हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार, आयतुल्लाहिल उज़्मा शहीद सय्यद अली ख़ामेनेई (र) ने "ज़ालिम की मदद" करने के संबंध में पूछे गए सवाल के जवाब मे महत्वपूर्ण निर्देश दिए हैं, शरई मसाइल मे रूचि रखने वालो के लिए प्रस्तुत किए जा रहे हैं।
प्रश्न: ज़ालिम (अत्याचारी) की मदद करने का तरीका और उसका इस्लामी हुक्म क्या है?
उत्तर: आजकल जो मदद आम तौर पर देखने को मिलती है, उनमें से एक है प्रचार (टेलीविज़न, मीडिया, भाषण) के ज़रिए मदद करना। जैसे कि शियो (मुसलमानों के एक विशेष वर्ग) के कत्लेआम को सही ठहराने के लिए प्रचार करना। या फिर यह कि कोई व्यक्ति किसी की हत्या (टारगेट किलिंग) की साजिश रच रहा हो, और दूसरा व्यक्ति उसे नक्शा (प्लान) बनाकर रास्ता दिखाए, तो यह भी ज़ालिम की मदद है।
इसी तरह, अगर कुछ लोग ज़ुल्म को रोकना चाहते हों, और कोई दूसरा व्यक्ति ज़ालिम के काम को सही ठहराए; जैसे कि हज़रत इमाम हुसैन (अ) की हत्या को जायज़ ठहराने वाला फतवा देना, ये सब भी "मदद" के अंतर्गत आते हैं, क्योंकि आम समझ (उर्फ़) में इन सबको ज़ुल्म में सहायता माना जाता है।
नोट:
आम समझ (उर्फ़) के अनुसार जो भी चीज़ ज़ालिम की मदद गिनी जाए, वह हराम है।
चाहे वह मदद सीधी हो, जैसे कोई ज़ालिम किसी व्यक्ति को कोड़े मारना चाहता है और कोई दूसरा उसकी मदद करे; उदाहरण के तौर पर उसे कोड़ा थमा दे, या फिर मज़लूम को पकड़कर रखे ताकि ज़ालिम उसे अच्छे से पीट सके।
या फिर वह मदद गैर-सीधी हो, जैसे कि ज़ालिम अपने ज़ुल्म के दौरान प्यासा हो जाए, और आप उसे पानी पिला दें ताकि उसकी प्यास बुझ जाए और वह फिर से ज़ोर-शोर से ज़ुल्म कर सके।
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