हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार ,जनरल सैयद अली हुसैनी-निया, कमांडर सिपाह ज़िला कंगान, ने आज शहर बनक में शहीद यूसुफ़ हाजी-पूर की यादगारी तक़रीब में शहादत के आला मुक़ाम पर तअकीद करते हुए कहा कि हमारे शोहदा ने ख़ुदा से आगाहाना सौदा किया और इंसानी मरतबे की बुलंद तरीन मंज़िल हासिल की उन्होंने इस्लाम को ज़िंदा रखने के लिए अपनी जान क़ुर्बान कर दी।
उन्होंने कहा कि जभा-ए-इस्तेक़बार और सियूनी रेजीम की इस्लामी जम्हूरिया से अस्ल दुश्मनी की जड़ इस्लाम है। उन्होंने अफ़ज़ूद किया कि वह दिन हरगिज़ नहीं आएगा जब इस्राईल इस सरज़मीन पर क़दम रख सके, मगर यह कि इस मुल्क में कोई पासदार या बसीजी बाक़ी न रहे। और ऐसा दिन कभी नहीं आएगा।
कमांडर ने क़ुरआनी वादों की तरफ़ इशारा करते हुए कहा कि क़ुरआन करीम ने सबको जन्नत का वादा नहीं दिया, बल्कि यह वादा हक़ीक़ी मोमिनीन, सालिहीन और राह-ए-ख़ुदा में जिहाद करने वालों के लिए मख़सूस है; वे लोग जिनके आमाल को अल्लाह ज़ाए नहीं करता, उन्हें हिदायत देता है और उस जन्नत में दाख़िल करता है जिससे पहले ही उन्हें आगाह कर दिया गया है।
हुसैनी-निया ने शहीद हाज क़ासिम सुलेमानी के क़ौल का हवाला देते हुए कहा,जब तक शहीद न बनो, शहीद नहीं बनोगे।” यानी इंसान को पहले अमलन ख़िदमतगुज़ार-ए-ख़ल्क़ होना चाहिए और शोहदा की सिफ़ात अपने अंदर पैदा करनी चाहिए, तब ही उसे मक़ाम-ए-शहादत नसीब होता है।
उन्होंने शहीद यूसुफ़ हाजी-पूर की याद को ताज़ा करते हुए कहा कि दुनिया, ख़ानदान और औलाद से गुज़र जाना बहुत मुश्किल है, लेकिन शोहदा ने इन तअल्लुक़ात से ऊपर उठकर बुलंदतर वाबस्तगी का इंतिख़ाब किया और अपनी जान राह-ए-ख़ुदा में पेश कर दी; जैसा कि शहीद हुज्जाजी की विदाई के मंज़र में यह बात वाज़ेह तौर पर दिखाई दी।
उन्होंने आख़िर में तअकीद की कि ये शोहदा इसलिए गए ताकि इस्लाम ज़िंदा रहे, और हम सबकी ज़िम्मेदारी है कि उनके बुलंद मक़ाम की क़द्रदानी करें और उनके रास्ते को जारी रखें।
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