शुक्रवार 31 जुलाई 2026 - 07:42
अरबईन-ए-हुसैनी का नैतिक संदेश

कर्बला, जो कि मज़लूमियत का प्रतीक है, इसे केवल इमाम हुसैन (अ) की मज़लूमियत तक सीमित रखना उचित नहीं है, बल्कि कर्बला ईसार, क़ुर्बानी , अख़लाक़ और किरदार, तहज़ीब व तमद्दुन‌और इंसानी क़द्रों का वह कोह-ए-हिमालय  है, जिससे टकराकर तूफ़ान-ए-यज़ीदियत स्वतः ही नष्ट और मिट जाता है।

लेखक: मौलवी वकार हैदर अमलोवी

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी | अरबईन-ए-हुसैनी केवल एक धार्मिक समागम नहीं है, बल्कि मानवता के उच्चतम नैतिक सिद्धांतों का मूर्त रूप है। हर साल जब करोड़ों लोग नजफ से कर्बला की ओर पैदल सफर करते हैं, तो इस सफर में केवल पैरों की थकान नहीं, बल्कि आध्यात्मिक जागरूकता और नैतिक शुद्धिकरण की एक महान प्रक्रिया कार्यरत होती है।

शहीद रहबर-ए-इंक़िलाब-ए-इस्लामी, हज़रत आयतुल्लाहिल उज़्मा सय्यद अली हुसैनी ख़ामनेई (कु) अरबईन के संबंध में फ़रमाते हैं: "हज़रत इमाम हुसैन (अ) का संबंध पूरी मानवता से है। शिया समुदाय को इस बात पर गर्व है कि हम इमाम हुसैन (अ) के अनुयायी हैं। साथ ही, हज़रत इमाम हुसैन (अ) का संबंध केवल हम तक सीमित नहीं है, बल्कि सभी इस्लामी मज़हब इमाम हुसैन (अ) के झंडे तले हैं। बल्कि इस महान अरबईन पदयात्रा में ग़ैर-मुस्लिम व्यक्ति भी शामिल होते हैं। अरबईन-ए-हुसैनी की यात्रा अल्लाह सुब्हानहु व तआला की महान निशानियों में से है, जो विश्व-मानवता पर प्रकट हो रही है।" यही कारण है कि यह ऐसा सफर है, जहाँ कोई दूसरों पर अपनी श्रेष्ठता नहीं जताता, जहाँ न जाति, न भाषा, न रंग, न संप्रदाय—मानो किसी भी प्रकार का कोई भेद नहीं रहता, बस हर तरफ से एक हृदय-स्पर्शी आवाज़ आती है: "...हैलबीकुम या ज़व्वारल हुसैन" (अर्थात हे हुसैन (अ.स.) के ज़ाइरों! हम आपकी सेवा के लिए तैयार हैं) और सभी एक ही काफिले—अरबईन-ए-हुसैनी के काफिले—के यात्री होते हैं।

इस सफर में ईसार और क़ुर्बानी का वह दृश्य देखने को मिलता है, जो मानवता के इतिहास में शायद ही कहीं दिखाई देता है—जब ख़ुदपरस्ती को कुचलकर ख़ुदग़र्ज़ी का काला कफ़न उतार फेंका जाए और ईसार व फ़िदाकारी का लाल चोग़ा पहना जाए, तो मनुष्य एक नया दृश्य देखता है—वह दृश्य जो अरबईन-ए-हुसैनी में जगह-जगह अपनी चमक बिखेरता नज़र आता है।

मनुष्य स्वयं भूखा-प्यासा हो, लेकिन ज़ाइर  को तृप्त और सराबोर करे, अपना बिस्तर ज़ाइर के लिए समर्पित कर दे, अपनी विश्राम-स्थली को दूसरे के आराम का स्थान बना दे—यह सब तभी संभव है जब मनुष्य अपनी 'ज़ात' की बंदिशों से निकलकर अख़लाक़-ए-हुसैनी मे ढल जाए।

जहाँ करोड़ों की भीड़ हो, लेकिन तनाज़ुआत का नाम-ओ-निशान तक न मिले, वहाँ कोई क़ानून नहीं, बल्कि अख़लाक़ी नज़्म-ओ-ज़ब्त कार्यरत होता है। यह वही अख़लाक़ है, जिसका पाठ इमाम हुसैन (अ) ने कर्बला में दिया, और जो अरबईन के सफर में जीवित और जारी दिखता है।

