बुधवार 8 अप्रैल 2026 - 11:01
आयतुल्लाह ख़ामेनई का व्यक्तित्व आफ़ाकी हो चुका हैः डॉ. अब्दुल मजीद हकीम इलाही

लखनऊ के बड़े इमामबाड़े में आयतुल्लाह ख़ामेनई की शहादत की याद में ऐतिहासिक जलसा 'याद-ए-शोहदा' संपन्न हुआ, जिसमें विभिन्न धर्मों और मसलकों के उलेमा व दानिशवरों ने शिरकत की। मौलाना कल्बे जवाद नक़वी ने अपने ख़िताब में कहा कि ट्रंप जंग हार चुका है, इसलिए बद कलामी कर रहा है।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, लखनऊ /इस्लामी क्रांति के सुप्रीम लीडर शहीद आयतुल्लाह अल-उज़मा सय्यद अली ख़ामेनई रिज़वानुल्लाह तआला अलैह और सभी शोहदा-ए-मुक़ावमत की याद में लखनऊ के ऐतिहासिक आसफ़ी इमामबाड़े में एक जलसा 'याद-ए-शोहदा' के नाम से आयोजित हुआ। जिसमे भारत मे सुप्रीम लीडर के प्रतिनिधि हुज्जतुल-इस्लाम वल-मुस्लेमीन डॉ. अब्दुल मजीद हकीम इलाही ने ख़ुसूसी शिरकत की। जलसे में बिलातफ़रीक़ मज़हब ओ मसलक उलेमा और दानिशवर हुज़रात तशरीफ़ लाए। बड़ा इमामबाड़ा आयतुल्लाह ख़ामेनई के मुरीदों से छलक रहा था, जिसमें सबी मसलकों के लोग शामिल थे। जलसे में शामिल सभी मुक़र्ररीन ने ईरान से यकजहती का इज़हार किया और अमेरिकी व इसराइली हमलों की मज़म्मत की। जलसे में अमेरिका और इसराइल के ख़िलाफ़ 'मुर्दाबाद' के नारे भी लगाए गए। जलसे में मीनाब की शहीद मासूम बच्चियों, ग़ज़ा के शहीद बच्चों और शहीद सहाफ़ियों (पत्रकारों) की याद में एक नुमाइश भी लगाई गई थी। आयतुल्लाह ख़ामेनई की शहादत की याद में ख़ून के अत्तिया  के लिए कैम्प लगा था, जिसमें बिलातफ़रीक़ अवाम ने हिस्सा लिया। यह जलसा मोमिनीन-ए-लखनऊ, अंजुमन-ए-हाय-ए-मातमी और उलेमा-ए-किराम की तरफ़ से मजलिस-ए-उलेमा-ए-हिंद के तत्वाधान मे आयोजित हुआ।

पूरी तस्वीरे देखेःलखनऊ में आयतुल्लाह ख़ामेनई की शहादत की याद में बड़े इमामबाड़े में ऐतिहासिक जलसा 'याद-ए-शोहदा' का आयोजन

जलसे का आग़ाज़ क़ारी हुज्जतुल-इस्लाम वल-मुस्लेमीन ज़ियाई निया ने तिलावत-ए-क़ुरआन-ए-मजीद से किया। उनके बाद बाक़ायदा जलसे का आग़ाज़ हुआ। मौलाना इश्तियाक़ अहमद अंसारी ने अपनी तक़रीर में इसराइली व अमेरिकी हमले में शहीद हुई मुनाफ़ के स्कूल की बच्चियों को ख़िराज-ए-अक़ीदत पेश करते हुए कहा कि जो लोग मासूम बच्चों का गोश्त खाते हैं, वह कभी मासूम बच्चों पर रहम नहीं खा सकते। उन्होंने कहा कि यह जंग शिया-सुन्नी की नहीं, बल्कि हक़ व बातिल की जंग है।

