हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, हजरत फ़ातिमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा की शहादत की रात के अवसर पर आजमगढ़ स्थित जामिया इमाम महदी में मजलिस-ए-अज़ा आयोजित की गई। मजलिस को संबोधित करते हुए मौलाना सैयद सुबैहुल हसन रिज़वी ने अज़ा-ए-फ़ातिमिया के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि अज़ा-ए-फ़ातिमिया केवल रोने और मातम करने का नाम नहीं है, बल्कि यह अत्याचार और असत्य के चेहरे से पर्दा हटाने, सत्य की रक्षा करने तथा मजलूमों की आवाज़ को जीवित रखने का ऐतिहासिक और क्रांतिकारी संदेश है।

मौलाना सैयद सुबैहुल हसन रिज़वी ने कहा कि अज़ा-ए-फ़ातिमिया सत्य और असत्य के बीच संघर्ष की याद ताज़ा करती है। यह मज़लूमियत की ऐसी आवाज़ है, जो दुनिया के अंत तक अत्याचारियों को बेनकाब करती रहेगी।
उन्होंने कहा कि अज़ा-ए-फ़ातिमिया की परंपरा को जारी रखना तथा सत्य और विलायत की रक्षा करना, दरअसल इमाम-ए-ज़माना हजरत इमाम महदी (अज्जलल्लाहु तआला फरजहुश शरीफ़) की न्याय पर आधारित वैश्विक हुकूमत की स्थापना का मार्ग प्रशस्त करने का माध्यम है। इसके द्वारा समाज में न्याय और इंसाफ की स्थापना तथा अत्याचार के उन्मूलन के प्रति जागरूकता पैदा की जाती है।

उन्होंने आगे कहा कि हजरत फ़ातिमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा का पवित्र जीवन हमें यह शिक्षा देता है कि हर दौर में अपने समय के इमाम और ईश्वरीय विलायत की रक्षा किस प्रकार की जानी चाहिए।
उन्होंने कहा कि हजरत फ़ातिमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा की सीरत, चरित्र और सत्य बोलने के साहस को समाज में आम करने की आवश्यकता है, ताकि व्यक्ति और समाज उनकी शिक्षाओं से मार्गदर्शन प्राप्त कर सकें और उनके फातिमी चरित्र तथा मूल्यों को अपने जीवन में अपना सकें।

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