हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, गुंड हसी बट/ अय्याम-ए-फ़ातिमिया के अवसर पर श्रीनगर की जामे मस्जिद इमाम रज़ा, गुंड हसी बट में जुमे की नमाज़ आयोजित की गई। इस अवसर पर हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन आगा सैयद लियाकत हुसैन मूसवी ने ख़ुतबा दिया और नमाज़ की इमामत के फ़रायज़ अंजाम दिए। अपने संबोधन में उन्होंने हज़रत फातिमा ज़हरा (स.अ.) की सीरत, स्थान और प्रतिष्ठा तथा घराना-ए-नुबूवत और इमामत की केंद्रीय भूमिका पर प्रकाश डालते हुए मुस्लिम उम्मत को कुरआन और इतरत से जुड़े रहने की नसीहत की।
इलाही पैग़म्बरों की नियुक्ति; इंसान का मार्गदर्शन और प्रशिक्षण
आगा सैयद लियाकत हुसैन मूसवी ने कहा कि अल्लाह तआला ने पैग़म्बरों (अ.स.) को इंसानों के मार्गदर्शन और प्रशिक्षण, अज़ल के वचन की याद दिलाने तथा धरती पर न्याय और इंसाफ़ की स्थापना के लिए भेजा। पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.) मानवता के सबसे महान शिक्षक और प्रशिक्षक हैं। आपके सच्चे अनुयायी वे हैं, जो आपके नैतिक गुणों, विशेषताओं और श्रेष्ठताओं को अपने जीवन में अपनाने का प्रयास करते हैं।
उन्होंने रसूलुल्लाह (स.अ.व.) के विभिन्न सहाबियों के उदाहरण देते हुए कहा कि अबूज़र ग़िफ़ारी और सलमान फ़ारसी (रज़ि.) ने ईमान और मारफ़त के उच्च दर्जे हासिल किए। हालांकि, पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.) के सबसे पूर्ण रूप से प्रशिक्षित व्यक्तित्व वे हैं, जिन्होंने हज़रत फातिमा ज़हरा (स.अ.) के घर में परवरिश पाई। इनमें हज़रत फातिमा ज़हरा, अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली, इमाम हसन और इमाम हुसैन (अ.स.) शामिल हैं। इन सभी ने पैग़म्बरी गुणों और शिक्षाओं से भरपूर लाभ प्राप्त किया, हालांकि पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.) के बाद इनमें से किसी को भी नुबूवत का पद प्राप्त नहीं हुआ।
घराना-ए-ज़हरा (स.अ.); पैग़म्बरी आदर्श का पूर्ण प्रतिबिंब
आगा सैयद लियाकत हुसैन मूसवी ने कुरआन की आयत «قُلْ لَا أَسْأَلُكُمْ عَلَيْهِ أَجْرًا إِلَّا الْمَوَدَّةَ فِي الْقُرْبَىٰ» का हवाला देते हुए कहा कि हज़रत फातिमा ज़हरा (स.अ.) का घराना पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.) की सीरत का व्यावहारिक प्रतिबिंब और उम्मत के लिए मार्गदर्शन एवं प्रशिक्षण का महान केंद्र है। इस घराने की हस्तियां उम्मत के लिए आदर्श हैं। उनकी सीरत में ज्ञान, पवित्रता, मासूमियत, इबादत, नैतिकता और अल्लाह की बंदगी के उच्चतम उदाहरण दिखाई देते हैं।
उन्होंने कहा कि रसूलुल्लाह (स.अ.व.) ने विभिन्न अवसरों पर अहलेबैत (अ.स.) की महानता और उनके स्थान एवं प्रतिष्ठा को उम्मत के सामने स्पष्ट किया। मैदान-ए-मुबाहिला, जंगे ख़ंदक और वाक़या-ए-ग़दीर सहित विभिन्न अवसरों पर आपने अहलेबैत (अ.स.) की श्रेष्ठता और महत्व को उजागर किया। इसी तरह रिवायत के अनुसार, आप छह महीने तक हर सुबह हज़रत फातिमा ज़हरा (स.अ.) के घर के दरवाज़े पर तशरीफ़ ले जाते और आयत-ए-ततहीर के माध्यम से अहलेबैत (अ.स.) को याद दिलाते कि यह घर पवित्रता और पाकीज़गी का केंद्र है।
उन्होंने आगे कहा कि हज़रत ज़हरा (स.अ.) का घर ऐसा दरवाज़ा है, जहां से इंसान को धर्म, मारफ़त, आध्यात्मिकता और वास्तविक मार्गदर्शन प्राप्त होता है। मोमिन को चाहिए कि वह इस घराने की शिक्षाओं से जुड़ा रहे और अपने जीवन को उनकी सीरत के अनुरूप ढालने का प्रयास करे।
अहलेबैत (अ.स.) से दूरी; उम्मत में बिखराव का कारण
