सोमवार 9 मार्च 2026 - 20:10
रहबर ए शहीद के बाद निज़ाम-ए-विलायत-ए-फकीह की मज़बूत क़ियादत

हौज़ा / तंज़ीमुल-मकातिब के सचिव मौलाना सैयद सफी हैदर जैदी ने तीसरे रहबर-ए-इंक़िलाब-ए-इस्लामी आयतुल्लाह सैयद मुज्तबा ख़ामेनई के चुनाव पर अपने बयान में कहा है कि यह फैसला निज़ाम-ए-विलायत-ए-फकीह के तसलसुल और उम्मत-ए-मुस्लिमा के लिए उम्मीद और मजबूती का पैगाम है।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार , हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन मौलाना सैयद सफी हैदर ज़ैदी, सचिव तंज़ीमुल-मकातिब ने इस्लामी जम्हूरिया-ए-ईरान के नए रहबर आयतुल्लाह मुजतबा ख़ामेनई (हफ़िज़हुल्लाह) के चुनाव पर एक पैगाम जारी करते हुए कहा कि अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली इब्ने अबी तालिब (अ.स.) की शहादत के दिनों में जब दिल उदास हैं और आँखें अश्कबार हैं और फ़रज़ंद-ए-अली (अ.स.) की शहादत ने इस ग़म को दो बाला कर दिया है।

यह ख़बर ज़ख्म पर मरहम के छिड़काव की तरह है कि वह अली (अ.स.), जिसे कल मेहराब-ए-इबादत में शहीद करके ज़ालिम ने सोचा था हमने इस सिलसिले को खत्म कर दिया, उसी सिलसिले से रहबर ए कबीर-ए-इंक़िलाब-ए-इस्लामी आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद रूहुल्लाह खुमैनी रहमतुल्लाह अलैह ने इंक़िलाब-ए-इस्लामी के ज़रिए मिल्लत को नया जीवन अता की।

उनके बाद रहबर-ए-शहीद आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामेनई (रज़ीअल्लाहु अन्हु) ने इस अज़ीम सरमाए की न सिर्फ हिफ़ाज़त की बल्कि उसे सारी दुनिया तक इस तरह पहुँचा दिया कि पूरी दुनिया का झुकाव अहल-ए-बैत (अ.स.) की तरफ हो गया। उनकी शहादत के बाद एक तरह की यासियत (निराशा) ज़ेहनों पर तारी हो रही थी कि अब क्या होगा, अब कौन इस कश्ती को संभालेगा?

उन्होंने कहा कि करम-ए-परवरदिगार से एक बार फिर उसी सिलसिले से आयतुल्लाह सैयद मुजतबा ख़ामेनई दाम जिल्लुहुल आली इस्तेमार की तमाम धमकियों के बावजूद निज़ाम-ए-इस्लामी की बागडोर संभालने के लिए सामने आ गए। और एक बार फिर यह हकीकत सामने आ गई कि हम लावारिस नहीं हैं। ज़माने का वाली और हम सब का सरपरस्त व निगेहबान  ग़ैब से हमारी मुहाफ़िज़त कर रहा है।

मौलाना सफी हैदर जैदी ने कहा कि अब ईरान के इस्लामी निज़ाम के तहत 80 से ज़्यादा फुक़हा के ज़रिए मुंतख़ब होने वाले वली-ए-फकीह आयतुल्लाह सैयद मुजतबा ख़ामेनई से वाबस्तगी इख्तियार करने का वक़्त है।

आइए, मौजूदा वली-ए-फकीह की विलायत को कुबूल करते हुए इमाम-ए-ज़माना अज्जल्लाहु फ़रजहुश्शरीफ के हुज़ूर एक बार फिर अहद करें कि ज़िंदगी की आखिरी सांस तक इस निज़ाम-ए-विलायत-ओ-मरजइयत से वाबस्ता रहेंगे और ग़ैबत के ज़माने में वली-ए-फकीह के दायरा-ए-इताअत-ओ-विलायत में रहते हुए, इन शा अल्लाह, वक़्त-ए-ज़ुहूर-ए-इमाम अ.स.के  मददगारों में शामिल होंगे।

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