हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार, नई दिल्ली, जामा मस्जिद कश्मीरी गेट, दिल्ली में ख़ुत्बा-ए-जुमा के दौरान मौलाना मोहसिन तक़वी ने अमीरुल मोमेनीन (अ) की हदीसो के माध्यम से गुस्से के नुक़सात और उसके इलाज पर प्रकाश डाला।
उन्होने अमीरुल मोमेनीन हज़रत अली (अ) ने इंसान के सबसे बड़े दुश्मनों के बारे में चेतावनी देते हुए ग़ुस्से और इच्छाओं को उसके लिए सबसे बड़ा दुश्मन बताया है। आपने फ़रमाया कि जो व्यक्ति इन दोनों पर नियंत्रण प्राप्त कर लेता है, उसके दर्जे बुलंद हो जाते हैं और वह अपनी मंज़िल तक पहुंच जाता है।
जामेअतुश शहीद के प्रधानाध्यापक ने कहा कि इंसान का सबसे कठिन दुश्मन वह नहीं है जो बाहर से उसके सामने दिखाई देता है, बल्कि वह दुश्मन है जो उसके भीतर मौजूद होता है। बाहरी दुश्मन से मुकाबला करना अपेक्षाकृत आसान है, क्योंकि इंसान उसे पहचान सकता है, लेकिन ग़ुस्सा और अनियंत्रित इच्छाएं इंसान के भीतर से उसे नुकसान पहुंचाती हैं।
मोहसिन तकवी ने कहा कि ग़ुस्सा और इच्छाएं ऐसी चीजें हैं जिन पर इंसान नियंत्रण रख सकता है। इसके लिए आवश्यक है कि वह अपने नफ़्स पर काबू रखे और अपनी इच्छाओं को बुद्धि तथा धार्मिक शिक्षाओं के अधीन रखे। जब इंसान अपने नफ़्स को नियंत्रित करने में सफल होता है, तभी वह आध्यात्मिक ऊंचाई और वास्तविक कामयाबी हासिल कर सकता है।
दिल्ली शिया जामा मस्जिद के इमाम जुमा ने कहा कि आज बहुत से लोग ग़ुस्से को अपनी ताकत और बहादुरी समझते हैं। किसी को धमकाना, धौंस जमाना या ग़ुस्से में कठोर भाषा का इस्तेमाल करना उनके लिए गर्व का कारण बन जाता है, जबकि यह किसी भी तरह प्रशंसा के योग्य नहीं है। इसी प्रकार गाली-गलौज को अपना हुनर समझना भी इंसान की कमजोरी है, न कि उसकी ताकत।
उन्होंने कहा कि ग़ुस्से की अवस्था में इंसान अक्सर दूसरों को नुकसान पहुंचाने की कोशिश करता है, लेकिन वास्तव में वह दूसरों से अधिक स्वयं को नुकसान पहुंचाता है। ग़ुस्से की पहली मार इंसान की बुद्धि पर पड़ती है। वह संतुलित ढंग से सोचने और उचित बातचीत करने की क्षमता खो देता है, जिसके परिणामस्वरूप उसकी कमियां और गलतियां सामने आने लगती हैं।
हुज्जतुल इस्लाम मोहसिन तकवी ने अमीरुल मोमेनीन (अ) से मंसूब एक कथन का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि ग़ुस्सा बुद्धि को भ्रष्ट कर देता है और इंसान को सही मार्ग से दूर कर देता है। ग़ुस्से की अवस्था में व्यक्ति गंभीरता से सोचने और परिस्थितियों का सही मूल्यांकन करने की क्षमता से वंचित हो जाता है।
उन्होंने एक अन्य हदीस का हवाला देते हुए कहा कि अत्यधिक कठोरता और तीव्र ग़ुस्से में व्यवहार करना पागलपन की एक अवस्था के समान है। यही कारण है कि इंसान ग़ुस्से के बाद अक्सर पछताता है और उसे अपनी गलती के लिए माफी मांगनी पड़ती है।
शिया जामा मस्जिद के इमाम जुमा ने कहा कि गलती के बाद पछतावा और माफी मांगना इस बात का संकेत है कि इंसान को अपनी गलती का एहसास है, लेकिन बेहतर यह है कि व्यक्ति ऐसी स्थिति पैदा ही न होने दे जिसमें उसे बाद में शर्मिंदगी उठानी पड़े।
