हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, रंगून, म्यांमार की मुग़ल शिया जामा मस्जिद में जुमे की नमाज़ के ख़ुतबे के दौरान हुज्जतुल इस्लाम मोहम्मद मासूम अली ने कहा कि हज़रत फातिमा ज़हरा (स.अ.) ने पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.) के निधन के बाद इस्लामी समाज में पैदा हुए बदलावों और गलत रवैयों के सामने खामोशी नहीं अपनाई, बल्कि अपने ख़ुतबों, तर्कों और व्यावहारिक संघर्ष के माध्यम से सत्य को स्पष्ट किया और अमीरुल मोमिनीन इमाम अली (अ.स.) की विलायत और इमामत का बचाव किया।
अपने संबोधन में उन्होंने हज़रत फातिमा ज़हरा (स.अ.) के जीवन के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डालते हुए कहा कि आप केवल पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.) की पुत्री, इमाम अली (अ.स.) की पत्नी और इमाम हसन व इमाम हुसैन (अ.स.) की माता ही नहीं थीं, बल्कि आपने इस्लामी समाज के सुधार, धार्मिक मूल्यों की रक्षा और सत्य के समर्थन में ऐतिहासिक भूमिका निभाई। आपने अपने आचरण से साबित किया कि सत्य का पैमाना लोगों की बहुसंख्या, समाज में प्रचलित रीति-रिवाज या सत्ता नहीं, बल्कि कुरआन, न्याय और ईश्वरीय मार्गदर्शन है।
गलत रीति-रिवाजों के मुकाबले सत्य का अनुसरण जरूरी है
हुज्जतुल इस्लाम मोहम्मद मासूम अली ने मौजूदा सामाजिक परिस्थितियों की ओर संकेत करते हुए कहा कि कभी-कभी गलत रीति-रिवाज इतने आम हो जाते हैं कि लोग उन्हें सही समझने लगते हैं और उन पर सवाल उठाने का साहस भी नहीं करते। जबकि किसी बात का समाज में प्रचलित होना उसके सही होने का प्रमाण नहीं है। इस्लाम हमें सिखाता है कि हर रीति और परंपरा को कुरआन, बुद्धि, न्याय और इस्लामी शिक्षाओं की कसौटी पर परखना चाहिए।
उन्होंने कहा कि कुरआन करीम ने इंसान की प्रतिष्ठा और श्रेष्ठता का आधार धन-दौलत, पद, पारिवारिक संबंध या राजनीतिक ताकत के बजाय तक़वा (परहेज़गारी) को बताया है। हज़रत फातिमा ज़हरा (स.अ.) का जीवन भी इस सच्चाई का उज्ज्वल उदाहरण है कि इंसान का वास्तविक मूल्य उसके ईमान, ज्ञान, चरित्र और सत्य के प्रति निष्ठा में है।
जुमे के ख़ुतबे में महिलाओं के स्थान और महत्व पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि हज़रत फातिमा ज़हरा (स.अ.) ने अपने ज्ञान, इबादत, साहस और दूरदर्शिता से साबित किया कि मुस्लिम महिलाएं भी शिक्षा, प्रशिक्षण, सामाजिक सुधार और सत्य की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। आपका जीवन आज की महिलाओं के लिए ज्ञान, जागरूकता और जिम्मेदारी का बेहतरीन उदाहरण है।
विलायत-ए-इमाम अली (अ.स.) की रक्षा, हज़रत ज़हरा (स.अ.) के संघर्ष का महत्वपूर्ण पहलू
ख़तीब-ए-जुमा ने अपने संबोधन के एक महत्वपूर्ण हिस्से में विलायत और इमामत के कुरआनी महत्व को बयान करते हुए आयत-ए-विलायत, आयत-ए-तबलीग़ और आयत-ए-उलिल अम्र का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि मक्तब-ए-अहलेबैत (अ.स.) में इमामत का अर्थ केवल शासन और राजनीतिक नेतृत्व नहीं है, बल्कि पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.) के बाद धर्म का सही मार्गदर्शन और ईश्वरीय शिक्षाओं की रक्षा की जिम्मेदारी भी है।
उन्होंने वाक़या-ए-ग़दीर का उल्लेख करते हुए कहा कि पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.) ने हज़रत अली (अ.स.) की विलायत की घोषणा की थी। आपके निधन के बाद हज़रत फातिमा ज़हरा (स.अ.) ने इमाम अली (अ.स.) के अधिकार और स्थान की रक्षा की। यह केवल एक पारिवारिक मामला नहीं था, बल्कि धर्म के मार्गदर्शन, न्याय और इमामत की रक्षा का विषय था।
उन्होंने आगे कहा कि हज़रत ज़हरा (स.अ.) का जीवन हमें यह शिक्षा देता है कि जब समाज में सत्य से विचलन होने लगे तो ईमान वालों को खामोश तमाशाई बनने के बजाय ज्ञान, विवेक, नैतिकता और तर्क के साथ सत्य का समर्थन करना चाहिए।
ख़ुत्बा-ए-फ़दक; केवल फ़दक नहीं, बल्कि पूरे इस्लामी समाज के सुधार का संदेश
