हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार, मौलाना सैयद मोहम्मद मोहसिन ज़ंगीपुरी 15 रमज़ान 1263 हिजरी को ज़ंगीपुर के एक मुमताज़ इल्मी व दीनी ख़ानावादे में पैदा हुए। इब्तिदाई तालीम अपने वतन ही में मौलवी महमूद अली और मौलवी अली हुसैन से हासिल की। उसके बाद आला तालीम के लिए मटिया बुर्ज कलकत्ता तशरीफ़ ले गए, जहाँ जनाब क़ाइमुद्दीन से अक़ली व नक़ली उलूम की तकमील की। उनकी ग़ैर-मामूली ज़हानत और इल्मी लियाक़त से मुतास्सिर होकर जनाब क़ाइमुद्दीन ने उन्हें अपने ख़ानदान में शामिल कर लिया और अरबी व फ़ारसी में फ़तावा नवीसी की ज़िम्मेदारी भी उन्हें सुपुर्द कर दी।
रिसाला “इस्लाह खुजवा” (1325 हिजरी) के मुताबिक़ अगरचे मौलाना का वतन ज़ंगीपुर था, लेकिन क़याम ज़्यादा तर मटिया बुर्ज में रहा। वह इल्म, ज़ोहद और तक़वे में अपनी मिसाल आप थे। नामवर आलिम-ए-दीन मिर्ज़ा हुसैन शहरिस्तानी ने उनकी इल्मी सलाहियतों का ऐतिराफ़ करते हुए उन्हें बाक़ायदा इजाज़ा अता फ़रमाया।
मौलाना मोहसिन ने तीन बार हज्ज-ए-बैतुल्लाह और तीन मर्तबा अतबात-ए-आलियात की ज़ियारत का शरफ़ हासिल किया। तबीयत में सादगी, इनकिसारी और गुमनामी का रुजहान नमायाँ था। बादशाह अवध वाजिद अली शाह ने उनके इल्म व फ़ज़्ल का ऐतिराफ़ करते हुए उन्हें शाही दरबार में तलब किया और अपनी इल्मी मजलिस का रुक्न मुक़र्रर किया। बादशाह की ख़्वाहिश पर शाही तसनीफ़ात की नज़रे सानी और इस्लाह का फ़रीज़ा भी इन्हीं के सुपुर्द था। इन ख़िदमात के ऐतराफ़ में बादशाह ने उन्हें “अकीलुल औलमा” का ख़िताब अता किया और दो सौ रुपये माहाना वज़ीफ़ा मुक़र्रर किया। वाजिद अली शाह को उनसे बेपनाह अकीदत थी, चुनांचे वफ़ात से एक रोज़ क़ब्ल गले लगाकर रोते हुए फ़रमाया कि मेरी तजहीज़ व तकफ़ीन आप ही अंजाम दें। मौलाना ने वसीयत के मुताबिक़ यह फ़रीज़ा अदा किया और बादशाह को इमामबाड़ा सिब्तैनाबाद में दफ़्न किया।
मौलाना मोहसिन ज़ंगीपुरी ने बेशुमार इल्मी व तहक़ीक़ी किताबें लिखीं, जिन में से बेश्तर अब तक ग़ैर-मुतबुआ हैं। उनके नुमायाँ इल्मी व अदबी आसार में अल-अज़्बुल मुईन शरहे अरबी, मिश्कातुल मसाबीह शरहे दुआए सबह, मिस्बाहुल बयान, तफ़सीरे सूरा ए रहमान, जवाहिरुत्ताज, ज़िया-उश-शम्स फ़ी मसाइलिल ख़ुम्स, नसीमुस्सुब्ह फ़ी सिलातिन निकाह, अत-तोहफ़तुल लुमा फ़ी सलातिल जुमा, फ़वाइदे मोहसिनिया, हाशिया शराए, सहर-ए-हिलाल, आयात-ए-बय्यिनात, क़सीदा ए मोहसिनिया, रूहुल यक़ीन, अज़हारुत्तंज़ील और मिस्बाहुल हुदा शामिल हैं।
उनके तर्बियतयाफ़्ता शागिर्दों में बड़े-बड़े नाम मिलते हैं, जिन में मौलवी सैयद सज्जाद हुसैन ज़ैदपुरी, मौलवी शेख सलामत अली लखनवी, मौलवी मिर्ज़ा ग़ुलाम रज़ा लखनवी, मौलवी सैयद महदी हुसैन लखनवी, मौलवी सैयद इनायत हुसैन गंज लखनऊ, मौलवी सैयद अशरफ़ अली, मौलवी सैयद अली कश्मीरी, मौलवी सैयद हुसैन कश्मीरी और मौलवी शैख वहीदुद्दीन कलकत्तवी क़ाबिल-ए-ज़िक्र हैं।
उनकी इल्मी शोहरत इराक़ तक पहुँची। आयतुल्लाह मिर्ज़ा सैयद मुहम्मद हुसैन शहरिस्तानी ने एक एहम और पेचीदा मसले पर उनसे राय तलब की और उनके आलिमाना जवाब से इस क़दर मुतास्सिर हुए कि 1314 हिजरी में उन्हें इजाज़ा अता फ़रमाया।
मौलाना की इबादत-गुज़ारी, ख़शियत-ए-इलाही और सोज़-ओ-गुज़ार का यह आलम था कि नमाज़ व दुआ में अक्सर गिरया तारी रहता। तहज्जुद व मुनाजात उनका मुस्तक़िल मामूल था। मजलिस-ए-अज़ा-ए-हुसैनी में जब इमाम हुसैन (अ.स.) का ज़िक्र होता तो उनकी आँखें अश्कबार हो जातीं और उनका रोना सामेईन के दिलों को भी पिघला देता। उनका वाज़ सादा पुर-तासीर और दिल-नशीन होता था।
सन् 1314 हिजरी में मटिया बुर्ज वापसी के बाद उन्हें इमामबाड़ा सब्तैनाबाद का मुतवली मुक़र्रर किया गया और 110 रुपये माहाना वज़ीफ़ा मुक़र्रर हुआ, मगर बादशाह की वफ़ात के बाद आप इस मंसब से दस्तबरदार हो गए।
आख़िरकार यह इल्म व अमल का आफ़्ताब 28 शाबान 1325 हिजरी को ज़ंगीपुर में ग़ुरूब हो गया। आपकी रहलत के बाद अहले इल्म और मोमिनीन ने शदीद रंज का इज़हार किया और हज़ारों अश्कबार आँखों के दरमियान आपके वतन ज़ंगीपुर में ही सुपुर्द-ए-ख़ाक कर दिया गया।
माखूज़ अज़: मौलाना सैयद रज़ी ज़ैदी फंदेड़वी जिल्द-10 पेज-396 दानिशनामा ए इस्लाम इंटरनेशनल नूर माइक्रो फ़िल्म सेंटर, दिल्ली, 2024ईस्वी।
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