हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार, हम चाहते हैं कि आने वाली पीढ़ियां मस्जिद में आएं। इसकी वजह यह है कि शहीद रहबर ने फ़रमाया था, “मस्जिद मोमिन के प्रशिक्षण का प्रमुख केंद्र है।” यदि हम चाहते हैं कि इस्लामी शिक्षाएं, धार्मिक समारोहों के आयोजन, नमाज़े जमाअत, अन्य इबादतें और मुसलमानों के बीच एकता की संस्कृति आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचती रहे, तो हमें बच्चों की ऐसी तरबीयत करनी होगी कि वे मस्जिद से आत्मीयता महसूस करें और वहां जाना अपनी ज़िंदगी का हिस्सा समझें।
यदि हम इस विषय पर ध्यान न दें और यह सोचें कि बच्चों और किशोरों के मस्जिद न आने से क्या फर्क पड़ता है, तो हमें खुद से यह सवाल करना चाहिए कि वे फिर अपना समय कहां बिताएंगे? संभव है कि वे गेमिंग सेंटर, कैफे, सोशल मीडिया या ऐसे अन्य स्थानों पर समय बिताएं, जहां दूसरे लोग अपने उद्देश्यों को पूरा करने के लिए उनके वास्ते विभिन्न कार्यक्रम तैयार करते हैं। ऐसी स्थिति में हो सकता है कि भविष्य में उनके दिलों में मस्जिद जाने की इच्छा और रुचि न रहे और यह बेरुखी धार्मिक कार्यक्रमों तथा परंपराओं से दूरी का कारण भी बन जाए।
अगर बच्चे और किशोर मस्जिद नहीं आएंगे, तो क्या होगा?
यदि हम चाहते हैं कि आने वाली पीढ़ियां मस्जिद में आएं, तो हमें यह विचार करना होगा कि उनके प्रशिक्षण के लिए कौन-सा तरीका अपनाया जाए और उनके दिलों में मस्जिद के प्रति रुचि किस प्रकार पैदा की जाए।
पैग़म्बरे इस्लाम (स) की सीरत में ऐसे उदाहरण मिलते हैं, जिनसे पता चलता है कि आप बच्चों के साथ व्यवहार करते समय उनकी भावनाओं और जरूरतों का विशेष ध्यान रखते थे। एक घटना में वर्णन मिलता है कि पैग़म्बर (स) मस्जिद जाते समय बच्चों के साथ खेल रहे थे, जबकि नमाज़ का समय हो चुका था। आप फ़रमाते थे कि नमाज़ में देर हो जाना, बच्चों का दिल दुखाने से अधिक आसान है।
एक अन्य रिवायत में वर्णन है कि पैग़म्बरे इस्लाम (स) अपने साथ इमाम हसन (अ) को लेकर मस्जिद गए, जो उस समय छोटे बच्चे थे। आपने इमाम हसन (अ) को अपने पास बैठाया और नमाज़ शुरू की। नमाज़ के दौरान एक सज्दे में आप बहुत देर तक रहे। रिवायत करने वाला कहता है कि मैंने सज्दे से सिर उठाकर देखा तो इमाम हसन (अ) पैग़म्बर (स) के कंधों पर बैठे हुए थे।
नमाज़ पूरी होने के बाद उपस्थित लोगों ने आपसे पूछा कि क्या इस दौरान आप पर वही नाज़िल हो रही थी, क्योंकि उन्होंने इससे पहले आपको इतना लंबा सज्दा करते नहीं देखा था। पैग़म्बर (स) ने जवाब दिया कि आपका बच्चा आपके कंधों पर बैठा हुआ था और आप उसे अपने से अलग नहीं करना चाहते थे।
ये घटनाएं बच्चों के साथ पैग़म्बरे इस्लाम (स) के व्यवहार की एक सुंदर तस्वीर प्रस्तुत करती हैं, जिसमें प्रेम, मित्रता और उनकी भावनाओं का ध्यान रखना विशेष महत्व रखता है। आप केवल नसीहत और उपदेश नहीं देते थे, बल्कि अपने व्यवहार से बच्चों के दिलों में लगाव पैदा करते थे। बच्चे आपके इस व्यवहार को देखकर आपसे प्रेम करने लगते और आपको अपना आदर्श बनाते थे। इसका कारण यह है कि बच्चे हमारी बातों की तुलना में हमारे व्यवहार से अधिक प्रभावित होते हैं।
आज कुछ मस्जिदों में बच्चों को इस तरह नियंत्रित करने का प्रयास किया जाता है कि वे चुपचाप बैठें, नमाज़ियों को परेशान न करें और दुआ के दौरान शोर न मचाएं। हालांकि अनुशासन और दूसरों के अधिकारों का ध्यान रखना महत्वपूर्ण है, लेकिन यदि बच्चों के साथ व्यवहार केवल उन्हें नियंत्रित करने और चुप रखने तक सीमित हो जाए, तो धीरे-धीरे मस्जिद के प्रति उनकी रुचि कम हो सकती है।
इस तरीके की तुलना पैग़म्बरे इस्लाम (स) के व्यवहार से की जानी चाहिए। एक रिवायत के अनुसार, जब मस्जिद में एक बच्चा रोने लगा, तो पैग़म्बर (स) ने अपनी नमाज़ संक्षिप्त कर दी, ताकि उसकी मां उसे शांत कर सके। यह घटना दर्शाती है कि पैग़म्बर (स) की सीरत में बच्चों और उनकी माताओं की परिस्थितियों का ध्यान रखना भी महत्वपूर्ण था।
इसलिए, यदि हम मस्जिद में बच्चों और किशोरों के साथ व्यवहार के तरीके पर ध्यान नहीं देंगे, तो हमें फिर यह सोचना होगा कि मस्जिद से जुड़ाव महसूस न करने की स्थिति में वे अपना समय और रुचि किन स्थानों तथा गतिविधियों में लगाएंगे। क्या गेमिंग सेंटर और दूसरे ऐसे स्थान धीरे-धीरे उनकी ज़िंदगी में मस्जिद की जगह ले लेंगे?
निष्कर्ष: आने वाली पीढ़ी को मस्जिद से कैसे जोड़ें?
आने वाली पीढ़ियों तक मस्जिद में जाने की संस्कृति पहुंचाने के लिए आवश्यक है कि हम इस्लामी प्रशिक्षण के तरीकों को सीखें और मासूमीन (अ) की सीरत से मार्गदर्शन लेते हुए उन्हें अपने व्यवहार में अपनाएं। बच्चों और किशोरों के साथ भावनात्मक संबंध स्थापित करना, उनके साथ प्रेमपूर्ण व्यवहार करना, उनकी उम्र के अनुसार उन्हें जिम्मेदारियां सौंपना तथा उनके व्यक्तित्व और क्षमताओं का सम्मान करना इस जुड़ाव को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
मस्जिद तभी आने वाली पीढ़ी के प्रशिक्षण में प्रभावी भूमिका निभा सकती है, जब बच्चे और किशोर वहां प्रेम, सम्मान और अपनापन महसूस करें। आशा है कि सही प्रशिक्षण पद्धतियों को समझकर और अपनाकर हम आने वाली पीढ़ियों के लिए मस्जिदों में उत्साहपूर्वक उपस्थित होने का वातावरण तैयार कर सकेंगे और इस मूल्यवान धार्मिक परंपरा को अगली पीढ़ियों तक पहुंचा सकेंगे।
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