सोमवार 29 जून 2026 - 15:41
मौलाना सलमान नदवी साहस और दूरदर्शिता के उज्ज्वल दीप थे: मौलाना सय्यद करामत हुसैन जाफ़री

प्रसिद्ध लेखक हुज्जतुल इस्लाम मौलाना सय्यद करामत हुसैन शऊर जाफ़री ने क़ुरआन के प्रतिष्ठित अहले-सुन्नत व्याख्याकार और इस्लामी चिंतक मौलाना सय्यद सलमान हुसैनी नदवी के निधन पर गहरा दुःख और शोक व्यक्त करते हुए उन्हें ज्ञान, साहस, सत्यनिष्ठा, उम्मत की एकता तथा पैग़म्बर-ए-इस्लाम (स) के अहले-बैत से प्रेम का उज्ज्वल प्रतीक बताया। उन्होंने कहा कि मौलाना के निधन से इस्लामी जगत एक निर्भीक बौद्धिक और वैचारिक व्यक्तित्व से वंचित हो गया है।

 हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, प्रसिद्ध लेखक हुज्जतुल इस्लाम मौलाना सय्यद करामत हुसैन शऊर जाफ़री ने क़ुरआन के प्रतिष्ठित अहले-सुन्नत व्याख्याकार और इस्लामी चिंतक मौलाना सय्यद सलमान हुसैनी नदवी के निधन पर गहरा दुःख और शोक व्यक्त करते हुए उन्हें ज्ञान, साहस, सत्यनिष्ठा, उम्मत की एकता तथा पैग़म्बर-ए-इस्लाम (स) के अहले-बैत से प्रेम का उज्ज्वल प्रतीक बताया। उन्होंने कहा कि मौलाना के निधन से इस्लामी जगत एक निर्भीक बौद्धिक और वैचारिक व्यक्तित्व से वंचित हो गया है।

शोक संदेश इस प्रकार है:

इन्ना लिल्लाहे व इन्ना इलैहे राजेऊन।

कभी-कभी इतिहास के आकाश से ऐसा सितारा अस्त हो जाता है कि केवल एक परिवार, एक संस्था या एक शिक्षण-परंपरा ही नहीं, बल्कि पूरा बौद्धिक संसार अंधकार का अनुभव करने लगता है। कुछ व्यक्तित्व समय की सीमाओं में बंधे नहीं होते, बल्कि वे अपने युग की आवाज़, अपनी कौम की चेतना और अपने समय का विवेक बन जाते हैं। जब वे विदा होते हैं तो ऐसा लगता है मानो ज्ञान का एक उज्ज्वल अध्याय समाप्त हो गया, चिंतन का एक दीप बुझ गया और सत्य को निर्भीकता से कहने वाली एक प्रभावशाली आवाज़ हमेशा के लिए मौन हो गई।

आज ऐसी ही एक खबर ने हृदय को दुःख और पीड़ा से भर दिया है। काश यह समाचार असत्य होता, काश यह केवल एक अफ़वाह सिद्ध होती, लेकिन तक़दीर के निर्णय के सामने सभी को सिर झुकाना पड़ता है।

मौलाना सय्यद सलमान हुसैनी नदवी उन गिने चुने विद्वानों में से थे जिन्होंने ज्ञान को केवल पुस्तकों के पन्नों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे उम्मत की जागृति, समाज के दर्द, पीड़ितों के समर्थन और सत्य की निर्भीक अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया। अरबी और उर्दू दोनों भाषाओं पर उनका असाधारण अधिकार, हदीस और इस्लामी ज्ञान में गहरी विशेषज्ञता, अध्यापन में उत्कृष्टता, दावत-ए-दीन में निष्ठा तथा मुस्लिम उम्मत के सामूहिक प्रश्नों के प्रति उनकी गहरी संवेदनशीलता उनके व्यक्तित्व की प्रमुख विशेषताएँ थीं।

उनकी शिक्षण-परंपरा केवल हदीस पढ़ाने का केंद्र नहीं थी, बल्कि विचार और शोध की उर्वर भूमि थी। वे अपने विद्यार्थियों को तर्क, अनुसंधान और सत्य की खोज के लिए प्रेरित करते थे। यही कारण है कि उनके हजारों शिष्य आज विश्व के विभिन्न देशों में इस्लाम की सेवा कर रहे हैं।

