हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, जपला, झारखंड स्थित शिया ईदगाह हुसैनाबाद में जुमे के आयोजन को संबोधित करते हुए इमामे जुमा मौलाना सैयद अली सज्जाद रिज़वी ने मोमिनों और मुसलमानों की धार्मिक तरबीयत, नैतिक सुधार और ईश्वरीय पहचान के विषय पर विस्तार से प्रकाश डाला। इसी क्रम में उन्होंने जन्नत की महिलाओं की सरदार हज़रत फातिमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा की पवित्रता और मासूमियत तथा उनके द्वारा प्रदान की गई नूरानी तस्बीह की महान फज़ीलत को प्रभावशाली अंदाज़ में बयान किया।
उन्होंने अपने संबोधन का मुख्य आधार पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मोहम्मद मुस्तफा (स) की उस प्रसिद्ध और प्रामाणिक हदीस को बनाया, जो हज़रत ज़हरा (स) की महानता को स्पष्ट करती है। इसमें आपने अपनी प्रिय पुत्री से फरमाया:
«إِنَّ اللهَ يَغْضَبُ لِغَضَبِكِ وَيَرْضَى لِرِضَاكِ»
अर्थात, ऐ फातिमा! निश्चय ही अल्लाह तुम्हारी नाराज़गी पर नाराज़ होता है और तुम्हारी प्रसन्नता पर प्रसन्न होता है।
मौलाना ने शिया हदीस की पुस्तकों, जैसे बिहारुल अनवार, के साथ-साथ प्रमुख सुन्नी पुस्तकों, जैसे हाकिम निशापुरी की अल-मुस्तदरक अलस सहीहैन, के प्रामाणिक संदर्भों का उल्लेख करते हुए इस हदीस के महत्वपूर्ण पहलुओं को बयान किया।
1. पूर्ण मासूमियत का स्पष्ट प्रमाण
मासूम का क्रोध या प्रसन्नता किसी व्यक्तिगत इच्छा या नफ्सानी ख्वाहिश पर आधारित नहीं होती। हज़रत फातिमा ज़हरा (स) की प्रसन्नता को अल्लाह की प्रसन्नता और उनकी नाराज़गी को अल्लाह की नाराज़गी बताया जाना इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि आप हर प्रकार के पाप, चूक और गलती से पाक और पवित्र हैं।
2. हक़ और बातिल की पहचान का सार्वभौमिक मानदंड
सृष्टि में हक़ और बातिल के बीच अंतर करने का वास्तविक पैमाना हज़रत फातिमा ज़हरा (स) का पवित्र व्यक्तित्व है। जिस कार्य, चरित्र या व्यक्ति से सैयदा (स) प्रसन्न हैं, उससे अल्लाह और उसके रसूल भी प्रसन्न हैं। और जिससे हज़रत ज़हरा (स) नाराज़ हैं, वह अल्लाह की बारगाह में अस्वीकार्य है।
3. विलायत और इमामत का केंद्र
सैयदा-ए-कौनैन (स) केवल पैग़म्बरे इस्लाम (स) की पुत्री ही नहीं, बल्कि इमामत और विलायत का केंद्र और धुरी भी हैं। उनकी वास्तविक पहचान और معرفत के बिना ईमान और आज्ञापालन का सफर कभी पूरा नहीं हो सकता।
हज़रत फातिमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा की तस्बीह की फज़ीलत और बरकतें
खुतबे के दौरान मौलाना सैयद अली सज्जाद रिज़वी ने शिया हदीस की पुस्तकों की रोशनी में तस्बीहे फातिमा (स) के सांसारिक और परलोक संबंधी लाभों पर प्रकाश डाला।
तस्बीह का शरई तरीका और क्रम
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34 बार: «اللهُ أَكْبَرُ» (अल्लाहु अकबर)
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33 बार: «الْحَمْدُ لِلَّهِ» (अल्हम्दुलिल्लाह)
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33 बार: «سُبْحَانَ اللهِ» (सुब्हानल्लाह)
मासूमीन (अ) की रिवायतों की रोशनी में इसकी महान फज़ीलतें
पैग़म्बरे इस्लाम (स) का अनमोल उपहार: रिवायतों के अनुसार, पैग़म्बरे इस्लाम (स) ने अपनी पुत्री हज़रत फातिमा ज़हरा (स) को यह तस्बीह प्रदान की और इसे पूरी दुनिया की दौलत से भी अधिक मूल्यवान बताया।
इसके अलावा उन्होंने बयान किया कि इमाम जाफर सादिक (अ) से रिवायत है:
“हर वाजिब नमाज़ के बाद तस्बीहे फातिमा (स) पढ़ना मुझे प्रतिदिन एक हजार रकअत मुस्तहब नमाज़ अदा करने से भी अधिक प्रिय है।”
शैतान से सुरक्षा और गुनाहों की माफी: इमाम मोहम्मद बाकिर (अ) का फरमान है कि जो व्यक्ति नमाज़ के तुरंत बाद, नमाज़ की अवस्था में ही, तस्बीहे ज़हरा (स) पढ़ेगा, अल्लाह उसकी मगफिरत फरमाएगा, शैतान उससे दूर भागेगा और यह ज़िक्र कयामत के दिन उसके आमाल के तराजू में सबसे अधिक वज़नदार होगा।
खुतबे के अंत में मौलाना ने अल्लाह की बारगाह में विशेष दुआ की कि परवरदिगार दुनिया भर के अत्याचारियों को नष्ट करे और दुनिया के तमाम मज़लूमों को जल्द से जल्द अमन, आफियत और सलामती प्रदान करे।
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