हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, इस्लामी फ़िक़्ह में आर्थिक दायित्वों को पूरा करने के मामले में परेशानी को दूर करने और जिम्मेदार व्यक्ति के लिए आसानी पैदा करने के सिद्धांत को महत्व दिया गया है, ताकि इबादत और धार्मिक दायित्वों को पूरा करने से जीवन-यापन में कठिनाई पैदा न हो। इसलिए, आर्थिक रूप से सक्षम न होने की स्थिति में ख़ुम्स की रकम को एक साथ देने के बजाय किस्तों में अदा करना एक जायज़ तरीका है। इससे ख़ुम्स की अनिवार्यता भी बनी रहती है और अल्लाह के हक़ तथा सादात के हिस्से को अदा करना भी आसान हो जाता है।
सवाल: इस साल हमारा ख़ुम्स 60 लाख तोमान हुआ है। हमारे लिए ख़ुम्स की पूरी रकम एक साथ अदा करना संभव नहीं है। दूसरी ओर, हमारे परिचितों में एक ज़रूरतमंद सैयद भी हैं, जिन्हें मैं सादात के हिस्से से ख़ुम्स की रकम किस्तों में दे सकता हूं। क्या ख़ुम्स को किस्तों में अदा करना जायज़ है?
जवाब: हुज्जतुल-इस्लाम वल-मुस्लेमीन अलीयान नजाद, हज़रत आयतुल्लाहिल उज़्मा मकारिम शीराज़ी के प्रतिनिधि:
अगर आपके पास ख़ुम्स की रकम एक साथ अदा करने की आर्थिक क्षमता नहीं है या एक साथ भुगतान करना आपके लिए परेशानी का कारण बनता है, तो आप ख़ुम्स को किस्तों में अदा कर सकते हैं। हालांकि, किस्तों की अवधि दो या तीन साल से अधिक नहीं होनी चाहिए। इसके अलावा, ख़ुम्स की रकम को किस तरह खर्च किया जाए, इस बारे में क़ुम स्थित उनके कार्यालय से संपर्क करें, ताकि वे आपको आवश्यक मार्गदर्शन दे सकें।
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