शुक्रवार 7 अगस्त 2026 - 09:12
मौकिब बाबुल हुसैन में उलेमा और तलबा इमाम हुसैन अ.स.के ज़ायरीन की सेवा में अग्रणी; अरबईन की यात्रा इमाम ज़माना (अ.स.) के ज़ुहूर की भूमिका है।मौलाना अली अब्बास नजफ़ी

हौज़ा / अरबईन-ए-हुसैनी के अवसर पर नजफ़ अशरफ़ से कर्बला मुअल्ला की ओर जारी महान पैदल यात्रा के दौरान पोल नंबर 820 पर स्थापित "बाबुल हुसैन" मोअक़िब में बड़ी संख्या में उलेमा और तलबा इमाम हुसैन (अ.) के ज़ायरीन की दिन-रात सेवा में जुटे हुए हैं। मोअक़िब के प्रबंधक मौलाना अली अब्बास नजफ़ी ने हौज़ा न्यूज़ से बातचीत में कहा कि इमाम हुसैन (अ.स) के ज़ायरीन की सेवा करना अहल-ए-बैत (अ.स.) की शिक्षाओं का व्यावहारिक स्वरूप है, जबकि अरबईन का विशाल समागम इश्क़-ए-हुसैनी, मारिफ़त-ए-अहल-ए-बैत (अ.स.) और इमाम ज़माना (अ.स.) के ज़ुहूर की तैयारी का अनुपम प्रतीक है।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार ,कर्बला/नजफ़, अरबईन-ए-हुसैनी के अवसर पर नजफ़ अशरफ़ से कर्बला मुअल्ला की ओर जारी महान पैदल यात्रा के दौरान पोल नंबर 820 पर स्थापित "बाबुल हुसैन" मोअक़िब में बड़ी संख्या में उलेमा और तलबा इमाम हुसैन (अ.) के ज़ायरीन की दिन-रात सेवा में जुटे हुए हैं। मोअक़िब के प्रबंधक मौलाना अली अब्बास नजफ़ी ने हौज़ा न्यूज़ से बातचीत में कहा कि इमाम हुसैन (अ.स) के ज़ायरीन की सेवा करना अहल-ए-बैत (अ.स.) की शिक्षाओं का व्यावहारिक स्वरूप है, जबकि अरबईन का विशाल समागम इश्क़-ए-हुसैनी, मारिफ़त-ए-अहल-ए-बैत (अ.स.) और इमाम ज़माना (अ.स.) के ज़ुहूर की तैयारी का अनुपम प्रतीक है।

उन्होंने कहा कि नजफ़ से कर्बला तक उमड़ा यह विशाल मानव सैलाब केवल एक यात्रा नहीं, बल्कि इमाम हुसैन (अ.स.) से प्रेम, अहल-ए-बैत (अ.स.) की पहचान और इमाम महदी (अ.) के ज़ुहूर की तैयारी का जीवंत प्रदर्शन है।

मौलाना अली अब्बास नजफ़ी ने बताया कि बसरा, नजफ़, बग़दाद, हिल्ला,और इराक़ के अन्य शहरों से लाखों ज़ायरीन भीषण गर्मी, थकान, बीमारी और अन्य कठिनाइयों की परवाह किए बिना इमाम हुसैन (अ.स.) की बारगाह की ओर बढ़ रहे हैं। उन्होंने कहा कि 48 से 53 डिग्री सेल्सियस तक की भीषण गर्मी भी ज़ायरीन के प्रेम और श्रद्धा को कम नहीं कर सकी, क्योंकि यह सफ़र सैय्यदुश्शोहदा इमाम हुसैन (अ.) की मोहब्बत का सफ़र है।

उन्होंने कहा कि इमाम हुसैन (अ.) की मज़लूमाना शहादत का ग़म मोमिनों के दिलों में हमेशा ताज़ा रहेगा और यही प्रेम हर वर्ष उन्हें कर्बला की ओर खींच लाता है। उन्होंने कहा कि यह असंभव नहीं कि अरबईन का यह विराट समागम इमाम मेंहदी (अ.) के ज़ुहूर की भूमिका बन जाए, क्योंकि यह वह क़ाफ़िला है जो इमाम हुसैन (अ.स.) की मोहब्बत में चलते हुए वास्तव में इमाम-ए-असर (अ.) की सहायता के लिए आध्यात्मिक प्रशिक्षण प्राप्त कर रहा है।

ज़ायरीन के उच्च स्थान और सम्मान का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति इमाम हुसैन (अ.) की ज़ियारत के लिए निकलता है, उसके स्वागत के लिए फ़रिश्ते, अंबिया, हज़रत अब्बास (अ.), हज़रत हबीब इब्न मज़ाहिर (अ.) और अन्य नेक बंदे उपस्थित होते हैं। उन्होंने कहा कि इमाम हुसैन (अ.स.) के हरम में ज़ायर केवल इमाम की ज़ियारत नहीं करता, बल्कि फ़रिश्ते और अंबिया भी उस ज़ायर का सम्मान करते हैं। यही ज़ियारत इंसान को महान आध्यात्मिक दर्जा प्रदान करती है।

