शुक्रवार 16 अक्टूबर 2026 - 13:20
अल्लाह की राह में ख़र्च करना, वक़्फ़ की हिफ़ाज़त और सदक़ा-ए-जारिया ही आख़िरत की वास्तविक कामयाबी है: मौलाना सैयद अली सज्जाद रिज़वी

झारखंड के हुसैनाबाद स्थित शिया ईदगाह में नमाज़े जुमा के ख़ुत्बे के दौरान इमामे जुमा मौलाना सय्यद अली सज्जाद रिज़वी ने वास्तविक नेकी, अल्लाह की राह में ख़र्च करने, सदक़ा व ख़ैरात और वक़्फ़ की अहमियत पर प्रकाश डाला। उन्होंने वक़्फ़ की ज़मीन पर नाजायज़ क़ब्ज़े को गुनाहे-कबीरा क़रार दिया।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, झारखंड के हुसैनाबाद स्थित शिया ईदगाह में नमाज़े जुमा के ख़ुत्बे के दौरान इमामे जुमा मौलाना सय्यद अली सज्जाद रिज़वी ने वास्तविक नेकी, अल्लाह की राह में ख़र्च करने, सदक़ा व ख़ैरात और वक़्फ़ की अहमियत पर प्रकाश डाला। उन्होंने वक़्फ़ की ज़मीन पर नाजायज़ क़ब्ज़े को गुनाहे-कबीरा क़रार दिया।

मौलाना सय्यद अली सज्जाद रिज़वी ने ख़ुत्बे के दौरान सूरह आले इमरान की आयत 92 की तिलावत करते हुए उसके अर्थ की व्याख्या की। इस आयत में अल्लाह तआला फ़रमाता है कि इंसान उस समय तक नेकी के उच्चतम दर्जे तक नहीं पहुंच सकता, जब तक वह अपनी प्रिय वस्तुओं में से अल्लाह की राह में ख़र्च न करे।

आयत की व्याख्या करते हुए मौलाना ने कहा कि वास्तविक नेकी और त्याग का तक़ाज़ा यह है कि इंसान अपनी सबसे प्रिय चीज़ों को अल्लाह की ख़ुशी के लिए क़ुर्बान करने का जज़्बा रखे। उन्होंने पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि की हदीस का हवाला देते हुए कहा कि सबसे बेहतर सदक़ा वह है, जिसे इंसान सेहतमंद होने और माल से मोहब्बत रखने के बावजूद अल्लाह की राह में पेश करे।

उन्होंने अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली अलैहिस्सलाम के फ़रमान की रोशनी में ईमान, तवक्कुल और अल्लाह पर भरोसे की अहमियत बयान करते हुए कहा कि इंसान को केवल बाहरी साधनों पर निर्भर रहने के बजाय अल्लाह तआला की क़ुदरत पर पूरा भरोसा रखना चाहिए। उनका कहना था कि जब दुनिया के माल व दौलत की मोहब्बत इंसान के दिल पर हावी हो जाती है, तो वह विभिन्न आज़माइशों में घिर सकता है। इसलिए दिल को दुनिया की मोहब्बत की क़ैद से आज़ाद करने का एक महत्वपूर्ण माध्यम अल्लाह की राह में ख़र्च करना है।

इमामे जुमा हुसैनाबाद ने मोमिनों को सदक़ा, ख़ैरात और वक़्फ़ की अहमियत की ओर ध्यान दिलाते हुए कहा कि ये ऐसे नेक काम हैं, जिनका सवाब इंसान की मृत्यु के बाद भी जारी रह सकता है। इस्लाम इंसान को कंजूसी से बचने और अपने माल का एक हिस्सा ग़रीबों, ज़रूरतमंदों तथा कल्याणकारी कार्यों के लिए निर्धारित करने की शिक्षा देता है।

ख़ुत्बे के दौरान मौलाना सय्यद अली सज्जाद रिज़वी ने वक़्फ़ के शरई अहकाम की व्याख्या करते हुए कहा कि वक़्फ़ का उद्देश्य मूल संपत्ति को सुरक्षित रखते हुए उससे होने वाले लाभ को निर्धारित धार्मिक, कल्याणकारी और सार्वजनिक उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल करना है। उन्होंने वक़्फ़ की ज़मीन पर नाजायज़ क़ब्ज़े और ग़सब की शरई मनाही बयान करते हुए इसे गुनाहे-कबीरा क़रार दिया और इससे बचने की ताकीद की।

अंत में उन्होंने पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि की उस चेतावनी का हवाला दिया कि जो व्यक्ति नाहक़ किसी दूसरे की एक बालिश्त ज़मीन भी हड़प लेगा, क़यामत के दिन उसे सातों ज़मीनों का तौक़ पहनाया जाएगा।

ख़ुत्बे के अंत में मोमिनों की सलामती और सेहत के लिए तथा इमामे ज़माना हज़रत इमाम महदी अज्जलल्लाहु तआला फ़रजहुश्शरीफ़ के ज़ुहूर-ए-मुबारक के लिए दुआ की गई।

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