बुधवार 9 सितंबर 2026 - 06:31
हर अमल की क़ुबूलियत की शर्त ख़ुलूस ए नियत है।मौलाना कैसर अब्बास शिवली

हौज़ा / डिगिया आजमगढ़ में एक मजलिस को खिताब फरमाते हुए हिंदुस्तान के मशहूर खतीब हुज्जतुल इस्लाम मौलाना कैसर अब्बास ने कहां,इंसान की ज़िंदगी में बहुत से नेक अमल हैं। नमाज़ है, रोज़ा है, सदक़ा है, ज़िक्र है, ख़िदमत है और मजलिस-ए-अज़ा भी है। लेकिन सवाल यह है कि इन अमलों की रूह क्या है? वह चीज़ क्या है जिसके बिना बड़ा से बड़ा अमल भी अपनी असल रूह खो देता है?वह है खुलूस-ए-नियत

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार ,डिगिया आजमगढ़ में एक मजलिस को खिताब फरमाते हुए हिंदुस्तान के मशहूर खतीब हुज्जतुल इस्लाम मौलाना कैसर अब्बास ने कहां,इंसान की ज़िंदगी में बहुत से नेक अमल हैं। नमाज़ है, रोज़ा है, सदक़ा है, ज़िक्र है, ख़िदमत है और मजलिस-ए-अज़ा भी है। लेकिन सवाल यह है कि इन अमलों की रूह क्या है? वह चीज़ क्या है जिसके बिना बड़ा से बड़ा अमल भी अपनी असल रूह खो देता है?वह है खुलूस-ए-नियत

इंसान का अमल कितना बड़ा है, यह हमेशा महत्वपूर्ण नहीं होता; बल्कि यह महत्वपूर्ण है कि वह अमल किसके लिए किया गया है। अगर इंसान लोगों की तारीफ़ के लिए अमल करे तो वह अमल लोगों तक सीमित रह जाता है, लेकिन अगर वही अमल अल्लाह की रज़ा और मोहम्मद व आले-मोहम्मद की मोहब्बत के लिए हो, तो उसका असर दिलों तक पहुंचता है।

क़ुरआन हमें याद दिलाता है कि इंसान को अपनी इबादत में अल्लाह के लिए दीन को ख़ालिस रखना चाहिए। इसलिए नेक अमल की बुनियाद नियत की पाकीज़गी है।

हमारी मजलिस सिर्फ़ एक धार्मिक कार्यक्रम का नाम नहीं है। मजलिस वह मक़ाम है जहाँ इंसान अपने दिल को अहलेबैत अलैहिमुस्सलाम की सीरत से जोड़ता है, अपनी ज़िंदगी का हिसाब करता है और अपने किरदार को बेहतर बनाने का अहद करता है।

मजलिस में जब ज़िक्र-ए-मोहम्मद व आले-मोहम्मद होता है, तो दिलों में मोहब्बत पैदा होती है। जब कर्बला का ज़िक्र होता है तो इंसान को वफ़ा, सब्र, त्याग और हक़ पर क़ायम रहने का सबक मिलता है।

इसलिए कहा जा सकता है,मजलिस को मरकज़ियत हासिल है, लेकिन उस मरकज़ियत की जान ख़ुलूस है।अगर मजलिस में हमारा दिल साफ़ है, हमारा मक़सद सिर्फ़ अल्लाह की रज़ा और अहलेबैत की मोहब्बत है, तो यही मजलिस इंसान की ज़िंदगी बदल सकती है।

उन्होने कहां,मजलिस में ख़ुलूस होगा तो अहलेबैत आएंगे,अहलेबैत आएंगे" से मुराद यह है कि अहलेबैत की सीरत, उनकी मोहब्बत और उनकी तालीम हमारे दिलों में उतरने लगेगी।अगर मजलिस के बाद इंसान के अंदर यह बदलाव पैदा हो जाए, तो समझिए मजलिस ने अपना मक़सद पूरा कर दिया।

उन्होने कहां,अहलेबैत अलैहिमुस्सलाम की ज़िंदगी दरअसल तमाम अंबिया की तालीम का आईना है। हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की कर्बला में हमें हज़रत आदम का सब्र, हज़रत नूह की इस्तिक़ामत, हज़रत इब्राहीम की कुर्बानी, हज़रत मूसा की हिम्मत और रसूले इस्लाम स.ल.व. की रहमत व अख़लाक़ की झलक दिखाई देती है।

इसलिए जब मजलिस में अहलेबैत की सीरत का सच्चे दिल से ज़िक्र होता है, तो वह हमें तमाम अंबिया की तालीम से जोड़ देती है।

मजलिस का मक़सद सिर्फ़ आंखों को नम करना नहीं, बल्कि ज़िंदगी को बदलना है।

अगर आंख में आंसू आएं और दिल में तकब्बुर बाकी रहे तो हमें अपने आप से सवाल करना चाहिए। अगर इमाम हुसैन का नाम लिया और ज़ुल्म से नफ़रत पैदा नहीं हुई, अगर अब्बास का ज़िक्र किया और वफ़ा नहीं आई, अगर ज़ैनब का ज़िक्र किया और सब्र नहीं आया, तो हमें अपनी मजलिस और अपनी नियत दोनों का जायज़ा लेना चाहिए।

कर्बला हमें ख़ुलूस सिखाती है:

करबला में हर शख़्स ने अपने अमल को अल्लाह के लिए पेश किया। वहाँ तादाद नहीं देखी गई, नियत देखी गई।हज़रत हुर्र की ज़िंदगी इसका शानदार उदाहरण है। एक इंसान अपनी ज़िंदगी के एक मोड़ पर सही फ़ैसला करता है और उसका ख़ुलूस उसे इमाम हुसैन के क़रीब ले आता है।

ख़ुलूस-ए-नियत:

अल्लाह हमें ऐसी मजलिसें पढ़ने और सुनने की तौफ़ीक़ दे जिनमें सिर्फ़ आवाज़ें नहीं, बल्कि दिल बदलें; सिर्फ़ आंसू नहीं, बल्कि किरदार पैदा हो; और सिर्फ़ अहलेबैत का ज़िक्र नहीं, बल्कि उनकी सीरत हमारी ज़िंदगी का हिस्सा बन जाए।

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