यही वह पैग़ाम है, जो हर साल ज़ाइरीन-ए-इमाम हुसैन (अ) के माध्यम से इराक़ की पवित्र भूमि कर्बला-ए-मुआल्ला से पूरी दुनिया तक पहुँचता है। मानो यदि समाज में प्रत्येक व्यक्ति अपने 'अहंकार को रौंद दे और दूसरों की सेवा को अपना गौरव और प्रतीक समझे, उनके अधिकारों का ध्यान रखते हुए उन्हें अदा करे, और नफ़सानी इच्छाओं और आपसी विवादों से ऊपर उठ जाए, तो यह पूरे विश्वास और यक़ीन के साथ कहा जा सकता है कि यह फ़ानी दुनिया भी नमूना-ए-जन्नत बन सकती है। और यही अरबईन-ए-हुसैनी का वास्तविक नैतिक संदेश है—जहाँ मनुष्य बिना किसी स्वार्थ, अहंकार या घमंड के अपनी इस आरज़ी ज़िंदगी को मनुष्य और मानवता के लिए समर्पित कर दे, उसे सफ़र-ए-अरबईन-ए-हुसैनी कहा जाता है।

वास्तव में, कर्बला, जो कि मज़लूमियत का प्रतीक है, इसे केवल इमाम हुसैन (अ) की मज़लूमियत तक सीमित रखना उचित नहीं, बल्कि कर्बला ईसार, क़ुर्बानी , अख़लाक़ व किरदार, तहज़ीब व तमद्दुन और इंसानी क़द्रो का वह कोह-ए-हिमालय है, जिससे टकराकर तूफ़ान-ए-यज़ीदियत स्वयं नष्ट हो जाता है।

कर्बला की पुस्तक का प्रत्येक अध्याय अपने आप में एक उज्ज्वल मीनार-ए-हिदायत है; रम्ज़-ए-ज़िंदगी, राज़-ए-बंदगी  कर्बला के दामन की चमक में भली-भाँति दिखाई देता है।

और वही चमक जब अहल-ए-ईमान के दिलों में प्रकट होती है, तो उनकी रूहें रूह-ए-हुसैनी से जुड़ जाती हैं, जिसके कारण उनमें वही इख़्लास और अमल पैदा होता है, जिसकी आवश्यकता हज़रत अबा अब्दिल्लाहिल हुसैन (अ) ने ख़ादिमीन और ज़ाइरीन से की है।

इसलिए, अरबईन-ए-हुसैनी के पवित्र और विशिष्ट अवसर पर जो रूह-परवर दृश्य नज़रों के सामने आते हैं, वे उसी इंसान-साज़ इश्क़-ए-हुसैनी की मूर्त तस्वीर होते हैं—वह प्रेम जिसमें इतनी शक्ति होती है कि वह मनुष्य की बुद्धि और चेतना को आध्यात्मिक जागरूकता प्रदान करता है, और अख़लाक़ व ईसार का ऐसा पाठ पढ़ाता है, जिसकी मिसाल दुनिया के किसी अन्य समागम या हुजूम  में कतई नहीं देखी जा सकती।

यह इसी इश्क़-ए-हुसैनी की कृपा है कि दुनिया के अतीत के सभी आयोजित समागमों से लेकर वर्तमान के किसी राजनीतिक या सामाजिक हुजूम व समागम में इतना इंसान-साज़"...एक सभ्य और संस्कारी दृश्य और इतना गहरा आध्यात्मिक एवं मलकूती प्रभाव और कहीं नहीं देखा जा सकता, जो 'अरबईन-ए-हुसैनी' के अवसर पर वर्षों से विचारशील लोगों को दिखाई दे रहा है।

यह कहना पूर्णतः उचित और सही है कि दुनिया के विभिन्न समागम, चाहे वे राजनीतिक हों या सामाजिक, धार्मिक हों या मज़हबी, क्योंकि उनमें 'इश्क़-ए-हुसैनी' (हुसैन (अ) से प्रेम और अहलेबैत (अ) की शिक्षाओं का अभाव होता है, इस कारण उन समागमों में असंख्य नैतिक, सांस्कृतिक, सभ्यतागत और शैक्षणिक कमियाँ पाई जाती हैं।

