कोई व्यक्ति केवल यह देखकर निर्णय लेता है कि दोनों पक्षों में मुसलमान हैं, इसलिए किसी एक पक्ष के समर्थन या विरोध में रुख़ नहीं अपनाया जा सकता, तो यह बसीरत की कमी का संकेत है। असली सवाल यह नहीं है कि किसके पास कौन-सा झंडा है या वह क्या नारा लगाता है, बल्कि यह है कि उसके कार्यों और नीतियों की वास्तविकता क्या है।

मौलाना सय्यद अब्बास बाक़री ने कहा कि कुछ लोग ईरान का विरोध इस आधार पर करते हैं कि वह एक शिया देश है। यह धारणा भी सामने रखी जाती है कि शायद इसी कारण कुछ मुस्लिम देशों के शासकों ने ईरान का समर्थन नहीं किया। उन्होंने इस दृष्टिकोण पर सवाल उठाते हुए कहा कि यदि किसी देश की शिया पहचान के कारण उसका समर्थन नहीं किया जाता, तो यह भी बताया जाए कि क्या फ़िलिस्तीन के मज़लूम लोग शिया थे?

उन्होंने सवाल किया कि फ़िलिस्तीन के मज़लूम लोगों, विशेषकर मासूम बच्चों और महिलाओं की सहायता के लिए इन मुस्लिम देशों ने क्या किया? उन्होंने आरोप लगाया कि सहायता करने के बजाय कुछ मुस्लिम देशों के शासकों ने फ़िलिस्तीनी बच्चों और महिलाओं की हत्या के ज़िम्मेदार अमेरिका और इज़राइल को व्यापक सहयोग दिया है।

मौलाना ने कहा कि यहीं बसीरत और बसीरत की कमी के बीच का अंतर सामने आता है। यदि कोई व्यक्ति बाहरी धार्मिक पहचान के आधार पर किसी सरकार को सही मानता है, लेकिन उसके वास्तविक आचरण, विदेश नीति और मज़लूमों के प्रति उसके रवैये की अनदेखी करता है, तो वह वास्तविकता को समझने में गलती कर रहा है।

उन्होंने कड़े शब्दों में कहा कि यदि इसके बावजूद कोई मुसलमान इन शासकों की बाहरी मुस्लिम पहचान के आधार पर उन्हें हक पर मानता है और उनकी नीतियों का बचाव करता है, तो यह उसकी बसीरत की कमी है। मौलाना ने श्रोताओं से आग्रह किया कि वे इस्लाम के इतिहास से सबक लें, वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों का गहराई से अध्ययन करें और किसी भी सरकार या राजनीतिक शक्ति के बारे में निर्णय लेते समय उसके व्यावहारिक आचरण को कसौटी बनाएँ।

मौलाना सय्यद अब्बास बाक़री ने नमाज़े जुमा के दूसरे ख़ुत्बे के अंत में सभी नमाज़ियों के लिए दुआ कराई। उन्होंने तमाम उलमा, मराजे तक़लीद, मोमिनीन व मोमिनात और पूरी उम्मते मुस्लिम के कल्याण, सुरक्षा और उन्नति के लिए अल्लाह की बारगाह में दुआ की।

उन्होंने विशेष रूप से सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह सय्यद मुज्तबा ख़ामेनेई (ह) और इस्लाम के तमाम जाँबाज़ों की सुरक्षा एवं सलामती के लिए दुआ की। साथ ही अमेरिका और इज़राइल के विनाश के लिए भी दुआ की।

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