मुफ़्ती नूरुल ऐन मुस्बाही बहराइची ने कहा कि हम आयतुल्लाह ख़ामेनई के अज़्म और बसीरत को सलाम करते हैं। उन्होंने अपनी शहादत देकर ज़ालिमों और दहशतगर्दों को बेनक़ाब कर दिया। सिख समाज के नुमाइंदे जनाब प्रताप सिंह सलूजा ने अपनी तक़रीर में कहा कि ईरान ने हमेशा हिंदुस्तान की हिमायत की और हमें रियायत पर तेल और गैस देता था, लेकिन हमारी हुकूमत ने अमेरिका से तेल लेना शुरू कर दिया और हम पर अतिरिक्त टैरिफ भी लगाया। उन्होंने कहा कि हम ट्रंप और नेतन्याहू की पॉलिसियों की हिमायत नहीं कर सकते। उन्होंने आयतुल्लाह ख़ामेनई की शहादत और अज़्म को सलाम पेश किया।

मजलिस-ए-इत्तेहाद-उल-मुस्लेमीन के तरजुमान आसिम वक़ार ने कहा कि मुसलमानों में क़ुव्वत-ए-अमल और क़ुव्वत-ए-फ़िक्र ख़त्म हो चुकी है, इसलिए हम ज़वाल (पतन) का शिकार हैं। उन्होंने कहा कि अमेरिका और इसराइल की एजेंसियाँ यह प्रोपेगंडा कर रही हैं कि ईरान शिया मुल्क है जो सुन्नी मुल्कों पर हमला कर रहा है, लेकिन याद रहे यह जंग शिया-सुन्नी की नहीं, बल्कि हक़ और बातिल का मैदान है। इस वक़्त वह मुस्लिम मुल्क कहाँ थे जब उनके इत्तेहादी (सहयोगी) ग़ज़ा और फ़लस्तीन पर हमला कर रहे थे? उन्होंने कहा कि ईरान किसी मुल्क का दुश्मन नहीं, बल्कि ज़ालिम हुक्मरानों का दुश्मन है, आले मरहब का दुश्मन है।

स्वामी सारंग ने अपनी तक़रीर में ईरान की हिमायत करते हुए कहा कि ईरान की क़ौम कर्बला की क़ौम है, उसे शिकस्त नहीं दी जा सकती।

रामानंद फाउंडेशन के सदर महाराज आनंद नारायण ने कहा कि ईरान अपने दिफ़ा (बचाव) की जंग लड़ रहा है। ईरान ने किसी मुल्क पर हमला नहीं किया, बल्कि उस पर हमला किया गया है, लिहाज़ा ईरान को अपने दिफ़ा का हक़ हासिल है। उन्होंने आयतुल्लाह ख़ामेनई की शहादत को सलाम पेश करते हुए लखनऊ के अवाम के जज़्बे को भी सराहा। कानपुर से तशरीफ़ लाए धनी राम बोध ने पैंथर दलित समाज की तरफ़ से आयतुल्लाह ख़ामेनई को ख़िराज-ए-अक़ीदत पेश करते हुए कहा कि ईरान ने दुनिया को यह बता दिया कि न हम ज़ुल्म करते हैं और न ज़ुल्म बर्दाश्त करते हैं। पास्टर संजय आलैन ने भी ईरान से यकजहती का इज़हार किया और ट्रंप के दहशतगर्दाना हमलों की मज़म्मत की। उन्होंने कहा कि हम ईरान पर अमेरिकी हमले की मज़म्मत करते हैं और ईरान की हिमायत का एलान करते हैं। हाजी सलीस अंसारी ने कहा कि ईरान को ज़ालिम ताक़तें शिकस्त नहीं दे सकतीं, क्योंकि ईरान हक़ की लड़ाई लड़ रहा है। उन्होंने कहा कि यह वक़्त तमाम इख़्तिलाफ़ात को भुला देने का है। जब तक हम मुत्तहिद (एकजुट) नहीं होंगे, कामयाब नहीं हो सकते।

