हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार, भावनगर के इमामे जुमा ने ख़ुत्बा-ए-जुमा में तक़वा-ए-इलाही अपनाने, इबादत व इताअत और क़ुरआन मजीद की शिक्षाओं पर अमल करने की नसीहत करते हुए कहा कि इस्लाम का उद्देश्य केवल व्यक्ति को नेक बनाना नहीं, बल्कि पूरे समाज में नेकी, अद्ल और इंसाफ़ को क़ायम करना है। उन्होंने सूरा-ए-हुजरात की आयत 9 का हवाला देते हुए कहा कि मोमिनों के बीच मतभेद और झगड़े की स्थिति में सुलह कराने, ज़ुल्म को रोकने और इंसाफ़ के साथ सुधार करने की ज़िम्मेदारी सभी की है। मोमिन का काम मतभेदों को बढ़ावा देना नहीं, बल्कि उन्हें दूर करना, मज़लूम का समर्थन करना और समाज में शांति व इंसाफ़ को बढ़ावा देना है।
अल्लाह पर ईमान और उसके बंदों को फ़ायदा पहुँचाना सबसे बड़ी नेकी
पहले ख़ुत्बे में पैग़म्बरे इस्लाम (स) की हदीस बयान करते हुए ख़तीब ने कहा कि दो ऐसी ख़सलतें और विशेषताएँ हैं, जिनसे बढ़कर कोई नेकी नहीं है। उनमें पहली अल्लाह तआला की ज़ात पर ईमान रखना और दूसरी उसके बंदों को फ़ायदा पहुँचाना है।
इसी हदीस में दो ऐसी बुरी विशेषताओं का भी उल्लेख है, जिनसे बढ़कर कोई बुराई नहीं है। उनमें पहली अल्लाह तआला के साथ किसी को शरीक ठहराना और दूसरी लोगों को नुक़सान पहुँचाना है।
सुलह और इंसाफ़ की शिक्षा
दूसरे खुत्बे मे क़ुरआन और तरबियत के विषय पर ख़िताब करते हुए भावनगर के इमामे जुमा ने सूरा-ए-हुजरात की आयत 9 का हवाला दिया, जिसमें अल्लाह तआला ने मोमिनों के दो समूहों के बीच झगड़ा होने की स्थिति में उनके बीच सुलह कराने का आदेश दिया है। यदि उनमें से एक समूह दूसरे पर ज़्यादती करे, तो उसके विरुद्ध कार्रवाई की जाए, यहाँ तक कि वह अल्लाह के आदेश की ओर लौट आए। फिर जब वह लौट आए, तो दोनों के बीच अद्ल और इंसाफ़ के साथ सुलह कराई जाए। बेशक, अल्लाह इंसाफ़ करने वालों को पसंद करता है।
ख़तीब ने कहा कि यदि हम सूरा-ए-हुजरात की शुरुआत से इसका अध्ययन करें, तो पता चलता है कि इसमें इंसान की धार्मिक और सामाजिक तरबियत के लिए सिलसिलेवार मार्गदर्शन दिया गया है। सबसे पहले अल्लाह और उसके रसूल (स) से आगे न बढ़ने की शिक्षा दी गई है। इसके बाद रसूल की आवाज़ से अपनी आवाज़ ऊँची न करने की ताकीद की गई है। फिर यह निर्देश दिया गया है कि यदि कोई फ़ासिक़ व्यक्ति सूचना लेकर आए, तो उसकी जाँच-पड़ताल किए बिना उसे स्वीकार न किया जाए।
इसी सिलसिले में आगे बताया गया है कि यदि कोई समूह बग़ावत और सरकशी पर उतर आए, तो उसे रोकने के लिए सामूहिक रूप से प्रयास किया जाए। इसके बाद मोमिनों को एक-दूसरे का भाई बताया गया है और उनके बीच सुलह कराने की ज़िम्मेदारी पर ज़ोर दिया गया है।
उन्होंने कहा कि इन आयतों में व्यक्तिगत आचरण से लेकर सामाजिक संबंधों और सामूहिक ज़िम्मेदारियों तक, तरबियत के महत्वपूर्ण सिद्धांत बयान किए गए हैं।
अद्ल और इंसाफ़ समाज की सुरक्षा का आधार हैं
ख़तीब ने कहा कि सूरा-ए-हुजरात की यह आयत मुस्लिम समाज को अपनी सुरक्षा और एकता बनाए रखने का मार्ग दिखाती है। यह बताती है कि समाज को किस प्रकार व्यवस्थित रखा जाए, विवादों को कैसे सुलझाया जाए और ज़ुल्म को कैसे रोका जाए।
