हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, इज़रायली शासन से संबंधित वस्तुओं और सेवाओं की खरीद-बिक्री के शरीयत के हुक्म के बारे में पूछे गए सवालों के जवाब में मराजे के फतवों से पता चलता है कि ऐसा कोई भी आर्थिक कार्य, जिससे इस शासन को मजबूती मिलती हो, जायज़ नहीं है और मुकल्लफों को इससे बचना चाहिए।
अहकाम के विशेषज्ञ हुज्जतुल इस्लाम अमीनी इस संबंध में जवाब देते हैं:
बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम
उन देशों की वस्तुओं की खरीद-बिक्री के संबंध में जिनमें इज़रायली शासन भी शामिल है, मैं कुछ बातें आपके सामने पेश कर रहा था।
आज की बैठक में दूसरी बात जो मैं आपके सामने रखना चाहता हूं, वह यह है कि आम तौर पर जो सवाल पूछे जाते हैं, उनमें इस तरह पूछा जाता है:
क्या इजरायली वस्तुओं की खरीद-बिक्री में कोई समस्या है या नहीं?
हमने बताया कि मराजे ने फरमाया है कि यह काम हराम है। लेकिन अधिक सटीक बात यह है कि ज़ायोनी कंपनियों को होने वाला आर्थिक लाभ केवल खरीद-बिक्री के माध्यम से ही हो, यह जरूरी नहीं है। हो सकता है कि खरीद-बिक्री न हो, बल्कि ज़ायोनी कंपनियों द्वारा सेवाएं प्रदान की जा रही हों।
मिसाल के तौर पर, मान लीजिए कोई व्यक्ति इंटरनेट पर ऐसी वेबसाइट का इस्तेमाल करता है, जहां उसकी सुविधाओं का उपयोग करने के लिए कुछ शुल्क देना पड़ता है, या वह ऐसी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस सेवा का इस्तेमाल करता है, जिसके मुनाफे का एक हिस्सा ज़ायोनी सरकारों की सहायता में जाता है। इसमें कोई अंतर नहीं है। इसलिए खरीद-बिक्री, जैसा कि हम मदरसे के विद्यार्थी कहते हैं, अपने आप में मूल विषय नहीं है; महत्वपूर्ण बात किसी भी प्रकार से मजबूती पहुंचाना है।
इसलिए यदि आप ऐसी वेबसाइट पर जाते हैं, जहां सेवाओं का उपयोग करने के लिए आपको कोई राशि देनी पड़ती है और आप जानते हैं कि यह राशि ज़ायोनी शासन तक पहुंचती है, तो यह भी जायज़ नहीं है।
इसी तरह वितरण करने वाली कंपनियों का मामला है। कभी-कभी किसी वस्तु का ब्रांड ज़ायोनी नहीं होता और वह किसी ऐसे देश की कंपनी का होता है, जिससे हमारा कोई विवाद नहीं है, लेकिन वितरण करने वाली कंपनी, यानी बिक्री में मध्यस्थ, जो इन वस्तुओं को वितरित करती है और मुनाफे का एक हिस्सा अपने पास रखती है, हो सकता है कि वह कंपनी ज़ायोनी शासन से संबंधित हो। इस बात पर भी ध्यान देना चाहिए। केवल वस्तु ही महत्वपूर्ण नहीं है; किसी भी प्रकार की मजबूती पहुंचाना समस्या का कारण है।
अगर कोई व्यक्ति ऐसी जगह काम करता है, जो किसी कंपनी की एजेंसी है और वह कंपनी किसी भी कारण से अपने मुनाफे का एक हिस्सा ज़ायोनी कंपनियों को देती है, तो यह भी जायज़ नहीं है।
इसलिए इस बैठक में मैं आपसे जो बात कहना चाहता हूं, वह यह है कि चाहे खरीद-बिक्री हो, वेबसाइट के लिए शुल्क देकर उसकी सेवाओं का इस्तेमाल करना हो, या किसी व्यक्ति ने कुछ वित्तीय बाजारों में निवेश किया हो, जहां बीच की एजेंसी स्वयं ऐसी वित्तीय एजेंसी हो, जो मुनाफे का एक हिस्सा प्राप्त करती हो और उस मुनाफे का कुछ हिस्सा ज़ायोनी कंपनियों को देती हो, या वह एजेंसी स्वयं ज़ायोनी हो।
आप वित्तीय बाजार में काम कर रहे हैं, जैसे मुद्रा की खरीद-बिक्री, यूरो की खरीद-बिक्री या डॉलर की खरीद-बिक्री; लेकिन जिस वित्तीय एजेंसी के साथ आप काम कर रहे हैं, वह या तो सीधे ज़ायोनी हो या ऐसी कंपनियों से जुड़ी हो, जो ज़ायोनी देशों, विशेष रूप से इज़राइल, को कर देती हों।
प्रिय भाइयों, इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि ज़ायोनी शासन जैसे देशों को किसी भी प्रकार से आर्थिक मजबूती पहुंचाना शरीयत की दृष्टि से हराम और जायज़ नहीं है।
इंशाअल्लाह, आप सफल रहें।
वस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाहि व बरकातुह।
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