हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, पवित्रता अल्लाह तआला की बारगाह में हाज़िरी और दिन-रात की फ़र्ज़ नमाज़ अदा करने की पहली शर्त है। ग़ुस्ल और वुज़ू से संबंधित मरजए तक़लीद के फ़तवों की जानकारी रखना इबादत की सही अदायगी में किसी भी तरह की परेशानी से बचाता है। हुज्जतुल-इस्लाम वल-मुस्लिमीन फ़लाहज़ादे ने विभिन्न प्रकार के ग़ुस्ल के बाद नमाज़ अदा करने के हुक्म को स्पष्ट किया है।
सवाल: शहीद आयतुल्लाह ख़ामेनेई के फ़तवे के अनुसार, क्या ग़ुस्ले जुमा के बाद फ़र्ज़ नमाज़ अदा की जा सकती है, यानी बिना वुज़ू के नमाज़ पढ़ सकते हैं?
जवाब: हुज्जतुल-इस्लाम वल-मुस्लेमीन फ़ल्लाहज़ादे, शहीद आयतुल्लाह ख़ामेनेई (र) के प्रतिनिधि: आयतुल्लाह ख़ामेनेई के अनुसार केवल ग़ुस्ले जनाबत के बाद नमाज़ पढ़ी जा सकती है और इसके लिए वुज़ू की आवश्यकता नहीं होती। लेकिन दूसरे सभी ग़ुस्लों के बाद—चाहे वे वाजिब ग़ुस्ल हों या मुस्तहब ग़ुस्ल, जिनमें ग़ुस्ले जुमा भी शामिल है और जो मुस्तहब-ए-मोअक्कद है—अगर कोई व्यक्ति नमाज़ पढ़ना चाहता है या ऐसा कोई काम करना चाहता है जिसके लिए तहारत आवश्यक है, तो उसे वुज़ू करना होगा।
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