बुधवार 12 अगस्त 2026 - 20:35
रसूल खुदा (स) की वह दुआ, जिसे सुनकर उम्मे सलमा रो पड़ीं

शहीद उस्ताद मुर्तज़ा मुतहरी ने रसूले अकरम (स) की एक दुआ का उल्लेख करते हुए कहा है कि आप बंदगी के सर्वोच्च मक़ाम पर आसीन होने के बावजूद अल्लाह तआला से दुआ करते थे कि वह एक क्षण के लिए भी उन्हें उनके नफ़्स के हवाले न करे और अपनी कृपा व रहमत से वंचित न करे। उम्मे सलमा ने जब यह दुआ सुनी तो बेइख़्तियार रोने लगीं।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, शहीद उस्ताद मुर्तज़ा मुतहरी ने रसूले अकरम (स) की एक दुआ का उल्लेख करते हुए कहा है कि आप (स) बंदगी के सर्वोच्च मकाम पर आसीन होने के बावजूद अल्लाह तआला से दुआ करते थे कि वह एक क्षण के लिए भी उन्हें उनके नफ़्स के हवाले न करे और अपनी कृपा व रहमत से वंचित न करे। उम्मे सलमा ने जब यह दुआ सुनी तो बेइख़्तियार रोने लगीं।

शहीद उस्ताद मुतहरी अपनी पुस्तक ‘सीरते नबवी’ में लिखते हैं कि इंसान के भीतर थोड़ा-सा भी घमंड पैदा हो जाए तो संभव है कि अल्लाह तआला अपनी कृपा उससे हटा ले, ताकि बंदा अपनी बेबसी को समझ सके। इसलिए इंसान को हर हाल में अल्लाह तआला से यह दुआ करनी चाहिए:

«وَلا تَکِلْنِی إِلَی نَفْسِی طَرْفَةَ عَیْنٍ أَبَداً»

अर्थात: ऐ अल्लाह! मुझे कभी एक पलक झपकने के बराबर भी मेरे नफ़्स के हवाले न करना।

उम्मे सलमा बयान करती हैं कि एक रात उनकी आँख खुली तो उन्होंने देखा कि रसूले अकरम (स) बिस्तर पर मौजूद नहीं हैं। तलाश करने पर मालूम हुआ कि आप (स) कमरे के एक कोने में इबादत में व्यस्त हैं। उम्मे सलमा ने आपकी दुआ सुनी, जिसमें आप अर्ज़ कर रहे थे:

«إِلٰهِی لَا تُشْمِتْ بِی عَدُوِّی، وَلَا تَرُدَّنِی إِلَی کُلِّ سُوءٍ اسْتَنْقَذْتَنِی مِنْهُ... وَلا تَکِلْنِی إِلَی نَفْسِی طَرْفَةَ عَیْنٍ أَبَداً»

ऐ मेरे माबूद! मेरे दुश्मनों को मेरे हाल पर खुश न होने देना, मुझे उन बुराइयों की ओर वापस न लौटाना, जिनसे तूने मुझे निजात दी है और मुझे एक क्षण के लिए भी मेरे नफ़्स के हवाले न करना।

यह दुआ सुनकर उम्मे सलमा बेइख़्तियार फूट-फूटकर रोने लगीं। रसूले अकरम (स) ने दुआ पूरी करने के बाद पूछा: उम्मे सलमा! तुम क्यों रो रही हो?

उन्होंने अर्ज़ किया: या रसूलल्लाह! जब आप स्वयं अल्लाह तआला से यह दुआ करते हैं कि वह आपको एक पलक झपकने के बराबर भी आपके नफ़्स के हवाले न करे, तो फिर हमारा क्या हाल होगा?

रसूले अकरम (स) ने उन्हें तसल्ली देने के लिए यह नहीं कहा कि मैंने यह दुआ केवल तुम्हें शिक्षा देने के लिए की है, बल्कि फरमाया कि हक़ीक़त यही है। मेरे भाई यूनुस अलैहिस्सलाम को अल्लाह तआला ने एक क्षण के लिए उनके नफ़्स के हवाले किया तो उन पर वह मुसीबत आई, जिसे तुम जानती हो।

इस घटना से मालूम होता है कि इंसान इबादत और बंदगी के कितने ही ऊँचे मक़ाम पर पहुँच जाए, उसे हर क्षण अल्लाह तआला की मदद, रहमत और कृपा का मोहताज रहना चाहिए।

स्रोत: शहीद उस्ताद मुर्तज़ा मुतहरी, सीरते नबवी, पेज 135।

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