हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, यह जुलूस आज 28 सफ़र 1448 हिजरी, 21 अगस्त 1405 हिजरी शम्सी को इमाम सादिक अलैहिस्सलाम मदरसे के प्रयास और तंजानिया के शिया इसना अशरी समुदाय (TIC) के सहयोग से निकाला गया। इसमें दार एस सलाम शहर के विभिन्न क्षेत्रों से सैकड़ों श्रद्धालुओं और अहलेबैत अलैहिमुस्सलाम के चाहने वालों ने भाग लिया।
यह जुलूस इलाला बोमा क्षेत्र से शुरू हुआ। शोक मनाने वाले लोग मिसिम्बाज़ी सड़क से गुजरते हुए मबुयूनी चौराहे की ओर बढ़े और अंत में तंजानिया के शिया समुदाय के केंद्रीय मुख्यालय स्थित मस्जिदे ग़दीर में जुलूस समाप्त हुआ।
इस कार्यक्रम का नेतृत्व और आयोजन तंजानिया के शियाओं के प्रमुख शैख़, मौलाना हमीद जलाला म्वाकिन्देंगा ने किया। उन्होंने अन्य विद्वानों, धर्मगुरुओं और धार्मिक हस्तियों के साथ जुलूस में सबसे आगे रहकर भाग लिया। यह जुलूस अहलेबैत अलैहिमुस्सलाम के अनुयायियों के बीच पैग़म्बरे अकरम (स) के प्रति गहरे दुख, सम्मान और प्रेम की एक झलक प्रस्तुत कर रहा था।
इस कार्यक्रम में विभिन्न क्षेत्रों की कई प्रमुख हस्तियां भी उपस्थित थीं। इनमें तंजानिया में इस्लामी गणराज्य ईरान के सांस्कृतिक केंद्र के प्रमुख, कई धर्मगुरु तथा अन्य धार्मिक और सामाजिक अधिकारी एवं हस्तियां शामिल थीं।
इस कार्यक्रम में विभिन्न वर्गों के श्रद्धालुओं की व्यापक भागीदारी तंजानिया के शियाओं की एकता और आपसी भाईचारे का प्रतीक थी। यह पैग़म्बरे अकरम (स) की याद और उनकी सीरत को जीवित रखने के साथ-साथ उनकी शिक्षाओं और निर्देशों पर दृढ़ता से अमल करने की आवश्यकता पर भी जोर देती है।
“यही हैं मुहम्मद, अल्लाह के रसूल (स)”
इस जुलूस का मुख्य नारा “यही हैं मुहम्मद, अल्लाह के रसूल (स)” था। इस नारे का उद्देश्य समाज के सामने पैग़म्बरे इस्लाम (स) के व्यक्तित्व का परिचय कराना तथा उनके जीवन, नैतिकता, गुणों और उत्कृष्ट विशेषताओं के विभिन्न पहलुओं को सामने लाना था।
यह नारा उन कठिनाइयों, तकलीफ़ों और बड़ी-बड़ी परीक्षाओं की भी याद दिलाता था, जिन्हें पैग़म्बरे अकरम (स) ने ईश्वरीय संदेश पहुँचाने और अल्लाह का संदेश मानवता तक पहुँचाने के मार्ग में सहन किया।
साथ ही, इस नारे में ईमान वालों के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश भी था कि पैग़म्बरे अकरम (स) का सम्मान केवल शब्दों और प्रेम के इज़हार तक सीमित नहीं है, बल्कि उनका वास्तविक सम्मान उनकी सीरत और जीवन-पद्धति का अनुसरण करना, पैग़म्बर (स) की शिक्षाओं पर अमल करना और उन शिक्षाओं को दैनिक जीवन में लागू करना है।
पैग़म्बरे अकरम (स) के शोक में दर्दभरी मरसियों की आवाज़
कार्यक्रम के एक अन्य भाग में जुलूस के माहौल को विशेष और भावनात्मक बनाने के लिए पैग़म्बरे अकरम (स) की रेहलत के शोक में दर्दभरे नौहे और मरसिए पढ़े गए। इसका नेतृत्व शैख़ ईदी वाम्बुआ ने किया और अन्य शोक मनाने वालों ने भी उनका साथ दिया।
जुलूस के पूरे मार्ग में गूंजने वाले इन मरसियों ने कार्यक्रम के दुख और शोकपूर्ण वातावरण को और गहरा कर दिया तथा प्रतिभागियों के बीच पैग़म्बरे इस्लाम (स) के प्रति प्रेम और गहरी श्रद्धा की भावना को जागृत किया। शोक मनाने वाले लोग दुखी चेहरों और ग़मगीन दिलों के साथ अल्लाह के अंतिम रसूल की रेहलत पर शोक मना रहे थे।
यह जुलूस तंजानिया के ईमान वालों द्वारा पैग़म्बरे अकरम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा (स) की याद और उनके नाम को जीवित रखने के लिए आयोजित कार्यक्रमों का एक हिस्सा था। यह कार्यक्रम केवल पैग़म्बरे अकरम (स) की याद और सम्मान तक सीमित नहीं था, बल्कि मुसलमानों की उस जिम्मेदारी को याद करने का अवसर भी था कि वे समाज में ईमान, अच्छे नैतिक चरित्र, एकता, दया और न्याय के संदेश को बढ़ावा दें।
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