आगा सैयद लियाकत हुसैन मूसवी ने अफ़सोस जताते हुए कहा कि मुस्लिम उम्मत ने धीरे-धीरे अहलेबैत (अ.स.) की शिक्षाओं से दूरी बना ली, जिसके परिणामस्वरूप उम्मत की एकता कमज़ोर हुई और मुसलमान विभिन्न वैचारिक एवं व्यावहारिक रास्तों में बंट गए। उन्होंने कहा कि जब उम्मत ने मार्गदर्शन के इस स्रोत की अनदेखी की तो वह अपनी वास्तविक धार्मिक पहचान से भी दूर होती चली गई।
उन्होंने इमाम-ए-ज़माना (अ.ज.) से मंसूब इस कथन का हवाला दिया कि हज़रत फातिमा ज़हरा (स.अ.) आपके लिए सर्वोत्तम आदर्श हैं। आगा साहब के अनुसार, यह बात हज़रत ज़हरा (स.अ.) के महान स्थान और मानवता के मार्गदर्शन में उनकी केंद्रीय भूमिका को स्पष्ट करती है।
उन्होंने आगे कहा कि आज दुनिया बेचैनी, अशांति और विभिन्न संकटों से जूझ रही है। इसके बुनियादी कारणों में ईश्वरीय मार्गदर्शन और अहलेबैत (अ.स.) की शिक्षाओं से दूरी भी शामिल है। मुसलमानों ने इस्लामी शिक्षाएं प्राप्त करने के लिए ऐसे वैचारिक रुझानों का अनुसरण किया, जो इस्लामी मूल्यों के अनुरूप नहीं थे। इसके परिणामस्वरूप उन्होंने पूर्वी या पश्चिमी पहचान तो अपना ली, लेकिन वास्तविक इस्लामी शिक्षाओं से दूर होते चले गए।
न पूर्वी, न पश्चिमी; बल्कि इस्लामी पहचान
आगा सैयद लियाकत हुसैन मूसवी ने ईरान की इस्लामी क्रांति और हज़रत इमाम ख़ुमैनी (र.अ.) के विचार का उल्लेख करते हुए «لَا شَرْقِيَّةَ وَلَا غَرْبِيَّةَ، إِسْلَامِيَّةَ إِسْلَامِيَّةَ» के संदेश को उजागर किया। उन्होंने कहा कि मुसलमानों की वास्तविक पहचान इस्लामी होनी चाहिए, न कि पूर्व और पश्चिम के वैचारिक एवं सांस्कृतिक रुझानों का अंधानुकरण।
उन्होंने कहा कि घराना-ए-नुबूवत और इमामत उम्मत के लिए एकता का केंद्र और मार्गदर्शन का स्रोत है। लेकिन जब मुसलमान इस घराने की शिक्षाओं को छोड़कर दूसरे रास्तों पर चलने लगते हैं तो उनकी सामूहिक शक्ति और धार्मिक दूरदर्शिता प्रभावित होती है।
मुस्लिम देशों में इस्लामी आदेशों से दूरी पर चिंता
आगा सैयद लियाकत हुसैन मूसवी ने मौजूदा मुस्लिम समाजों का उल्लेख करते हुए कहा कि कुछ देशों में शासक इस्लाम का नाम तो इस्तेमाल करते हैं, लेकिन व्यवहार में बुनियादी इस्लामी आदेशों से दूरी अपनाई जा रही है। उन्होंने अज़रबैजान का उदाहरण देते हुए पर्दे के मामले और धर्मनिरपेक्ष रुझानों की आलोचना की। इसी तरह कुछ अरब देशों में पश्चिमी संस्कृति के बढ़ते प्रभाव और इस्लामी कानूनों एवं मूल्यों से बढ़ती दूरी पर भी चिंता जताई।
उनके अनुसार, यह स्थिति अहलेबैत (अ.स.) की शिक्षाओं और अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली (अ.स.) के मार्गदर्शन से दूरी के परिणामों में से एक है। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि मुसलमानों को अपनी धार्मिक पहचान, इस्लामी मूल्यों और कुरआन एवं इतरत से अपने जुड़ाव की रक्षा करनी चाहिए।
मुक्ति का मार्ग; कुरआन और इतरत से जुड़ाव
ख़ुतबे के अंत में आगा सैयद लियाकत हुसैन मूसवी ने कहा कि दुनिया और आख़िरत में मुक्ति का बुनियादी रास्ता कुरआन मजीद और रसूलुल्लाह (स.अ.व.) की इतरत से मज़बूती से जुड़े रहने तथा अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली (अ.स.) की शिक्षाओं से धर्म की जानकारी प्राप्त करने में है। उन्होंने मुस्लिम उम्मत से अपील की कि वह अहलेबैत (अ.स.) की सीरत को अपने व्यक्तिगत और सामूहिक जीवन का हिस्सा बनाए, ताकि एकता, दूरदर्शिता और वास्तविक इस्लामी पहचान को बढ़ावा मिल सके।
अंत में उन्होंने इस्लामी उम्मत की उन्नति, मुसलमानों की एकता और इस्लामी क्रांति ईरान की सफलता एवं गौरव के लिए दुआ की।
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