हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार ,हरम ए हज़रत मासूमा (स.अ.) के खातिब हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन आरिफ़ पीरदेहक़ान ने कहा कि समाज के इमाम और नेता की आज्ञा का पालन करना, भले ही उसके पीछे की पूरी हिकमत समझ में न आए, मोमिन की पहचान है। उन्होंने कहा कि क़ुरआन में वर्णित तालूत और जालूत का प्रसंग यह स्पष्ट करता है कि इमाम के साथ चलना और उसके आदेश का पालन करना ही निजात का मार्ग है।
उन्होंने हरम में आयोजित क़ुरआन-तफ़सीर कार्यक्रम में सूरह अल-बक़रह की आयतों की व्याख्या करते हुए कहा कि अल्लाह की परीक्षा और आज़माइश का नियम हर दौर में लागू होता है। तालूत और जालूत की कहानी इसी दिव्य परंपरा का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है।
उन्होंने बताया कि जब बनी इस्राईल जालूत के अत्याचारों से परेशान हुए, तो उन्होंने अपने नबी से एक सेनापति नियुक्त करने का अनुरोध किया। अल्लाह ने तालूत को उनका नेता बनाया, लेकिन कुछ लोगों ने उनकी योग्यता पर सवाल उठाए। इसके बावजूद अल्लाह ने स्पष्ट निशानियों के माध्यम से उनके नेतृत्व को सिद्ध किया।
पीरदेहक़ान ने कहा कि इसके बाद अल्लाह ने तालूत की सेना की एक नदी के माध्यम से परीक्षा ली। तालूत ने आदेश दिया कि कोई भी सैनिक नदी का पानी न पिए, केवल आवश्यकता हो तो एक मुट्ठी पानी ले सकता है। इस परीक्षा में लोग तीन समूहों में बँट गए कुछ ने भरपेट पानी पी लिया और सेना से अलग हो गए, कुछ ने केवल एक मुट्ठी पानी लिया और कुछ ने बिल्कुल पानी नहीं पिया तथा तालूत के साथ डटे रहे।
उन्होंने आगे कहा कि जब तालूत की सेना का सामना जालूत की विशाल सेना से हुआ, तो एक मुट्ठी पानी पीने वालों में से भी कुछ लोग भयभीत हो गए और लड़ने का साहस खो बैठे। लेकिन सच्चे ईमान वालों ने कहा,कितनी ही छोटी जमाअतें अल्लाह के हुक्म से बड़ी जमाअतों पर विजयी हुई हैं।
उन्होंने कहा कि यही अटूट ईमान और नेतृत्व पर भरोसा उनकी विजय का कारण बना।
पीरदेहक़ान ने कहा कि इन आयतों का संदेश यह है कि इमाम और समाज के वैध नेतृत्व का अनुसरण, चाहे उसकी पूरी हिकमत समझ में आए या नहीं, इंसान की सफलता और निजात का कारण बनता है।
उन्होंने अपने संबोधन के अंत में कहा कि आख़िरी ज़माने में भी मोमिनों को आज्ञापालन का अभ्यास करना चाहिए, ताकि वे इमाम मेंहदी (अ.ज.) की पैरवी के योग्य बन सकें। उन्होंने कहा कि इतिहास की इन परीक्षाओं से सीख लेकर ईमान वालों को धार्मिक नेतृत्व के मार्गदर्शन में आगे बढ़ना चाहिए और ज़ुहूर-ए-इमाम मेंहदी (अ.ज.) की तैयारी करनी चाहिए।
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