उनकी वास्तविक पहचान केवल उनका ज्ञान नहीं, बल्कि उनकी सत्यनिष्ठा थी। उन्होंने कभी भी सुविधा या समझौते को सत्य पर प्राथमिकता नहीं दी। विरोध, फ़तवों, आलोचनाओं और चरित्र-हनन के प्रयासों के बावजूद उनके कदम कभी डगमगाए नहीं। वे जानते थे कि सत्य का मार्ग आसान नहीं होता, लेकिन यही नबियों, सिद्दीक़ों और नेक लोगों का मार्ग है।

उन्होंने अहले-बैत-ए-रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि व सल्लम से प्रेम को ईमान की आत्मा बताया और ग़दीर, कर्बला, ख़िलाफ़त, इमामत तथा इस्लामी इतिहास जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर अपने अध्ययन और शोध के आधार पर निर्भीकता से विचार व्यक्त किए। विरोध के बावजूद उन्होंने कभी मौन का मार्ग नहीं अपनाया और सत्य बोलने को अपना जीवन-सिद्धांत बनाए रखा।

ऐसा प्रतीत होता है कि उन्होंने अपने व्यावहारिक जीवन में हज़रत अबू ज़र ग़िफ़ारी रज़ियल्लाहु अन्हु के चरित्र को अपना आदर्श बनाया। अत्याचार के विरुद्ध आवाज़ उठाना, पीड़ितों का साथ देना और अल्लाह की प्रसन्नता को हर प्रकार की सांसारिक सुविधा से ऊपर रखना उनके व्यक्तित्व की विशिष्ट पहचान थी।

उनकी वाणी मुस्लिम उम्मत के दर्द की प्रतिनिधि थी और उनकी लेखनी समाज-सुधार की भावना से परिपूर्ण थी। फ़िलिस्तीन, यमन, इराक, सीरिया और विश्वभर के उत्पीड़ित मुसलमानों के मुद्दों पर वे सदैव मुखर रहे। वे मुस्लिम शासकों की उदासीनता की आलोचना करते थे और साम्राज्यवादी शक्तियों के विरुद्ध प्रतिरोध तथा आत्मसम्मान के समर्थन को मुस्लिम उम्मत की गरिमा का आधार मानते थे। विशेष रूप से वे ईरान की दृढ़ता और साम्राज्यवादी दबाव के सामने उसके अडिग रुख को मुस्लिम उम्मत के सम्मान और साहस का प्रतीक मानते थे।

उन्होंने अनेक मदरसों और शैक्षिक संस्थानों की स्थापना की, हजारों विद्यार्थियों का बौद्धिक और नैतिक निर्माण किया, क़ुरआन, हदीस, दावत और इस्लामी चिंतन पर बहुमूल्य पुस्तकें लिखीं तथा अपना संपूर्ण जीवन ज्ञान, शिक्षा, दावत और समाज-सुधार के लिए समर्पित कर दिया।

आज वे अपने पालनहार के समक्ष उपस्थित हो चुके हैं। विद्वानों ने एक निष्कपट शिक्षक खो दिया, विद्यार्थियों ने एक स्नेही मार्गदर्शक खो दिया और मुस्लिम उम्मत एक निर्भीक आवाज़ से वंचित हो गई।

अल्लाह तआला मौलाना सय्यद सलमान हुसैनी नदवी रहमतुल्लाह अलैह की पूर्ण मग़फ़िरत फरमाए, उनकी त्रुटियों को क्षमा करे, उनकी क़ब्र को नूर, रहमत और शांति का केंद्र बनाए, उन्हें रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि व सल्लम, अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली अलैहिस्सलाम, हज़रत फ़ातिमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा, इमाम हसन अलैहिस्सलाम और इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की निकटता में स्थान प्रदान करे, उनकी शैक्षिक और दावती सेवाओं को सदक़ा-ए-जारिया बनाए, उनके शिष्यों और उनके ज्ञान-विरासत को क़ियामत तक जीवित रखे तथा उनके समस्त परिजनों और विद्वानों को सब्र-ए-जमील प्रदान करे।

वे इस संसार से अवश्य विदा हो गए हैं, लेकिन सत्य के मार्ग पर चलने वालों के इतिहास में उनका नाम ज्ञान, दृढ़ता, साहस, निष्कपटता और अहले-बैत-ए-रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि व सल्लम से प्रेम के प्रतीक के रूप में सदैव जीवित रहेगा।

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