हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार, उत्तर प्रदेश का तारीख़ी शहर फ़ैज़ाबाद जहाँ सदियों से इल्म व अदब की रोशनी फैलती रही, उसी मर्दमखेज़ सरज़मीन ने 1 जनवरी 1942 को एक ऐसे गोहर-ए-नायाब को जन्म दिया, जो आगे चलकर "फ़ाज़िल फ़ैज़ाबादी" के तख़ल्लुस से इल्मी दुनिया में पहचाने गए। ये थे मौलाना सैयद अली हम्माद आबिदी उर्फ दाऊद।
आपकी इब्तिदाई तालीम का आग़ाज़ फ़ैज़ाबाद की मशहूर दरसगाह "वसीक़ा अरबी कॉलेज" से हुआ, जहाँ मौलाना वसी मोहम्मद और मौलाना सआदत हुसैन ख़ाँ जैसे जय्यद असातेज़ा की निगरानी ने मूसूफ़ की इल्मी बुनियादों को मज़बूत किया। ज़ेहानत, मेहनत और शौक़-ए-इल्म ने जल्द ही उन्हें नुमायाँ कर दिया। अरबी व फ़ारसी बोर्ड के मुंशी, मौलवी, आलिम और फ़ाज़िल के इम्तिहानों में शानदार कामयाबियाँ इसका वाज़ेह सबूत थीं।
लेकिन ये तो बस इब्तिदा थी, इल्म की प्यास उन्हें बनारस ले गई, जहाँ "जवादिया अरबी कॉलेज" में मौलाना सैयद ज़फ़रुल हसन से कस्ब-ए-फ़ैज़ करके "फ़ख़्र-उल-अफ़ाज़िल" की सनद हासिल की। फिर लखनऊ का सफ़र और "मदरसा-ए-वाइज़ीन" में नादिरत-उज़-ज़माँ मौलाना इब्ने हसन की शागिर्दी—यही वो मरहला था जहाँ उनकी शख़्सियत एक मोअस्सिर वाइज़ के तौर पर निखर कर सामने आई।
आप तालीम मुकम्मल करने के बाद अपने वतन लौटे और 1 मार्च 1968 को गुलाबबाड़ी, फ़ैज़ाबाद में वाक़े मक़बरा नवाब शुजाउद्दौला के मुन्तज़िम मुक़र्रर हुए। ये सिर्फ़ एक ओहदा नहीं था, ये ख़िदमत का एक नया बाब था, जिसे उन्होंने इख़्लास और ज़िम्मेदारी के साथ रौशन किया।
वतन से बाहर भी आपकी ख़िदमात का दायरा फैला। इलाहाबाद की शिया जामा मस्जिद में माह-ए-रमज़ान के दौरान तीन साल तक इमाम-ए-जमाअत की हैसियत से ख़िदमात अंजाम दीं, जहाँ मौलाना की मेहनत ने नौजवान नस्ल के दिलों में दीन की शमा रौशन की।
क़लम उनका हमसफ़र था, तहरीर उनकी पहचान। इब्तिदाई दौर ही से उनके मज़ामीन और क़साइद "अल-वाइज़", "अल-जवाद", बनारस, "सरफ़राज़", "सरफ़रोश" जौनपुर और दिल्ली के रिसालों में शाए होने लगे। यहाँ तक कि शदीद बीमारी और दिल की तकलीफ़ भी उनके अज़्म को मुतज़लज़ल न कर सकी—क़लम उनके हाथ से कभी न छूटा।
तस्नीफ़ व तालीफ़ के मैदान में भी उनकी ख़िदमात बेमिसाल हैं। जिनमें: वज़ाइफ़-ए-फ़ुरक़ान, अस्मा-ए-हुस्ना, पंज गंज, मरग़ूब-उल-क़ुलूब, अजाइब-ए-क़ुरआन, इस्लाम और नमाज़, सवानिह-ए-मासूमीन और नहीं अनिल मुनकर जैसी मुतअद्दिद कुतुब उनके इल्मी ज़ौक़ की आइना-दार हैं।
ख़ुसूसन "तशरीह-उल-मसाइब", वाक़ियात-ए-कर्बला पर एक जामे तस्नीफ़ है जिसमें इमाम हुसैन (अ.स.) की मदीना से रवानगी से लेकर असीरी-ए-अहले हरम तक के तमाम दर्दनाक मराहिल को यकजा कर दिया गया।
इसी तरह "इरफ़ान-ए-अहले बैत" और हिंदी ज़बान में "अफ़साना-ए-आख़िरत" भी उनकी फ़िक्र का रौशन इज़हार हैं।
शेर-ओ-सुख़न भी आपकी शख़्सियत का एक नुमायाँ पहलू था। मूसूफ़ मौलाना मोहम्मद अहमद फ़हीम जौनपुरी से इस्लाह लेते और उन्हीं से "फ़ाज़िल" तख़ल्लुस पाया। मौलाना का मजमूआ-ए-क़साइद "गुलहाए मोहब्बत" लखनऊ से शाए हुआ और बेहद मक़बूलियत हासिल की। वो न सिर्फ़ एक कोहना मश्क़ शायर थे बल्कि एक पुरअसर ज़ाकिर-ए-अहले बैत (अ.स.) भी थे जिनकी ज़ाकिरी में दर्द, इबरत और सीरत-ए-आइम्मा (अ.स.) की रौशनी नुमायाँ होती थी।
फ़ाज़िल फ़ैज़ाबादी की ज़िंदगी का हर लम्हा ख़िदमत-ए-दीन के लिए वक़्फ़ था। वो सिर्फ़ दरसगाहों तक महदूद न रहे बल्कि घरों तक पहुँचे, बच्चों को क़ुरआन सिखाया और उन बुज़ुर्गों को भी पढ़ाया जो उम्र भर इस सआदत से महरूम रहे थे।
इसी तरबियत का असर है कि आपकी इल्मी विरासत आज भी ज़िंदा है। मौलाना के नवासे मौलाना सैयद दबीर अख़्तर आबिदी (काशान) क़ुम मुक़द्दसा में इल्म हासिल कर रहे हैं, जबकि फ़र्ज़ंद सैयद इरफ़ान रज़ा आबिदी एक क़ादिर-उल-कलाम ख़तीब और ख़ुशफ़िक्र शायर के तौर पर पहचाने जाते हैं।
मौलाना सैयद अली हम्माद आबिदी एक ऐसी हस्ती थे, जिसे न शोहरत की तलब थी, न नामवरी की ख़्वाहिश—वो ख़ामोशी से, गोशा-नशीनी में, इल्म व दीन की ख़िदमत करते रहे।
आख़िरकार ये इल्म व अदब का रौशन चराग़ 29 जनवरी 2020 को फ़ैज़ाबाद की सरज़मीन पर हमेशा के लिए ग़ुरूब हो गया। नमाज़-ए-जनाज़ा के बाद, चाहने वालों की आहों और सिसकियों के दरमियान, क़ब्रिस्तान मौलवी बाग फ़ैज़ाबाद में सुपुर्द-ए-ख़ाक कर दिया गया।
माखूज़ अज़: नुजूमुल हिदाया, तहक़ीक़ो तालीफ़: मौलाना सैयद रज़ी ज़ैदी फंदेड़वी जिल्द-10 पेज-132 दानिशनामा ए इस्लाम इंटरनेशनल नूर माइक्रो फ़िल्म सेंटर, दिल्ली, 2024 ईस्वी।
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