मौलाना जहाँगीर आलम क़ासमी ने कहा कि हमें मुत्तहिद होकर ज़ालिमों का मुक़ाबला करना चाहिए। उन्होंने कहा कि अगर मुसलमान लड़ते रहे, तो दुश्मन उन पर हावी होते जाएंगे। कांग्रेस के रियासती सदर अजय राय ने कहा कि हम आज एक बहादुर शख़्सियत को ख़िराज-ए-अक़ीदत पेश करने के लिए जमा हुए हैं, जिसे पूरी दुनिया उसकी बहादुरी के लिए याद कर रही है, जिसने आलमी ताक़तों को अपने जूती की नोक पर रखा। उन्होंने कहा कि भारत सबका है और ऐसे बहादुरों को सलाम करता है। साबिक़ (पूर्व) आईएएस अफ़सर अनिस अंसारी ने कहा कि हिंदुस्तान के सारे अवाम और सियासी जमातें ईरान के साथ खड़ी हैं, सिवाए चंद लोगों के जो यरक़ानी (यहूदी) तंज़ीमों से वाबस्ता हैं। उन्होंने कहा कि हिंदुस्तान के जितने लोग ईरान की हिमायत कर रहे हैं, वह सब मुसलमान नहीं हैं, मगर वह हक़ की हिमायत कर रहे हैं।

लखनऊ यूनिवर्सिटी के साबिक़ प्रोफ़ेसर डॉ. रमेश दीक्षित ने कहा कि हम आयतुल्लाह ख़ामेनई को ख़िराज-ए-अक़ीदत पेश करते हैं और तमाम उन शोहदा को ख़िराज-ए-अक़ीदत पेश करते हैं जो इंसानियत के लिए क़ुरबान हुए। उन्होंने कहा कि हम ईरान की क़यादत और उनके अवाम के हौसले और जज़्बे को सलाम करते हैं कि जिस तरह उन्होंने ज़ालिम और सुपर पॉवर्स का मुक़ाबला किया है। यह इंसाफ़ और हक़ की लड़ाई है, जिसकी हिमायत करनी चाहिए।

मौलाना बाबर अशरफ़ कछौछवी ने अपनी तक़रीर में कहा कि हुसैनी कभी यज़ीदी ताक़त से नहीं डरते। उन्होंने कहा कि दुनिया में जहाँ भी नस्ल-कुशी हुई, उसमें अमेरिका जैसी ताक़तों का हाथ रहा है। उन्होंने कहा कि जब तक मुसलमान मुहब्बत-ए-अहलेबैत पर मुत्तहिद नहीं होंगे, तब तक उन्हें कामयाबी नहीं मिलेगी। मशहूर समाजकार्यकर्ता संदीप पांडे ने कहा कि अमेरिका और इसराइल ने गुज़िश्ता चंद सालों में हज़ारों बेगुनाहों का क़त्ले आम किया, जिस पर दुनिया ख़ामोश रही। उन्होंने कहा कि ईरान में तालीम का फीसदी सबसे ज़्यादा है, वहाँ कोई ऐसा बच्चा नहीं जो स्कूल न जाता हो, लिहाज़ा हमें ईरान की ताक़त को सही तौर पर समझना होगा। जिस क़ौम के पास मज़बूत क़यादत और शुजाअ अवाम हो, उसे कोई ताक़त शिकस्त नहीं दे सकती।

