हौज़ा न्यूज़ एजेंसी | इमाम ज़ैनुलआबेदीन अलैहिस्सलाम ने सहिफ़ा-ए-सज्जादिया की चौदहवीं दुआ में अल्लाह तआला से इस प्रकार अर्ज़ किया है:
“اَللَّهُمَّ وَ إِنْ کَانَتِ الْخِیَرَةُ لِی عِنْدَکَ فِی تَأْخِیرِ الْأَخْذِ لِی وَ تَرْکِ الاِنْتِقَامِ مِمَّنْ ظَلَمَنِی إِلَی یَوْمِ الْفَصْلِ وَ مَجْمَعِ الْخَصْمِ ऐ अल्लाह! अगर मेरे लिए भलाई इसी में है कि मेरा हक़ दिलाने और मुझ पर ज़ुल्म करने वाले से बदला लेने को फ़ैसले के दिन और उस दिन तक टाल दिया जाए, जब हक़ और बातिल के बीच फ़ैसला होगा और दावेदार एक स्थान पर इकट्ठा किए जाएंगे,
فَصَلِّ عَلَی مُحَمَّدٍ وَ آلِهِ وَ أَیِّدْنِی مِنْکَ بِنِیَّةٍ صَادِقَةٍ وَ صَبْرٍ دَآئِمٍ तो मुहम्मद और उनके अहलेबैत पर दुरूद भेज और मुझे अपनी ओर से सच्ची नीयत और निरंतर सब्र प्रदान कर।”
व्याख्या:
कभी-कभी इंसान यह समझता है कि अल्लाह का न्याय तभी सार्थक होगा, जब ज़ुल्म का तुरंत जवाब दिया जाए और ज़ालिम को उसी समय उसके कर्म की सज़ा मिल जाए। लेकिन तौहीदी दृष्टिकोण के अनुसार, अल्लाह के न्याय को सज़ा देने में जल्दबाज़ी के आधार पर नहीं समझा जा सकता। अल्लाह तआला न तो ज़ुल्म से अनजान है और न ही मज़लूम के हक़ को भूलता है। बल्कि उसकी हिकमत भरी व्यवस्था में हर घटना का अपना उचित स्थान और उचित समय होता है।
इंसान के लिए विचार करने की बात यह है कि हक़ मिलने में देरी का अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि उसके हक़ को नज़रअंदाज़ कर दिया गया है। हो सकता है कि अल्लाह तआला इसी बीच इंसान की तरक्की, परीक्षा और सच्चाई को सामने लाने के लिए परिस्थितियां पैदा कर रहा हो और अंत में हक़ को अधिक पूर्ण रूप से स्पष्ट करे। इसलिए मज़लूम को ज़ालिम को सज़ा मिलने में देरी को अल्लाह के न्याय की कमी का संकेत नहीं समझना चाहिए, क्योंकि अल्लाह का न्याय इंसान की सीमित और जल्दबाज़ी वाली सोच से कहीं आगे है।
बेशक, इस्लाम की ओर से सब्र की शिक्षा का अर्थ किसी भी तरह से ज़ुल्म को स्वीकार करना, अपने हक़ से आंखें मूंद लेना या ज़ुल्म के सामने आत्मसमर्पण करना नहीं है। मज़लूम को अपने बचाव का हक़ है। वह अपने हक़ की मांग कर सकता है और ज़ुल्म के खिलाफ हक़ और इंसाफ़ की सीमाओं में रहते हुए खड़ा हो सकता है। इस्लाम इंसान से यह चाहता है कि इस संघर्ष के दौरान वह खुद भी इंसाफ़ के रास्ते से न हटे और अल्लाह की निर्धारित सीमाओं का उल्लंघन न करे। यानी इंसान अत्यधिक दुख और दबाव में भी अपने गुस्से को खुद पर हावी न होने दे और यह विश्वास रखे कि अपना हक़ हासिल करने के लिए उसका खुद ग़लत रास्ता अपनाना ज़रूरी नहीं है।
“सब्र करने वाला मज़लूम” वह है जो अपने हक़ को पहचानता है और उसके लिए प्रयास करता है, लेकिन साथ ही ज़ुल्म को अपने ईमान और अल्लाह तआला के प्रति अपने तौहीदी विश्वास को प्रभावित नहीं करने देता।
इसलिए इमाम सज्जाद अलैहिस्सलाम के इस प्रकाशमय कथन के अनुसार, इंसान ज़ुल्म और नाइंसाफ़ी से पीड़ित हो सकता है और यहां तक कि अपने लिए निजात का रास्ता भी कठिन महसूस कर सकता है। लेकिन उसे यह नहीं भूलना चाहिए कि यह दुनिया बिना किसी मालिक के नहीं है और इंसान का भाग्य एक हिकमत वाले और आदिल अल्लाह के हाथ में है। यह सोच मज़लूम को शक्ति देती है कि वह न तो ज़ुल्म के सामने झुके और न ही राहत मिलने में देरी के कारण मायूस हो। वह जानता है कि अल्लाह तआला सब कुछ देख रहा है, हक़ को जानता है और उसके सामने कोई भी पीड़ा या हक़ व्यर्थ नहीं जाता। इसलिए सब्र ज़ुल्म के सामने निष्क्रिय रहना नहीं, बल्कि ईमान के साथ डटे रहने का एक रूप है।
आपकी टिप्पणी