बुधवार 4 फ़रवरी 2026 - 12:33
ज़ुहूर के बारे में एक हैरत अंगेज़ हदीस

हौज़ा / यह रिवायत ज़ुहूर-ए-इमाम मेंहदी (अ.स.) से पहले के दौर-ए-ग़फ़लत और फ़ितनों की एक जामेअ तस्वीर पेश करती है और साथ ही मुनजी-ए-इलाही की पोशीदा मौजूदगी पर ज़ोर देती है।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार , इस हदीस में अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली (अ.स.) की एक मुफ़स्सल और निहायत ख़ूबसूरत हदीस के एक हिस्से का ज़िक्र किया गया है, जिसमें आपने मुनजी के ज़ुहूर की बशारत दी है।

इस हदीस के रावी अमीरुल-मोमिनीन अली (अ.स.) हैं और मुख़ातब सहाबी-ए-रसूल हज़रत हुज़ैफ़ा बिन यमान (र.ह.) हैं।

इब्तिदा में हज़रत अली (अ.स.) हज़रत हुज़ैफ़ा (र.) को नसीहत फ़रमाते हैं कि हक़ाइक़ बयान करते वक़्त, ख़ास तौर पर अहल-ए-बैत (अ.स.) के फ़ज़ाइल के सिलसिले में लोगों की फ़िक्री सलाहियत और बर्दाश्त को मद्देनज़र रखा जाए।

इसके बाद आप (अ.स.) अवाम की कोताहियों की तरफ़ इशारा फ़रमाते हैं, जिनके नतीजे में ज़ालिम इक़्तिदार हासिल कर लेते हैं और अहल-ए-बैत (अ.) एक-एक करके शहादत के दर्जे पर फ़ाइज़ होते चले जाते हैं, यहाँ तक कि बात ख़ातिमुल- औसिया हज़रत इमाम मेंहदी (अ.स.) तक पहुँचती है। इस मौक़े पर आप (अ.स.) फ़रमाते हैं,

यहाँ तक कि जब मेरी औलाद में से एक लोगों की निगाहों से ओझल हो जाएगा…

यानी वह वक़्त आएगा जब इमाम-ए-ज़माना (अ.) लोगों की नज़रों से ग़ायब हो जाएँगे, फ़ितना और बलाएँ पूरे मआशरे को घेर लेंगी, शियाओं को गालियाँ दी जाएँगी और लोग अपने बातिल ख़याल के मुताबिक़ यह गुमान करने लगेंगे कि अब कोई हुज्जत-ए-ख़ुदा बाक़ी नहीं रही और इमामत ख़त्म हो चुकी है।

लेकिन अमीरुल-मोमिनीन (अ.स.) फ़रमाते हैं:

ख़ुदा की क़सम! अल्लाह की हुज्जत बाक़ी है।
वह गलियों और रास्तों में चलता-फिरता है, मजालिस में शिरकत करता है, मशरिक़ व मग़रिब में अपने इलाही फ़रीज़े की अंजाम-दही के लिए सफ़र करता है, लोगों को सलाम करता है, मगर लोग उसे पहचान नहीं पाते। वह देखता है लेकिन नज़र नहीं आता, यहाँ तक कि उसके ज़ुहूर का वक़्त आ पहुँचेगा और आसमान से एक मुनादी नदा देगा।

फिर हज़रत अली (अ.स.) फ़रमाते हैं:

आगाह रहो! वह दिन अली की औलाद और उनके पैरोकारों के लिए ख़ुशी और मस्ररत का दिन होगा।

हवाला:

नुअमानी, अल-ग़ैबत, सफ़्हा 142, बाब 10, हदीस 3

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