मजलिस-ए-उलेमा-ए-हिंद के जनरल सेक्रेटरी मौलाना कल्बे जवाद नक़वी ने तक़रीर करते हुए तमाम मेहमानों और शिरका करने वालों का शुक्रिया अदा किया। उन्होंने कहा कि ईरान ने ज़ालिमों की बैअत को क़बूल नहीं किया, इसलिए उस पर हमले किए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि अरब मुल्क अमेरिका और इसराइल के ग़ुलाम हैं। मोहम्मद बिन सलमान की मौजूदगी में अमेरिकी सदर ट्रंप ने कई बार उसको ज़लील किया और फ़हश कलामी तक की, मगर मोहम्मद बिन सलमान ने कोई रिएक्शन नहीं दिया, इससे अंदाज़ा होता है कि उनकी ग़ुलामी का आलम क्या है। उन्होंने कहा कि यह ख़ादिम-ए-हरमैन-शरीफ़ैन नहीं, बल्कि अमेरिका और इसराइल के ख़ादिम हैं। मौलाना ने कहा कि ट्रंप का फ़हश लहजा बतला रहा है कि वह जंग हार चुका है। फ़ातिह (विजेता) कभी गालियाँ नहीं बकता, मगर शिकस्त-ख़ुर्दा (पराजित) गालियाँ बकता है। उन्होंने कहा कि ट्रंप आज का नमरूद है। जो हश्र कल के नमरूद का हुआ था, वही आज के नमरूद का होगा। उन्होंने कहा कि कश्मीर और दीगर इलाक़ों में जिन नौजवानों को रहबर-ए-इंकिलाब की हिमायत के जुर्म में गिरफ़्तार किया गया है, उन्हें फ़ौरन रिहा किया जाए। मौलाना ने कहा कि अगर बिलातफ़रीक़ मज़हब ओ मसलक हिंदुस्तान के अवाम ईरान की हिमायत न करते, तो तेल और गैस की सप्लाई बंद हो जाती। आबनाए-हुरमुज़ से अगर हिंदुस्तानी जहाज़ गुज़र रहे हैं, इसमें हुकूमत का किरदार नहीं, बल्कि अवाम की हिमायत की बिना पर है। उन्होंने कहा कि जो लोग हिंदुस्तान में हिंदू-मुस्लिम के दरमियान नफ़रत फैला रहे हैं, उन्हें शर्म आनी चाहिए, क्योंकि उनके घरों के चूल्हे भी मुस्लिम मुल्कों की बिना पर जल रहे हैं। मौलाना ने मज़ीद कहा कि हिंदुस्तान का हिंदू और मुसलमान अब नफ़रत फैलाने वालों के अज़ाइम (इरादों) को समझ चुका है, इसलिए ईरान के साथ जंग के मौके पर बिलातफ़रीक़ अवाम ने ईरान की हिमायत की। मौलाना ने रहबर-ए-इंकिलाब-ए-इस्लामी की शहादत पर हुकूमत की तरफ़ से ताज़ियती पैग़ाम जारी न होने की भी मज़म्मत की।

आख़िर में मजलिस को ख़िताब करते हुए नुमाइंदा-ए-वली-ए-फ़क़ीह हिंद हुज्जतुल-इस्लाम वल-मुस्लेमीन डॉ. अब्दुल मजीद हकीमुल्लाही ने कहा कि इस जलसे में मुख़्तलिफ़ मज़हबों और मसलकों के लोग मौजूद हैं, जो इस बात की दलील है कि हिंदुस्तान के अवाम ईरान के साथ हैं। उन्होंने ईरान की हिमायत पर पूरे हिंदुस्तान के अवाम का तहे-दिल से शुक्रिया अदा किया। उन्होंने कहा कि लखनऊ मरकज़-ए-इल्म व तहज़ीब का गहवारा रहा है और आज भी है। इस शहर की अज़ीम और ताबिंदा तारीख़ है। इस शहर में कई तारीख़ी और इल्मी काम अंजाम पाए। उन्होंने कहा कि रहबर-ए-इंकिलाब-ए-इस्लामी की शहादत के बाद जिस तरह लखनऊ के अवाम ने बिलातफ़रीक़ ईरान से यकजहती और हिमायत का एलान किया, वह बेमिसाल था, जिसके लिए मैं आपके शहर के लोगों का शुक्रिया अदा करता हूँ। उन्होंने मज़ीद कहा कि आयतुल्लाह ख़ामेनई अपने अफ़कार (विचारों) की बिना पर ज़माना ओ मकान की क़ैद से आज़ाद हो चुके हैं। उनका शख़्सियत अब आफ़ाकी है। उन्होंने कहा कि अगर किसी को बक़ाए अबद (हमेशा की ज़िंदगी) हासिल करनी है, तो उसे चाहिए कि उससे मुल्हक़ हो जाए जो ज़माना और मकान में मुक़य्यद नहीं। उन्होंने मज़ीद कहा कि आयतुल्लाह ख़ामेनई एक बेहतरीन शायर और माया-ए-नाज़-ए-आलम थे, मगर उन्होंने कभी इसका इज़हार नहीं किया। उन्होंने कहा कि आयतुल्लाह ख़ामेनई की पूरी ज़िंदगी इंसानियत की फ़लाह ओ बहबूद में गुज़री। उन्होंने कभी दुनिया के मज़लूमों को तन्हा नहीं छोड़ा। उन्होंने मज़ीद कहा कि आयतुल्लाह ख़ामेनई ने सादा ज़िंदगी बसर की। उनका लिबास, ग़िज़ा, यहाँ तक कि रहन-सहन मामूली होता था। इन सिफ़ात के हामिल उनके फ़रज़ंद आयतुल्लाह मुज्तबा ख़ामेनई हैं। उन्होंने आख़िर में कहा कि जंग जितनी बढ़ती जा रही है, ईरान की ताक़त मज़ीद दुनिया के सामने आ रही है। उन्होंने कर्बला के मैदान में इमाम हुसैन की शहादत के वाक़िये को बयान करते हुए तक़रीर को ख़त्म किया। तक़रीर के बाद उन्होंने दुनिया में अमन और इस्तेहकाम के लिए दुआ भी करवाई। तक़रीर का तर्जुमा मौलाना तक़ी हैदर नक़वी ने किया।

