हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, हज़रत आयतुल्लाह शहीद सय्यद अली ख़ामेनेई ने “शादी के इरादे से नामहरम को देखने” से संबंधित एक सवाल का जवाब दिया है, जिसे पाठकों की जानकारी के लिए प्रस्तुत किया जा रहा है।
शादी के इरादे से नामहरम को देखना
सवाल:
1- अगर कोई युवक किसी से प्रेम करने लगे, तो वह किस हद तक उसके बारे में सोच सकता है?
2- अगर किसी महिला को देखने का उद्देश्य केवल शादी करना हो, तो वह युवक उसे किस हद तक देख सकता है?
जवाब:
1-नामहरम के बारे में अनजाने में विचार आना कोई समस्या नहीं है, लेकिन जानबूझकर ऐसा करने की स्थिति में एहतियात-ए-वाजिब यह है कि शहवत को उत्तेजित करने के उद्देश्य से नामहरम की कल्पना करने से बचा जाए। केवल सवाल में बताई गई स्थिति इसे जायज़ नहीं बनाती।
2- शादी के उद्देश्य से महिला को देखने में कोई हर्ज नहीं है, बशर्ते कि वह महिला शादी की योग्य हो, युवक उसे पसंद आने पर उससे शादी करने का इरादा रखता हो और उसे यह संभावना हो कि वह महिला उसके विवाह प्रस्ताव को स्वीकार कर लेगी। साथ ही, देखने का उद्देश्य उसके बारे में अधिक जानकारी प्राप्त करना हो और देखने में लज्जत या आनंद की नीयत न हो।
ऐसी स्थिति में युवक के लिए लड़की का चेहरा, हाथ, बाल और शारीरिक विशेषताओं को देखना जायज़ है। हालांकि, अगर एक बार देखना पर्याप्त हो, तो दोबारा देखना जायज़ नहीं है।
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