मंगलवार 4 अगस्त 2026 - 10:17
अरबईन-ए-हुसैनी शिया पहचान और उम्मते मुस्लिमा की जागृति का वैश्विक प्रतीक है: मौलाना सैय्यद तक़ी रज़ा

मजलिस-ए-उलेमा-ए-दक्षिण भारत के प्रमुख हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन सैय्यद तक़ी रज़ा आबिदी (तक़ी आगा) ने अरबईन-ए-हुसैनी के अवसर पर नजफ़ अशरफ़ से कर्बला-ए-मुअल्ला की ओर पैदल यात्रा के दौरान हौज़ा न्यूज़ से विशेष बातचीत में कहा कि अरबईन, हज़रत इमाम हुसैन (अ.) की सत्यता, मक्तबे अहले बैत (अ.) के वैश्विक जीवन और इस्लाम की स्थिरता का जीवंत चमत्कार है। इसने शिया पहचान को विश्व स्तर पर मजबूत किया है और दुनिया को सत्य, न्याय और त्याग का अमर संदेश दिया है।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, मजलिस-ए-उलेमा-ए-दक्षिण भारत के प्रमुख सैय्यद तक़ी रज़ा आबिदी ने अरबईन-ए-हुसैनी के अवसर पर नजफ़ अशरफ़ से कर्बला-ए-मुअल्ला की ओर पैदल यात्रा के दौरान हौज़ा न्यूज़ के प्रतिनिधि से बातचीत करते हुए कहा कि अरबईन केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं है, बल्कि हज़रत इमाम हुसैन (अ.) की सत्यता, इस्लाम के पुनर्जीवन और मक्तबे अहले बैत (अ.) के वैश्विक प्रभाव का जीवंत चमत्कार है, जिसे आज पूरी दुनिया देख रही है।
उन्होंने अपनी बात की शुरुआत इन पंक्तियों से की—
"नेज़े पर चढ़कर भी वह दो जहाँ को हिला देती है,
कर्बला मौत को भी दीवाना बना देती है।"
उन्होंने कहा कि आज पूरी दुनिया हज़रत इमाम हुसैन (अ.) और उनके वफ़ादार 72 साथियों के अरबईन की याद मना रही है। चौदह सौ वर्षों से हर साल अरबईन मनाया जा रहा है, लेकिन इसकी ताज़गी और प्रभाव ऐसा है कि महसूस होता है जैसे घटना-ए-कर्बला अभी इसी वर्ष हुई हो। यह हज़रत इमाम हुसैन (अ.) की शहादत का जीवंत चमत्कार और अल्लाह की हिकमत का स्पष्ट प्रमाण है।
मौलाना सैय्यद तक़ी रज़ा आबिदी ने कहा कि घटना-ए-कर्बला को जीवित रखने में अहले बैत (अ.) के इमामों की अतुलनीय कुर्बानियों, शिक्षाओं और लगातार प्रयासों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। उन्हीं के प्रयासों के कारण हर वर्ष ग़मे-हुसैन (अ.) ताज़ा होता है, करोड़ों दिल इस महान दुख पर शोक मनाते हैं और लाखों आँखें अश्कबार हो जाती हैं।
उन्होंने कहा कि दुनिया में सरकारें महान हस्तियों को समय-समय पर सम्मान देती हैं, लेकिन हज़रत इमाम हुसैन (अ.) की शहादत पर स्वयं अल्लाह तआला ने चालीस दिनों तक इस महान त्रासदी की महानता को उजागर किया। रिवायतों में उल्लेख है कि आशूरा के बाद चालीस दिनों तक आसमान ने शोक मनाया। यहाँ तक कि कुछ ऐतिहासिक रिवायतों में आसमान के लाल होने और रक्त जैसी वर्षा के निशान का भी उल्लेख मिलता है। इस प्रकार अरबईन वास्तव में सबसे पहले आसमान की ओर से मनाया गया शोक है, जिसकी याद आज भी ईमान वालों के दिलों को दुखी और आँखों को नम कर देती है।
उन्होंने कहा कि अरबईन केवल धरती वालों का ही नहीं, बल्कि रिवायतों के अनुसार आसमान वालों का भी शोक है। यही कारण है कि हर वर्ष ग़मे-हुसैन (अ.) पहले से अधिक ताज़ा महसूस होता है।
मजलिस-ए-उलेमा-ए-दक्षिण भारत के प्रमुख ने नजफ़ अशरफ़ से कर्बला-ए-मुअल्ला तक होने वाली महान पैदल ज़ियारत के महत्व को बताते हुए कहा कि आज अरबईन का यह वैश्विक आंदोलन शिया पहचान, उम्मते मुस्लिमा की शक्ति और दुनिया के सामने सत्य, न्याय, त्याग और मानवता का महान संदेश बन चुका है।
उन्होंने कहा कि जो भी ज़ायिर इस पवित्र भूमि पर मौजूद हो, उसे चाहिए कि चाहे थोड़े समय के लिए ही सही, इस महान पैदल यात्रा में अवश्य शामिल हो, क्योंकि यही हमारी पहचान, हमारी शक्ति और दुनिया के लिए हमारा वैश्विक संदेश है।
मौलाना सैय्यद तक़ी रज़ा आबिदी ने आगे कहा कि यदि अरबईन का यह महान आंदोलन न होता, तो इराक़ की धार्मिक पहचान को गंभीर खतरे हो सकते थे। उनके अनुसार सद्दाम शासन के पतन के बाद बाहरी शक्तियों ने इराक़ में अपने धार्मिक और सांस्कृतिक प्रभाव को बढ़ाने की कोशिश की, लेकिन अरबईन की लगातार बढ़ती हुई इस महान आंदोलन ने इन सभी प्रयासों को विफल कर दिया और इराक़ को मक्तबे अहले बैत (अ.) का मजबूत केंद्र बनाए रखा।
उन्होंने कहा कि आज अरबईन ने केवल इराक़ ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में इस्लाम और मक्तबे अहले बैत (अ.) के संदेश को नया जीवन दिया है। लाखों ज़ायरीन का नजफ़ से कर्बला तक पैदल सफर इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि हज़रत इमाम हुसैन (अ.) का बलिदान आज भी मानवता के लिए मार्गदर्शन, जागृति और दृढ़ता का स्रोत है।
अंत में उन्होंने कहा कि अरबईन-ए-हुसैनी पूरे इस्लामी जगत की एकता, जागृति और अत्याचार के विरुद्ध प्रतिरोध का सबसे बड़ा प्रतीक बन चुका है और यही आंदोलन भविष्य में भी इमाम हुसैन (अ.) के संदेश को पूरी दुनिया में जीवित रखेगा।

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