जलसे में टीले वाली मस्जिद के इमाम मौलाना फ़ज़ल-ए-मन्नान रहमानी, मौलाना ज़ैनुल हैदर अलवी काकोरवी, समाजवादी पार्टी के रुक्न मोहम्मद अब्बाद, श्रीनगर कश्मीर से तशरीफ़ लाए मौलाना मक़बूल हुसैन ने भी जलसे को ख़िताब किया। मौलाना साबिर अली उमरानी और देवा शरीफ़ की मस्जिद के इमाम मौलाना आज़म अली वारिसी ने मंज़ूम (शेर के रूप में) नज़राना-ए-अक़ीदत पेश किया। जलसे में मौजूद तमाम मुक़र्ररीन ने अमेरिका और इसराइली हमलों की मज़म्मत की और ईरान की हिमायत का एलान किया। जलसे में बड़ी तादाद में उलेमा और दानिशवरान मौजूद रहे, ख़ुसूसन जनाब डॉ. यासूब अब्बास, मौलाना सैफ़ अब्बास, मौलाना अख़्तर अब्बास जून, मौलाना मोहम्मद मियाँ आबेदी, मौलाना अली अब्बास ख़ान, मौलाना रज़ा इमाम, जनाब सुरेंद्र पाल सिंह (सिख गुरुद्वारा कमेटी के रुक्न), पीरज़ादा शेख़ नासिर अली मिनाई, मौलाना हसनैन वारिसी (इलाहाबाद), सरदार सुरेंद्र सिंह बप्पी, मौलाना तनवीर अब्बास, मौलाना हामिद हुसैन (कानपुर), मौलाना इल्मदार हुसैन (कानपुर), मौलाना अज़हर अब्बास (कानपुर), मौलाना अनवर (कानपुर), मौलाना शबाब हैदर (सरसी), मौलाना सक़लैन बाक़री, मौलाना मिर्ज़ा जाफ़र अब्बास, मौलाना मिर्ज़ा रज़ा अब्बास, मौलाना रज़ा हुसैन, मौलाना निसार अहमद (ज़ैनपुरी), मौलाना आलम मेहदी (ज़ैदपुरी), मौलाना तसनीम मेहदी, मौलाना अनवर हुसैन (इटावा), मौलाना मुमताज़ जाफ़र, मौलाना फ़िरोज़ अली (बनारसी), मौलाना अली मुहज़्ज़ब ख़िरद, मौलाना कमरुल हसन, मौलाना सिराज हुसैन, डॉ. अरशद जाफ़री, मौलाना इफ़्तिख़ार इंक़लाबी, मौलाना हैदर अब्बास रिज़वी, मौलाना सईदुल हसन, मौलाना मकातिब अली ख़ान, मौलाना अली हाशिम आबेदी, मौलाना मुशाहिद आलम, मौलाना शम्सुल हसन, मौलाना तहज़ीबुल हसन, मौलाना मोहम्मद अली, मौलाना शाहनवाज़ हैदर, मौलाना मोहम्मद मूसा, मौलाना ग़ुलाम रज़ा, डॉ. हैदर मेहदी, मौलाना मूसा रज़ा, मौलाना फ़ैज़ अब्बास, मौलाना इजाज़ हैदर, डॉ. कल्बे सिब्तैन नूरी, मौलाना एहतेशामुल हसन और दीगर उलेमा, अफ़ाज़िल, तलबा व तालिबात-ए-मदारिस और शहर की मोअज़्ज़ज़ शख़्सियतें शामिल थीं।

आयतुल्लाह ख़ामेनई का व्यक्तित्व आफ़ाकी हो चुका हैः डॉ. अब्दुल मजीद हकीम इलाही

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