उन्होंने स्पष्ट किया कि जहाँ अद्ल और इंसाफ़ नहीं होता, वहीं ज़ुल्म जन्म लेता है। ज़ुल्म, अद्ल के विपरीत है। हमारा अक़ीदा है कि अल्लाह तआला एक है और वह आदिल भी है। तौहीद के साथ अद्ल भी इस्लामी अक़ाइद की बुनियादी शिक्षाओं में शामिल है।
उन्होंने कहा कि हम अल्लाह को आदिल इसलिए मानते हैं, क्योंकि क़ुरआन मजीद स्पष्ट करता है कि अल्लाह किसी पर ज़ुल्म नहीं करता। क़ुरआन की वे आयतें, जिनमें अल्लाह की ओर से किसी पर ज़ुल्म न किए जाने का उल्लेख है, उसके आदिल होने की स्पष्ट दलील हैं।
इसी न्याय का एक पहलू यह भी है कि इंसान की छोटी से छोटी नेकी भी व्यर्थ नहीं जाती। यदि किसी ने ज़र्रा बराबर भी नेकी की होगी, तो वह उसे देखेगा और उसका बदला पाएगा। इसी प्रकार, यदि किसी ने ज़र्रा बराबर भी बुराई की होगी, तो वह भी उसके सामने आएगी। अल्लाह तआला हर अमल का हिसाब लेने वाला है और किसी के साथ अन्याय नहीं करता।
उन्होंने कहा कि यदि इस सिद्धांत को हम अपनी मौजूदा ज़िंदगी पर लागू करें, तो हमारे सामने कई महत्वपूर्ण सामाजिक और नैतिक उसूल आते हैं।
समाज में सुलह और इंसाफ़ क़ायम करने के दस उसूल
ख़तीब ने सूरा-ए-हुजरात की आयत से मिलने वाली शिक्षाओं को मौजूदा जीवन पर लागू करते हुए दस महत्वपूर्ण बिंदुओं की ओर ध्यान दिलाया।
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एक-दूसरे के प्रति जवाबदेही: मुसलमानों को एक-दूसरे के संबंध में अपनी ज़िम्मेदारियों का एहसास होना चाहिए। इस्लाम की खूबसूरती यह है कि वह केवल व्यक्ति को अच्छा बनाने पर ज़ोर नहीं देता, बल्कि पूरे समाज को नेक और ज़िम्मेदार बनाना चाहता है। हदीस का सिद्धांत है कि तुममें से हर व्यक्ति निगरान है और उससे उसकी ज़िम्मेदारी के बारे में सवाल किया जाएगा।
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सुलह में जल्दबाज़ी करना: विवादों को सुलझाने और आपसी मतभेद दूर करने में देरी नहीं करनी चाहिए। टालमटोल के बजाय सुलह की कोशिश जल्द शुरू करनी चाहिए।
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मतभेदों को दुश्मनी में न बदलने देना: विचारों और दृष्टिकोणों में अंतर हो सकता है, लेकिन उन्हें आपसी दुश्मनी और नफ़रत में बदलने से रोकना आवश्यक है।
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जाँच के बिना निर्णय न लेना: अफ़वाहों, प्रोपेगंडे या किसी एक पक्ष की बात सुनकर फ़ैसला नहीं करना चाहिए। किसी भी मामले में निर्णय लेने से पहले तथ्यों की जाँच करना ज़रूरी है।
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सुलह की कोशिश जारी रखना: यदि मतभेद पैदा हो जाएँ, तो उनके समाधान और आपसी सुलह के लिए लगातार प्रयास करते रहना चाहिए।
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मज़लूम और ज़ालिम को समान न समझना: इंसाफ़ का तक़ाज़ा है कि मज़लूम और ज़ुल्म करने वाले के बीच अंतर किया जाए। दोनों को एक ही स्तर पर रखना न्याय के विरुद्ध है।
