हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार , हुज्जतुल इस्लाम सैयद मोहम्मद हुसैन राजी ने हरम-ए-मुतहर-ए-बानू-ए-करामत के इमाम ख़ुमैनी (रह.) सभागार में हज़रत फ़ातिमा ज़हेरा (स.ल.) की शहादत की रात आयोजित मजलिस को संबोधित किया। उन्होंने समाज में प्रतिरोध की भावना कमज़ोर होने के कारणों पर चर्चा करते हुए कहा कि दुश्मन के सामने भयभीत होना और मानसिक रूप से पराजित हो जाना, सत्य के मार्ग पर डटे रहने में सबसे बड़ी बाधाओं में से हैं। उन्होंने धार्मिक मूल्यों और पवित्र मान्यताओं की रक्षा के लिए साहस की आवश्यकता पर ज़ोर दिया।
उन्होंने हज़रत फ़ातिमा ज़हरा (स.) के उन कथनों का उल्लेख किया, जिनमें पैग़म्बरे इस्लाम (स.) के निधन के बाद लोगों की कमज़ोरी और आरामतलबी की आलोचना की गई है। उन्होंने कहा कि प्रतिरोध और संघर्ष की भावना समाप्त हो जाने से समाज गुमराही और विचलन के प्रति असुरक्षित हो जाता है। जिस तरह दुनिया की लालसा इंसान को डटकर खड़े होने से रोकती है, उसी तरह भय और मानसिक पराजय भी लोगों को निर्णायक समय में सत्य का साथ छोड़ने पर मजबूर कर देती है।
हुज्जतुल इस्लाम राजी ने इमाम हुसैन (अ.) द्वारा उबैदुल्लाह बिन हुर जुफ़ी को अपने आंदोलन में शामिल होने का निमंत्रण देने की घटना का उल्लेख करते हुए कहा कि कभी-कभी इंसान को केवल अपनी जान या शारीरिक नुकसान का डर नहीं होता, बल्कि वह अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा और सम्मान खोने से भी डरता है। आज भी कुछ लोग दूसरों के मज़ाक उड़ाने या उनके बारे में गलत राय बनाने के डर से अपनी मान्यताओं को व्यक्त करने और धार्मिक पवित्रताओं की रक्षा करने से बचते हैं। जबकि एक मोमिन को लोगों की राय और फैसले के बजाय अल्लाह की प्रसन्नता को प्राथमिकता देनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि पैग़म्बर और अल्लाह के नेक बंदे भी लोगों का मार्गदर्शन करते समय उपहास और आरोपों का सामना करते रहे हैं। इसलिए किसी व्यक्ति को यह नहीं समझना चाहिए कि सामाजिक सम्मान बनाए रखने के लिए उसे गलत बातों के सामने ख़ामोश रहना पड़ेगा।
हरम-ए-मुतहर के वक्ता ने कहा कि सामाजिक और विश्वविद्यालयी वातावरण में धार्मिक पवित्रताओं के अपमान के विरुद्ध आवाज़ उठाना और ख़ामोशी के माहौल को तोड़ना साहस तथा ज़िम्मेदारी की भावना की मांग करता है।
उन्होंने शहीद सैयद मुर्तज़ा आविनी और शहीद आयतुल्लाह रईसी सहित कुछ धार्मिक एवं क्रांतिकारी हस्तियों का उदाहरण देते हुए कहा कि इतिहास इस बात का गवाह है कि अपने विश्वासों और सिद्धांतों पर डटे रहने वाले लोगों को कभी-कभी उपहास और विरोध का सामना करना पड़ता है, लेकिन समय बीतने के साथ उनकी वास्तविक स्थिति और योगदान सामने आ जाता है।
हुज्जतुल इस्लाम राजी ने ईरान-इराक़ युद्ध के दौर के बहादुर सैनिकों और शहीद क़ासिम मीरहुसैनी जैसे व्यक्तित्वों के साहस का उल्लेख करते हुए नई पीढ़ी को प्रतिरोध के आदर्शों से परिचित कराने की आवश्यकता पर बल दिया।
उन्होंने कहा कि शहीदों की जीवनी, उनके संस्मरण और उनकी सीरत को अगली पीढ़ी तक पहुँचाना परिवारों, शिक्षकों, वक्ताओं और सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं की ज़िम्मेदारी है, ताकि युवा पीढ़ी त्याग, ज़िम्मेदारी और सत्य की रक्षा के महत्व को समझ सके।
अंत में उन्होंने हज़रत फ़ातिमा ज़हरा (स.ल.) की सीरत, ख़ुत्बा-ए-फ़दकिया और विलायत की रक्षा के लिए उनके संघर्ष का उल्लेख करते हुए कहा कि तमाम दबावों और कठिनाइयों के बावजूद हज़रत ज़हरा (स.) ने सत्य बयान करने और विलायत की रक्षा करने से पीछे हटना स्वीकार नहीं किया। उनकी ज़िंदगी आज भी उन सभी लोगों के लिए एक बेहतरीन आदर्श है, जो मुश्किल परिस्थितियों में सत्य और धार्मिक मूल्यों की रक्षा की ज़िम्मेदारी निभाते हैं।
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