हुज्जतुल इस्लाम मोहम्मद मासूम अली ने ख़ुत्बा-ए-फ़दक के महत्व को बयान करते हुए कहा कि हज़रत फातिमा ज़हरा (स.अ.) ने फ़दक के मामले में अपना अधिकार प्रस्तुत करने के लिए मस्जिद-ए-नबवी में मुसलमानों की सभा को संबोधित किया और कुरआन करीम की आयतों तथा मजबूत तर्कों के माध्यम से अपना पक्ष स्पष्ट किया।
उन्होंने कहा कि ख़ुत्बा-ए-फ़दक को केवल फ़दक या आर्थिक विवाद के रूप में नहीं देखना चाहिए, क्योंकि इसमें तौहीद, नबूवत, इस्लामी आदेशों की हिकमत, न्याय, अहलेबैत (अ.स.) के अधिकार, इमामत और सामाजिक जिम्मेदारियों जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर भी चर्चा की गई है।
उन्होंने आगे कहा कि हज़रत ज़हरा (स.अ.) ने इस ख़ुतबे में स्पष्ट किया कि धार्मिकता केवल नमाज़, रोज़े और धार्मिक कार्यक्रमों तक सीमित नहीं है, बल्कि उसका वास्तविक प्रभाव इंसान के चरित्र, सामाजिक व्यवहार, न्याय और दूसरों के अधिकारों की अदायगी में दिखाई देना चाहिए।
उन्होंने बताया कि हज़रत फातिमा ज़हरा (स.अ.) ने अपने अधिकार की रक्षा में कुरआन करीम की उन आयतों से भी तर्क प्रस्तुत किया, जिनमें हज़रत सुलेमान (अ.स.) के हज़रत दाऊद (अ.स.) के वारिस होने और हज़रत ज़करिया (अ.स.) की अपने वारिस के लिए की गई दुआ का उल्लेख है। इस प्रकार आपने विरासत के मुद्दे पर कुरआन की रोशनी में अपना पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि फ़दक के मामले और उसके बाद पैदा हुई परिस्थितियों का उल्लेख शिया और सुन्नी, दोनों के ऐतिहासिक एवं हदीस संबंधी ग्रंथों में मिलता है।
हज़रत ज़हरा (स.अ.) की खामोशी नहीं, उनका विरोध भी इतिहास का हिस्सा है
ख़तीब-ए-जुमा ने हज़रत फातिमा ज़हरा (स.अ.) की रात में दफ़न किए जाने और उनकी वसीयत का उल्लेख करते हुए कहा कि ऐतिहासिक रिवायतों में आपको रात के समय दफ़न किए जाने और कुछ लोगों को इसकी सूचना न दिए जाने का उल्लेख मिलता है। मक्तब-ए-तशय्यो में इस घटना को पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.) के निधन के बाद पेश आई परिस्थितियों के प्रति आपके विरोध और नाराज़गी का एक महत्वपूर्ण संकेत माना जाता है।
उन्होंने कहा कि हज़रत ज़हरा (स.अ.) की क़ब्र का स्थान आज भी अज्ञात है और यह बात इतिहास में आपकी मज़लूमियत की याद दिलाती है। आपके जीवन और अंतिम दिनों का अध्ययन हमें यह समझने में मदद देता है कि सत्य की रक्षा के लिए अपनाया गया दृढ़ रुख आने वाली पीढ़ियों के लिए भी एक संदेश बन जाता है।
आज के समाज के लिए सीरत-ए-फ़ातिमा का संदेश
अपने संबोधन के अंतिम भाग में हुज्जतुल इस्लाम मोहम्मद मासूम अली ने हज़रत फातिमा ज़हरा (स.अ.) के जीवन से मिलने वाली व्यावहारिक शिक्षाओं को बयान करते हुए कहा कि हमें हर पुरानी परंपरा को आंख बंद करके स्वीकार करने के बजाय कुरआन, बुद्धि और न्याय की रोशनी में उसका मूल्यांकन करना चाहिए। व्यक्तिगत हितों से ऊपर उठकर सत्य की रक्षा करनी चाहिए और महिलाओं को शिक्षा, प्रशिक्षण तथा सामाजिक सुधार के क्षेत्र में अपनी भूमिका निभाने के अवसर मिलने चाहिए।
उन्होंने कहा कि इस्लामी एकता का अर्थ यह नहीं है कि अन्याय के सामने खामोशी अपना ली जाए, बल्कि आपसी सम्मान बनाए रखते हुए ऐतिहासिक और आस्थागत मतभेदों पर ज्ञान और तर्क के साथ चर्चा की जा सकती है। इसी तरह नई पीढ़ी को इस्लाम के इतिहास का प्रमाणिक अध्ययन करने के लिए प्रोत्साहित करना और उनमें सत्य-असत्य की पहचान पैदा करना भी हमारी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।
उन्होंने अभिभावकों को संबोधित करते हुए कहा कि वे अपनी संतानों का इस प्रकार पालन-पोषण करें कि उनमें सोचने-समझने की क्षमता, अध्ययन के प्रति रुचि, सत्य को पहचानने की समझ, दूसरों के प्रति सम्मान और अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाने का साहस पैदा हो।
संबोधन के अंत में उन्होंने दुआ की कि अल्लाह तआला सभी मुसलमानों को हज़रत फातिमा ज़हरा (स.अ.) की सीरत पर अमल करने, अहलेबैत (अ.स.) की विलायत से जुड़े रहने और समाज में सत्य एवं न्याय को बढ़ावा देने की तौफ़ीक़ अता फरमाए।
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