हुज्जतुल इस्लाम मोहसिन तकवी ने अमीरुल मोमेनीन (अ) के एक अन्य कथन की ओर संकेत करते हुए कहा कि कुछ लोग ग़ुस्से को अपनी इज्जत और प्रतिष्ठा का साधन समझते हैं। उन्हें लगता है कि यदि वे ग़ुस्सा नहीं करेंगे तो लोग उन्हें कमजोर समझेंगे। वास्तव में यह एक गलत धारणा है। वास्तविक सम्मान अपने ग़ुस्से पर नियंत्रण रखने में है, न कि दूसरों को अपमानित करने में।
उन्होंने कहा कि इंसान ग़ुस्से की अवस्था में सबसे पहले अपनी बुद्धि को नुकसान पहुंचाता है। इसके बाद उसके व्यवहार में कई अन्य नकारात्मक प्रभाव दिखाई देने लगते हैं। गलती का एहसास होने पर पछतावा, मानसिक दबाव, बेचैनी और तनाव जैसी समस्याएं भी पैदा हो सकती हैं। इन परिस्थितियों से बचने का सबसे अच्छा तरीका अपने नफ़्स और ग़ुस्से पर नियंत्रण रखना है।
जामेअतुश शहीद के प्रधानाध्यापक ने कहा कि जब इंसान अपनी बुद्धि का सही इस्तेमाल करता है तो वह परिस्थितियों को गहराई से समझकर कदम उठाता है। अमीरुल मोमेनीन (अ) की शिक्षाओं के अनुसार, ग़ुस्से के समय अपनी ज़बान को रोक लेना इंसान की समझदारी और शक्ति की निशानी है।
उन्होने कहा कि ग़ुस्सा इंसान की छिपी हुई बुराइयों को भी उजागर कर देता है। सामान्य परिस्थितियों में इंसान अपनी कई कमियों को छिपा सकता है, लेकिन ग़ुस्से की अवस्था में उसकी वास्तविक मानसिकता और व्यक्तित्व सामने आ जाता है। कई ऐसी बातें जो इंसान सामान्य परिस्थितियों में छिपाकर रखता है, ग़ुस्से में उसकी ज़बान से निकल जाती हैं।
हुज्जतुल इस्लाम मोहसिन तक़वी ने कहा कि ग़ुस्सा इंसान को अच्छाई से दूर और बुराई के करीब कर देता है। इसी कारण किसी व्यक्ति के चरित्र को समझने के लिए उसके ग़ुस्से की अवस्था को देखना भी महत्वपूर्ण है।
हज़रत ईसा (अ) से जब ग़ुस्से के स्रोत के बारे में पूछा गया तो उन्होंने तकब्बुर और अहंकार को इसकी जड़ बताया। जब इंसान दूसरों को अपने से कम समझने लगता है और उन्हें तुच्छ समझता है, तो उसके भीतर ग़ुस्से की भावना मजबूत होने लगती है। इसलिए ग़ुस्से का इलाज केवल बाहरी व्यवहार को नियंत्रित करना नहीं, बल्कि अपने भीतर के अहंकार और आत्म-महत्व की भावना को समाप्त करना भी है।
दिल्ली शिया जामा मस्जिद के इमाम जुमा ने कहा कि अब महत्वपूर्ण सवाल यह है कि जब इंसान को ग़ुस्सा आए तो उसे क्या करना चाहिए? उन्होंने कहा कि ऐसा कोई इंसान नहीं जिसे कभी ग़ुस्सा न आता हो। ग़ुस्सा इंसानी स्वभाव का हिस्सा है, लेकिन महत्वपूर्ण बात यह है कि इंसान ग़ुस्से को अपने ऊपर हावी होने देता है या उसे नियंत्रित करता है।
उन्होंने सातवें इमाम हज़रत मूसा काज़िम (अ) के लक़ब “काज़िम” का उल्लेख करते हुए कहा कि काज़िम का अर्थ है अपने ग़ुस्से को पी जाने वाला। इसका अर्थ यह नहीं कि इमाम को ग़ुस्सा नहीं आता था, बल्कि यह कि ग़ुस्सा आने के बावजूद आप उसे नियंत्रित कर लेते थे।
जामेअतुश शहीद के प्रधानाध्यापक ने कहा कि इंसान को भी चाहिए कि ग़ुस्से के समय तुरंत प्रतिक्रिया देने के बजाय स्वयं को नियंत्रित करे, अपनी ज़बान को रोक ले और परिस्थिति को शांत होने का अवसर दे। वास्तविक शक्ति दूसरों पर ग़ुस्सा निकालने में नहीं, बल्कि अपने नफ़्स को नियंत्रित करने में है।
उन्होंने अंत में कहा कि अमीरुल मोमेनीन (अ) की इस शिक्षा पर अमल करते हुए इंसान अपने ग़ुस्से और इच्छाओं को नियंत्रित कर सकता है और इस प्रकार अपने आध्यात्मिक जीवन में बुलंद दर्जा हासिल कर सकता है।
आपकी टिप्पणी