मोअक़िब बाबुल हुसैन की सेवाओं के बारे में उन्होंने कहा कि ज़ायरीन की सेवा हमारे लिए सम्मान और सौभाग्य की बात है। हम अपने सभी ख़िदमतगारों को हमेशा यह शिक्षा देते हैं कि जो भी ज़ायर मोअक़िब में आए, वह दुआ देते हुए आए और जब लौटे तो उसके होंठों पर भी दुआ हो। उसके चेहरे पर किसी प्रकार की नाराज़गी या परेशानी दिखाई न दे।

उन्होंने कहा कि हमारा विश्वास है कि इमाम ज़माना हज़रत हुज्जत इब्ने अल-हसन अल-अस्करी (अ.स.) हमारे बीच मौजूद हैं, लेकिन अपनी कमज़ोरियों और गुनाहों के कारण हम उन्हें पहचान नहीं पाते। इसलिए हम हर ज़ायर की सेवा इस भावना के साथ करते हैं कि संभव है वही हमारे इमाम हों। यदि हमें पता हो कि इमाम ज़माना (अ.स.) स्वयं हमारे मोअक़िब में आने वाले हैं, तो जिस प्रेम, सम्मान और निष्ठा से हम उनकी सेवा करेंगे, वैसा ही व्यवहार हमें प्रत्येक ज़ायर के साथ करना चाहिए।

मौलाना अली अब्बास नजफ़ी ने एक घटना का उल्लेख करते हुए बताया कि एक आलिम ने स्वप्न में हज़रत हबीब इब्ने मज़ाहिर (अ.) की ज़ियारत की और उनसे पूछा कि यदि आपको दोबारा दुनिया में आने का अवसर मिले तो आप क्या करेंगे? उन्होंने उत्तर दिया, "मेरी सबसे बड़ी इच्छा होगी कि मैं इमाम हुसैन (अ.स.) के ज़ायरीन को पानी पिलाऊँ।" मौलाना ने कहा कि यही भावना हमें भी ज़ायरीन की सेवा के लिए प्रेरित करती है।

उन्होंने आगे कहा कि इतिहास में इमाम हुसैन (अ.) के ज़ायरीन की सेवा का पहला मोअक़िब इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.स) ने स्थापित किया था। आज के मोअक़िब उसी महान परंपरा की निरंतरता हैं। उन्होंने कहा कि अरबईन के ज़ायरीन अपने हर कदम पर महान सवाब और पुण्य के अधिकारी होते हैं, इसलिए उनकी सेवा करना भी एक महान इबादत है।

मोअक़िब बाबुल हुसैन की विशेषताओं का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि यहाँ बड़ी संख्या में उलेमा और तलबा स्वयं ज़ायरीन की सेवा करते हैं। एक आलिम ज़ायर के सम्मान और महत्व को भली-भांति समझता है, इसलिए वह अत्यंत आदर, धैर्य और प्रेम के साथ सेवा करता है। अन्य स्वयंसेवकों को भी इसी भावना के साथ प्रशिक्षित किया जाता है ताकि हर ज़ायर को सम्मान और स्नेह मिले।

उन्होंने बताया कि मोअक़िब में सेवा देने वाले स्वयंसेवक विभिन्न देशों से आते हैं। लगभग 82 उलेमा और तलबा नजफ़ अशरफ़ से, लगभग 70 इस्लामी गणराज्य ईरान से और 70 से 80 स्वयंसेवक भारत से सेवा के लिए आते हैं।

इसके अतिरिक्त इराक़ के स्थानीय स्वयंसेवक भी इस मोअक़िब का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। उन्होंने कहा कि वर्ष 2020 में कोरोना महामारी के दौरान विदेशों से स्वयंसेवक नहीं आ सके थे, तब भी नजफ़ के स्थानीय उलेमा और स्वयंसेवकों ने सेवा का सिलसिला जारी रखा।

बातचीत के अंत में मौलाना अली अब्बास नजफ़ी ने कहा कि मोअक़िब बाबुल हुसैन में जाति, समुदाय, भाषा या देश के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जाता। यहाँ आने वाला प्रत्येक व्यक्ति केवल हज़रत अबा अब्दिल्लाह इमाम हुसैन (अ.स.) का ज़ायर होता है और उसी सम्मान के साथ उसकी सेवा की जाती है। उन्होंने दुआ की कि अल्लाह तआला अहल-ए-बैत (अ.) के सदक़े में सभी ख़िदमतगारों और ज़ायरीन की सेवाओं को अपनी बारगाह में क़बूल फ़रमाए।

टैग्स

आपकी टिप्पणी

You are replying to: .
captcha