लेकिन 'अरबईन-ए-हुसैनी' का सार्वभौमिक समागम, जिसमें शामिल ख़ादिमीन और ज़ाइरीन के दिलों में जब 'इश्क़-ए-हुसैनी' का जज़्बा और 'ग़म-ए-हुसैन (अ)' का जोश व खरोश  पैदा होता है, तो उनके भीतर एक अनोखी क्रांतिकारी अवस्था जन्म लेती है, और वही आध्यात्मिक प्रभाव और आंतरिक क्रांति उन्हें इस बात पर मजबूर करती है कि वे इस महान आध्यात्मिक समागम में 'तक़र्रुब-ए-इलाही' के लिए 'हुसैनी चरित्र' पर अमल करते हुए अपने 'अहंकार को कुचलकर 'ख़िदमत-ए-ख़ल्क़' को अपना सम्मान समझें, और किसी प्रकार के विवाद को पैदा होने से रोकें, स्वयं कष्ट और मुश्किलें सह लें, लेकिन किसी ज़ाइर-ए-इमाम हुसैन (अ) पर अंगुली न उठाएँ , किसी को व्यावहारिक या मौखिक रूप से तकलीफ न पहुँचाएँ।

'अरबईन-ए-हुसैनी' के इस महान सार्वभौमिक और आध्यात्मिक समागम में स्वयं ही किसी प्रकार के विवाद और नैतिक दोष का न पाया जाना, इसे अन्य सांसारिक समागमों से पवित्र, उच्च और अलग करता है। यह समागम वास्तव में स्वयं में एक महान आध्यात्मिक और नैतिक 'दर्सगाह' है।

लेकिन यदि अत्यंत दुर्लभ रूप से इस 'अरबईन-ए-हुसैनी' सफ़र में व्यक्तिगत स्तर पर कहीं कोई नैतिक या शैक्षणिक कमी नज़र आती है, तो यह दुखद इस कारण है कि हमने स्वयं इस आध्यात्मिक सफ़र की महानता और उद्देश्य को पूरी तरह समझने में कमी की है। अन्यथा 'अरबईन-ए-हुसैनी' स्वयं में एक इंसान-साज़, महान, मलकूती और नैतिक आदर्श-समागम है।

इसलिए 'अरबईन-ए-हुसैनी' में शामिल होने वाले प्रत्येक ज़ाइर का कर्तव्य है कि वह इस महान, दिव्य और सार्वभौमिक समागम में केवल 'रस्मी' रूप से शामिल न हो, बल्कि पहले इसके सार्वभौमिक और शाश्वत लक्ष्य को समझे,

और इस सफ़र में शामिल होकर स्वयं को सदा के लिए आंतरिक और नैतिक रूप से जागृत करने का दृढ़ संकल्प करे, ताकि हज़रत इमाम हुसैन (अ) उच्च-स्थान का कृपा-पात्र उसके शामिल-हाल हो सके, और उसे दुनिया और आख़िरत की सदाबहार सफलता प्राप्त हो जाए।

'अरबईन-ए-हुसैनी' का समागम क्योंकि अपने आँचल में मानवता-पोषक सार्वभौमिक संदेश समेटे हुए है, इसलिए यह समागम दुनिया के मज़लूमों, विशेष रूप से मज़लूम-ए-फ़लस्तीन के लिए मानवीय विरोध और आध्यात्मिक सहायता के समान है।

और अंततः लिखने वाला प्रस्तुत करता है कि 'अरबईन-ए-हुसैनी' के सार्वभौमिक समागम को 'बसीरत-आमेज़' नज़र से देखने वाला और इसके वास्तविक लक्ष्य को समझने वाला, अपने भीतर मानवीय भावना को बढ़ाता है और आध्यात्मिकता के दीपक को प्रज्वलित करता है।

इसके अतिरिक्त, वह अपनी स्वयं की आंतरिक कमियों को समाप्त करके नैतिक मूल्यों को बढ़ावा देता है, और सभी 'मुस्तज़'अफ़ीन', मज़लूमों और मोमिनीन की सेवा और सहायता को अपना मानवीय कर्तव्य समझता है।

ईश्वर ख़ादिमीन और ज़ाइरीन-ए-हुसैनी की तौफ़ीक़ में वृद्धि करे और सभी मोमिनीन को 'सफ़र-ए-अरबईन-ए-हुसैनी' और 'ज़ियारत-ए-हरमैन-ए-शरीफ़ैन'  की तौफ़ीक़ प्रदान करे।

आमीन, वल-हम्दु-लिल्लाहे रब्बिल-आलमीन।"

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