मंगलवार 17 फ़रवरी 2026 - 06:33
ईरान के धार्मिक शहर क़ुम में हज़रत फ़ातिमा मासूमा (स) की दरगाह में मौलाना अज़ीज़ुल हसन की याद मे ईसाल-ए-सवाब की मजलिस

ईरान के पवित्र शहर क़ुम में मरहूम हुज्जतुल इस्लाम मौलाना सय्यद अज़ीज़ुल हसन आबिदी की याद में ईसला-ए-सवाब की सवाब बड़ी श्रद्धा और सम्मान के साथ आयोजित की गई। इस ईसाले सवाब की मजलिस में बड़ी संख्या में जानकार, जाने-माने लोग, मदरसे के छात्र और मोमेनीन शामिल हुए और मरहूम की विद्वत्तापूर्ण और धार्मिक सेवाओं को श्रद्धांजलि दी।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान के पवित्र शहर क़ुम में मरहूम हुज्जतुल इस्लाम मौलाना सय्यद अज़ीज़ुल हसन आबिदी की याद में ईसला-ए-सवाब की सवाब बड़ी श्रद्धा और सम्मान के साथ आयोजित की गई। इस ईसाले सवाब की मजलिस में बड़ी संख्या में जानकार, जाने-माने लोग, मदरसे के छात्र और मोमेनीन शामिल हुए और मरहूम की विद्वत्तापूर्ण और धार्मिक सेवाओं को श्रद्धांजलि दी।

ईरान के धार्मिक शहर क़ुम में हज़रत फ़ातिमा मासूमा (स) की दरगाह में मौलाना अज़ीज़ुल हसन की याद मे ईसाल-ए-सवाब की मजलिस

मजलिस की शुरुआत पवित्र कुरान की तिलावत से हुई, जिसके बाद हौज़ा ए इल्मिया क़ुम के एक सक्रिय उपदेशक और वक्ता मौलाना अमीर अब्बास आबिदी ने संबोधित किया और मरहूम की ज्ञान भरी ज़िंदगी पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि मौलाना सय्यद अज़ीज़ुल हसन आबिदी ने अपनी ज़िंदगी इस्लाम के उपदेश, पढ़ाने और स्टूडेंट्स को ट्रेनिंग देने में लगा दी थी। उनकी सादगी, विनम्रता और काम करने की ईमानदारी उन्हें दूसरे विद्वानों से अलग बनाती थी।

संबोधन के दौरान, हज़रत अमीरुल मोमिनीन अली इब्न अबी तालिब (अ) की एक हदीस बयान की जिसमें उन्होंने कहा था कि “जो विद्वान अपने पीछे ज्ञान छोड़ जाता है, वह कभी नहीं मरता।” इस मशहूर वक्ता ने इस बात को समझाते हुए कहा कि असली ज़िंदगी शरीर की नहीं, बल्कि ज्ञान और किरदार की होती है। अगर कोई विद्वान अपने पीछे ज्ञान, स्टूडेंट्स और एक बौद्धिक विरासत छोड़ जाता है, तो वह अपनी विरासत के ज़रिए हमेशा ज़िंदा रहेगा। मौलाना सय्यद अज़ीज़ुल हसन आबिदी की पर्सनैलिटी का भी यही मतलब था।

ईरान के धार्मिक शहर क़ुम में हज़रत फ़ातिमा मासूमा (स) की दरगाह में मौलाना अज़ीज़ुल हसन की याद मे ईसाल-ए-सवाब की मजलिस

मौलाना आमिर आबिदी ने आगे कहा कि मरहूम भारत के नौगवान सादात की उपजाऊ और पढ़ाई-लिखाई वाली बस्ती से थे और उन्होंने भारत और ईरान के पढ़ाई-लिखाई वाले सेंटर्स में सेवा की। उनकी सीख और बातों से बहुत से लोगों को फ़ायदा हुआ, और आज भी उनके स्टूडेंट अलग-अलग इलाकों में धार्मिक रूप से सेवा कर रहे हैं, जो उनकी पढ़ाई-लिखाई में निरंतरता का साफ़ सबूत है।

ईरान के धार्मिक शहर क़ुम में हज़रत फ़ातिमा मासूमा (स) की दरगाह में मौलाना अज़ीज़ुल हसन की याद मे ईसाल-ए-सवाब की मजलिस

आखिर में मरहूम के लिए एक साथ दुआ की गई, उनके दरजात की बुलंदी और मग़फ़ेरत की दुआ की गई। मजलिस मे शामिल होने वालों ने मरहूम के ज्ञान और उनके मिशन को जारी रखने में अपनी भूमिका निभाने का पक्का इरादा जताया, ताकि उनकी ज्ञान की रोशनी हमेशा रोशन रहे।

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