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निजी हित और पक्षपात से बचना: सुलह और सुधार के दौरान व्यक्तिगत लाभ, रिश्तेदारी या सामूहिक पक्षपात को निर्णय पर प्रभाव नहीं डालने देना चाहिए।
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हक़ और इंसाफ़ की बुनियाद पर सुलह: सुलह ऐसी होनी चाहिए, जो न्याय और सत्य पर आधारित हो। केवल विवाद समाप्त करने के लिए किसी के अधिकारों की अनदेखी नहीं की जानी चाहिए।
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उद्देश्य समाज का सुधार हो: सुलह का मक़सद किसी को पराजित करना या अपमानित करना नहीं, बल्कि समाज की इस्लाह करके उसे शांति और स्थिरता की ओर वापस लाना होना चाहिए।
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हक़दार को उसका अधिकार दिलाना: वास्तविक इस्लाह वही है, जिसमें हर व्यक्ति को उसका जायज़ हक़ मिल जाए और किसी के साथ अन्याय न हो।
ख़तीब ने कहा कि मोमिन का काम मतभेदों को हवा देना नहीं, बल्कि उन्हें समाप्त करने, ज़ुल्म को रोकने और अद्ल व इंसाफ़ को क़ायम करने का प्रयास करना है। यही एक सच्चे मोमिन की पहचान है।
घर और समाज में इंसाफ़ हो तो ज़िंदगी जन्नत बन सकती है
भावनगर के इमामे जुमा ने कहा कि सूरा-ए-हुजरात की इस आयत में तीन बार अद्ल और इंसाफ़ की अहमियत की ओर ध्यान दिलाया गया है। इससे स्पष्ट होता है कि इस्लाम में न्याय केवल एक व्यक्तिगत गुण नहीं, बल्कि परिवार और समाज की स्थिरता का आधार है।
उन्होंने कहा कि यदि हमारे घरों में इंसाफ़ क़ायम हो जाए, तो पारिवारिक जीवन सुधर सकता है। इसी तरह, यदि समाज में अद्ल और इंसाफ़ को बढ़ावा दिया जाए, तो सामाजिक समस्याओं में कमी आ सकती है और लोगों के बीच प्रेम, विश्वास तथा शांति का माहौल पैदा हो सकता है।
उन्होंने इमाम ज़माना (अ) के ज़ुहूर का उल्लेख करते हुए कहा कि जब इंशाअल्लाह इमाम ज़माना (अ) तशरीफ़ लाएँगे, तो ज़मीन पर अद्ल और इंसाफ़ क़ायम करेंगे। जब हर व्यक्ति को उसका अधिकार मिलेगा और ज़ुल्म व अन्याय का अंत होगा, तभी दुनिया में वास्तविक शांति और खुशहाली का माहौल पैदा होगा।
ख़तीब ने कहा कि इससे हमें यह सीख मिलती है कि यदि हम अपने घरों में इंसाफ़ क़ायम कर दें, तो हमारा घर सुकून और खुशहाली का केंद्र बन सकता है। इसी तरह, यदि हम अपने समाज में अद्ल और इंसाफ़ को आम करें, तो हमारा समाज भी शांति और भाईचारे का नमूना बन सकता है।
उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि इंसाफ़ की स्थापना केवल भविष्य में इमाम ज़माना (अ) के ज़ुहूर से जुड़ी उम्मीद नहीं, बल्कि आज की हमारी व्यक्तिगत, पारिवारिक और सामाजिक ज़िम्मेदारी भी है। प्रत्येक मोमिन को अपने व्यवहार में न्याय अपनाना, दूसरों के अधिकारों की रक्षा करना, विवादों में सुलह कराना और ज़ुल्म के विरुद्ध खड़े होने का प्रयास करना चाहिए। यही क़ुरआन की तरबियत और इस्लाम की सामाजिक शिक्षाओं का व्यावहारिक तक़ाज़ा है।
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