हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, तारागढ़, अजमेर के इमामे जुमा मौलाना सय्यद नकी महदी ज़ैदी ने जुमे के ख़ुत्बे में इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम की वसीयत की व्याख्या का सिलसिला जारी रखते हुए बच्चों के अधिकारों को बयान किया। इस सिलसिले में उन्होंने उस रिवायत की व्याख्या की, जिसमें बच्चों पर रहम करने, उनकी तरबीयत और शिक्षा, उनकी गलतियों को माफ़ करने, उनके साथ नरमी और शफ़क़त से पेश आने तथा उनका मार्गदर्शन करने पर ज़ोर दिया गया है।
बच्चों की इबादती तरबीयत की अहमियत बताते हुए उन्होंने कहा कि इसका अर्थ बच्चों को इबादत करने का तरीक़ा सिखाना और उनके भीतर अल्लाह की बंदगी का शौक़ पैदा करना है, ताकि वे नमाज़ और दूसरी इबादतों के पाबंद बन सकें। माता-पिता की ज़िम्मेदारी है कि वे बच्चों को नमाज़ सिखाने और उन्हें इबादत का आदी बनाने में किसी तरह की कोताही न करें।
मौलाना सय्यद नकी मेहदी ज़ैदी ने सूरह तहरीम की आयत नंबर 6 की तिलावत करते हुए अल्लाह के इस फ़रमान, “अपने आपको और अपने परिवार को जहन्नम की आग से बचाओ”, का हवाला दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस हिफ़ाज़त का मतलब केवल सीधे तौर पर ख़तरों से बचाना नहीं, बल्कि उन कारणों और परिस्थितियों से भी सुरक्षित रखना है, जो इंसान को अल्लाह के अज़ाब तक पहुँचा सकते हैं।
उन्होंने कहा कि जिस तरह हराम कामों का अंजाम इंसान को अज़ाब का हक़दार बना सकता है, उसी तरह वाजिब कामों की अदायगी में लापरवाही भी उसकी नजात की राह में रुकावट बन सकती है। इसलिए बच्चों को नमाज़ और दूसरे वाजिब कामों की शिक्षा देना, उन्हें दुआ और मुनाजात से परिचित कराना तथा उनके भीतर अल्लाह की बंदगी का शौक़ पैदा करना, उन्हें जहन्नम से बचाने के अहम तरीक़ों में शामिल है।
इमामे जुमा ने आगे कहा कि कभी-कभी घर का मुखिया ख़ुद नमाज़ का पाबंद और दीनदार होता है, लेकिन अपने बच्चों या जीवनसाथी की धार्मिक लापरवाही पर ख़ामोश रहता है। इसी तरह कुछ माता-पिता अपनी धार्मिक ज़िम्मेदारियों का ख़याल रखते हैं, मगर औलाद की धार्मिक तरबीयत और हिजाब जैसे मामलों पर उचित ध्यान नहीं देते। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस्लाम इंसान को अपनी इस्लाह के साथ-साथ अपने परिवार की हिदायत और तरबीयत के लिए प्रयास करने का भी पाबंद बनाता है।
इस सिलसिले में उन्होंने इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम से मंसूब एक रिवायत बयान की। इसके अनुसार, जब एक व्यक्ति ने अपने परिवार की इस्लाह के बारे में सवाल किया, तो इमाम अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया कि उन्हें उन कामों का हुक्म दो, जिन्हें अल्लाह ने वाजिब क़रार दिया है, और उन कामों से रोको, जिनसे उसने मना किया है। अगर वे तुम्हारी बात मान लें, तो तुमने उन्हें बचा लिया; और अगर वे नाफ़रमानी करें, तो तुम अपनी ज़िम्मेदारी पूरी कर चुके होगे।
मौलाना सय्यद नकी महदी ज़ैदी ने पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहु अलैहि व आलेही वसल्लम से मंसूब एक अन्य रिवायत का हवाला देते हुए कहा कि इंसान पर ज़रूरी है कि जिस तरह वह अपने नफ़्स को नेकी की नसीहत करता है, उसी तरह अपने परिवार को भी नेकी की दावत दे। उन्होंने ज़ोर दिया कि मोमिनों को अपनी धार्मिक ज़िम्मेदारियों से ग़ाफ़िल नहीं होना चाहिए और अम्र बिल मारूफ़ व नहीं अनिल मुनकर यानी नेकी का हुक्म देने और बुराई से रोकने के ज़रिये अपने परिवार की इस्लाह की कोशिश जारी रखनी चाहिए।
हज़रत ज़ैनब कुबरा सलामुल्लाह अलैहा की सीरत और पैग़ाम-ए-कर्बला
जुमे के ख़ुत्बे के दूसरे हिस्से में मौलाना सय्यद नकी मेहदी ज़ैदी ने हज़रत ज़ैनब कुबरा सलामुल्लाह अलैहा की विलादत का उल्लेख करते हुए कहा कि 5 जमादिउल अव्वल को उनकी विलादत की ख़ुशी मनाई जाती है। उन्होंने वाक़िया-ए-आशूरा के बाद विलायत के परचम को बुलंद रखा और इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के पैग़ाम को ज़िंदा रखने में बुनियादी भूमिका निभाई।
उन्होंने कहा कि हज़रत ज़ैनब कुबरा सलामुल्लाह अलैहा ने न केवल पैग़ाम-ए-कर्बला की हिफ़ाज़त की, बल्कि अपने ख़ुत्बों, साबित क़दमी और बे-मिसाल किरदार के ज़रिये हक़ और बातिल तथा ज़ुल्म और मज़लूमियत के बीच अंतर को भी स्पष्ट किया। आज भी वाक़िया-ए-आशूरा का पैग़ाम दुनिया भर में मज़लूमों की हिमायत और ज़ुल्म के ख़िलाफ़ डटे रहने की निशानी है।
मौलाना सय्यद नकी मेहदी ज़ैदी ने हज़रत ज़ैनब सलामुल्लाह अलैहा के मुक़द्दस नाम के वसीले से तवस्सुल की अहमियत बयान करते हुए मरहूम मिर्ज़ा अबुल क़ासिम क़ुम्मी का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि वे इस महान हस्ती के इस्म-ए-मुबारक के ज़रिये तवस्सुल किया करते थे और इसे दुआ की क़ुबूलियत का माध्यम मानते थे।
उन्होंने आगे कहा कि हज़रत ज़ैनब कुबरा सलामुल्लाह अलैहा की विलादत का जश्न मनाने के दो अहम पहलू हैं। पहला, इस महान महिला के बुलंद मक़ाम और बे-मिसाल किरदार को ख़िराज-ए-अक़ीदत पेश करना और उन्हें समाज के सामने एक रूहानी व नैतिक आदर्श के रूप में प्रस्तुत करना। दूसरा, समाज में ज़ैनबी रूह, हिम्मत, वफ़ादारी, सब्र और हक़गोई को बढ़ावा देना।
उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि हज़रत ज़ैनब सलामुल्लाह अलैहा की सीरत केवल अक़ीदत और मोहब्बत का विषय नहीं है, बल्कि जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में हक़ का साथ देने, अपनी ज़िम्मेदारी निभाने और ज़ुल्म के मुक़ाबले में डटे रहने का व्यावहारिक सबक़ भी है।
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