हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार , आयतुल्लाह क़ुर्बान अली दर्री नजफ आबादी ने अपने दर्स-ए-ख़ारिज में अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली अलैहिस्सलाम की एक रिवायत की व्याख्या करते हुए अल्लाह की पहचान और उसकी विशेषताओं पर प्रकाश डाला।
उन्होंने कहा कि इंसान की आंखें देखने के कोण, दूरी और परिस्थितियों में बदलाव के कारण चीज़ों को अलग-अलग अंदाज़ में देखती हैं, लेकिन अल्लाह की पवित्र ज़ात इन तमाम बदलावों से पाक है। अल्लाह को भौतिक चीज़ों और मख़लूक़ात की तरह ज़हरी आंखों से नहीं देखा जा सकता।
आयतुल्लाह दर्री नजफ आबादी ने आगे कहा कि अल्लाह तआला अज़ली, अबदी और वाजिबुल वुजूद है। उसकी ज़ात, सिफ़ात और कमालात में किसी प्रकार का बदलाव या परिवर्तन नहीं आ सकता, क्योंकि बदलाव और परिवर्तन सीमित भौतिक मख़लूक़ात की विशेषताएं हैं।
उन्होंने क़ुरआन मजीद की इस आयत का हवाला देते हुए कहा:
«لَا تُدْرِکُهُ الْأَبْصَارُ وَهُوَ یُدْرِکُ الْأَبْصَارَ»
निगाहें उसे नहीं पा सकतीं, जबकि वह तमाम निगाहों को देखता है। उन्होंने कहा कि अल्लाह की पहचान दिल, ईमान और अक़्ली दलीलों के ज़रिए हासिल होती है।
उन्होंने ख़ुदा की पहचान के सिलसिले में बुरहान-ए-इन्नी और बरुहान-ए-लिम्मी के बीच अंतर स्पष्ट करते हुए कहा कि बुरहान-ए-इन्नी में इंसान कायनात की निशानियों और मख़लूक़ात के माध्यम से अल्लाह के वजूद तक पहुंचता है, जबकि बुरहान-ए-लिम्मी में अल्लाह की पहचान और उसकी कमाल की विशेषताओं को दूसरी चीज़ों की पहचान का आधार बनाया जाता है।
उन्होंने कहा कि अल्लाह अव्वल है, यानी उससे पहले कोई नहीं और आख़िर है, यानी उसके बाद कोई नहीं। तमाम मख़लूक़ात सीमित हैं, जबकि अल्लाह की ज़ात असीमित और बेमिसाल है।
आयतुल्लाह दर्री नजफ आबादी ने जंग-ए-जमल के दौरान तौहीद के संबंध में अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली अलैहिस्सलाम के बयान का उल्लेख करते हुए कहा कि अल्लाह की अहदियत का अर्थ उसकी ज़ात और सिफ़ात का यकता और बेमिसाल होना है, न कि संख्यात्मक रूप से एक होना। अल्लाह बेनियाज़ है, जबकि तमाम मख़लूक़ात अपने वजूद और बाक़ी रहने के लिए उसी की मोहताज हैं।
अंत में उन्होंने तौहीद की गहरी समझ विकसित करने और अल्लाह की सिफ़ात को मख़लूक़ात के समान समझने से बचने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया।
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