शुक्रवार 11 सितंबर 2026 - 22:15
अल्लाह के शेरों को लोमड़ी जैसी चालाकी नहीं आती

इतिहास इस बात का गवाह है कि मानव जीवन की शुरुआत से ही सत्य और असत्य, प्रकाश और अंधकार तथा उजाले और अंधेरे के बीच संघर्ष होता आया है। हत्यारे और मारे गए, अत्याचारी और पीड़ित की नस्ली और वैचारिक लकीरें इतिहास की हथेली पर हमेशा साथ-साथ चलती रही हैं और समय-समय पर एक-दूसरे को काटती रही हैं।

लेखक: मौलाना सैयद मुबीन हैदर रिजवी

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार, इतिहास इस बात का गवाह है कि मानव जीवन की शुरुआत से ही सत्य और असत्य, प्रकाश और अंधकार तथा उजाले और अंधेरे के बीच संघर्ष होता आया है। हत्यारे और मारे गए, अत्याचारी और पीड़ित की नस्ली और वैचारिक लकीरें इतिहास की हथेली पर हमेशा साथ-साथ चलती रही हैं और समय-समय पर एक-दूसरे को काटती रही हैं।

हाबील और क़ाबील से यह कहानी शुरू हुई, जो अलग-अलग दौर में अपना रूप बदलती रही। यह कहानी कभी कुछ पलों तो कभी सदियों के लंबे उतार-चढ़ाव में आगे बढ़ती रही है।

अंधेरे के निवासी और अंधकार में पले-बढ़े बहुरूपिए हर दौर में अलग-अलग रूप धारण करके आते रहे। सामरी की संतान ने तरह-तरह के छोटे-छोटे सांपों को अपने बनाए हुए थैले से निकालकर सत्य के विरुद्ध मैदान में उतारा, लेकिन हर दौर के मूसा के हाथ में मौजूद ईश्वरीय छड़ी ने उन्हें अजगर बनकर निगल लिया। इस तरह उनकी सारी योजनाएं विफल हो गईं और उनकी चालें पानी पर खींची गई लकीर की तरह मिट गईं तथा उनकी असलियत सबके सामने आ गई।

जब-जब नमरूद जैसे अत्याचारियों के आसमान छूते जुल्म की आग की लपटों ने अपना मुंह खोला और अपना सिर ऊंचा किया, तब-तब इब्राहीमी हिमालय जैसे मजबूत कदमों ने उन्हें कुचलकर राख कर दिया और फिर उसी पर बैठकर शुक्र का सजदा किया।

यह सिलसिला रुका नहीं, बल्कि लहरों की तरह करवट लेती सदियों के साथ चलता रहा। एक बार फिर अल्लाह ने मानवता पर अपनी कृपा और उपकार करते हुए अंतिम पैगंबर हजरत मुहम्मद (स) को भेजा। जैसे ही उन्होंने अपनी पैगंबरी का ऐलान किया, सभी दुश्मन उनके खिलाफ इकट्ठा हो गए और अलग-अलग तरीकों से हमले करने लगे। लेकिन पैगंबर-ए-अकरम (स) ने इन सभी तूफानों को अपने अस्तित्व के चारों ओर चक्कर लगाने पर मजबूर कर दिया।

बद्र से तबूक तक अलग-अलग मैदानों में तरह-तरह के हथियार और युद्ध की रणनीतियां अपनाई गईं, लेकिन इन सभी युद्ध की भड़कती लपटों पर मक्का के सरदार अबू तालिब के बेटे हजरत अली मुर्तजा (अ) ने अपनी तलवार से पानी फेर दिया। उन्होंने असत्य के समर्थकों को पराजित किया और कुफ्र के सींग को तोड़ दिया।

लेकिन कुछ दशकों बाद एक तपते हुए रेगिस्तान में बद्र और उहुद की दुश्मनी ने एकजुट होकर सेना का रूप धारण किया और अपनी नापाक फूंक से ईश्वरीय प्रकाश को बुझाने की असफल कोशिश की। मगर भाले की नोक से हुसैनी विजय का ऐलान हुआ।

बद्र से कर्बला तक इस्लाम के खिलाफ हर साजिश, भीड़ और हमले में यहूदी तत्व कभी सीधे और कभी भय तथा स्वार्थ की नकाब पहनकर आगे रहे हैं और यह सिलसिला आज तक जारी है।

आज दुनिया की स्थिति किसी से छिपी नहीं है। यहूदी ताकतें विरासत-ए-अलवी और विरासत-ए-हुसैनी पर घात लगाए बैठी हैं। मौका मिलते ही वे हमला करती हैं और अपने विचार में हुसैनी क्रांति की इस रोशनी को अपनी बदबूदार फूंक से बुझाने की निरर्थक कोशिश कर रही हैं।

उनका नारा है: हम सरकार बदल देंगे। हम नेता नियुक्त करेंगे।

लेकिन उन्हें मालूम होना चाहिए कि कुत्ते कभी शेरों की किस्मत नहीं लिख सकते।

यह अल्लाह की परंपरा है कि जब एक दीपक बुझता है तो उससे बेहतर या उसके समान दूसरा दीपक उसी तरह रोशन हो जाता है, ताकि अंधेरे का शासन स्थापित न हो सके।

जिस दीपक की रक्षा हवा स्वयं मशाल बनकर करती हो,
वह दीपक कैसे बुझे, जिसे अल्लाह स्वयं रोशन करे।

हजरत अली (अ) के तुरंत बाद हजरत इमाम हसन मुजतबा (अ) का आना भी ईश्वरीय योजना और दुश्मन की असफलता का प्रमाण है। हुसैनी दीपक की लौ न कभी धीमी हुई है और न कभी होगी।

आज एक बार फिर यहूदी ताकतें और उनके बौने कद के तथाकथित मुस्लिम शासक, जो उनके समर्थक हैं, हथियारों की दीमक लगी बैसाखियों के सहारे अपने कांपते कदमों पर खड़े होकर फातेह-ए-खैबर हजरत अली (अ) के चाहने वाले जांबाजों पर हमले कर रहे हैं। लेकिन उनकी हर एक कंकरी का जवाब कोह-ए-तूर की तरह मजबूत रूप में और हर चिंगारी का जवाब जहन्नम की भड़कती और दहाड़ती लपटों के रूप में दिया जा रहा है।

हमने दिन में तारे दिखाने की बात तो सुनी थी, लेकिन लश्कर-ए-हैदर-ए-कर्रार और सूरज को वापस लाने वाले हजरत अली (अ) के जांबाज चाहने वालों ने रातों में सूरज उगा दिए हैं।

कुछ उत्तेजित स्वभाव वाले, कायर सोच रखने वाले, मानसिक रूप से परेशान और भ्रम के शिकार लोग कह रहे हैं कि इस्लामी क्रांति का समर्थन मत करो। घरों में शहीदों का मातम कर लो, लेकिन सड़कों और सार्वजनिक स्थानों पर शोक मत मनाओ। ये वही उमय्या की संतान हैं, जो कर्बला की याद और उसके संदेश को आम नहीं होने देना चाहते।

याद रखिए!

चमगादड़ों के विरोध करने से सूरज नहीं डूबता।

ऐ अल्लाह! सत्य के मोर्चे और उसके रक्षकों की रक्षा फरमा!

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