शनिवार 31 अक्टूबर 2026 - 05:23
पैग़ाम-ए-फ़ातमिया से इमाम की पहचान तक/ महदवियत और विलायत के बीच गहरा संबंध है। हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन अहमदी क़ुम्मी

हौज़ा / हौज़ा ए इल्मिया के शिक्षक हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन अहमदी क़ुम्मी ने अपनी बातचीत में हज़रत फ़ातिमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा को आदर्श बताते हुए अय्याम-ए-फ़ातमिया और महदवियत के बीच संबंध को स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि इस महान महिला ने अपनी जान क़ुर्बान करके इमाम की सहायता और समर्थन के रास्ते में बेहतरीन आदर्श प्रस्तुत किया।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार ,हौज़ा ए इल्मिया के शिक्षक हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन अहमदी क़ुम्मी ने अपनी बातचीत में हज़रत फ़ातिमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा को आदर्श बताते हुए अय्याम-ए-फ़ातमिया और महदवियत के बीच संबंध को स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि इस महान महिला ने अपनी जान क़ुर्बान करके इमाम की सहायता और समर्थन के रास्ते में बेहतरीन आदर्श प्रस्तुत किया।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के प्रतिनिधि से बातचीत करते हुए हौज़ा ए इल्मिया के शिक्षक हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन अहमदी क़ुम्मी ने कहा कि बनी इसराईल ने हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम को अकेला छोड़ दिया था और उनसे कहा था कि आप और आपका परवरदिगार जाकर युद्ध कीजिए, हम यहीं बैठे रहेंगे। इस पर हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने अल्लाह की बारगाह में अर्ज़ किया कि ऐ मेरे परवरदिगार! मुझे अपने और अपने भाई के अलावा किसी पर कोई अधिकार नहीं है। इसलिए हमारे और इस अवज्ञाकारी क़ौम के बीच अलगाव पैदा कर दे।

अल्लाह तआला ने फ़रमाया कि उन पर चालीस वर्षों तक उस भूमि में प्रवेश करना हराम कर दिया गया है और वे तिह के मैदान में भटकते रहेंगे। इसलिए इस अवज्ञाकारी क़ौम पर दुख मत करो।

उन्होंने आगे कहा कि इतिहास की यही घटना इस्लाम के शुरुआती दौर में इमाम अली अलैहिस्सलाम के साथ भी पेश आई। बेवफ़ा लोगों ने इमाम अली अलैहिस्सलाम को अकेला छोड़ दिया और आपके साथ केवल हज़रत फ़ातिमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा रह गईं। उस समय भी ज़ालिमों ने कहा कि हक़ आपके साथ है, आप जाइए और युद्ध कीजिए। यदि आप सफल हो गए तो हम भी आपका साथ देंगे।

हौज़ा ए इल्मिया के इस शिक्षक ने कहा कि हज़रत अली अलैहिस्सलाम, हज़रत फ़ातिमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा को साथ लेकर लोगों के घर-घर जाते थे और उनसे समर्थन की अपील करते थे। आपने अल्लाह की बारगाह में अर्ज़ किया कि ऐ परवरदिगार! मेरे पास अपने और फ़ातिमा के अलावा कोई नहीं है।

हज़रत फ़ातिमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा ने अल्लाह को गवाह बनाकर कहा कि वह इस क़ौम से नाराज़ हैं। इमाम अली अलैहिस्सलाम ने अर्ज़ किया कि ऐ परवरदिगार! मुझे इन लोगों से निजात दे। अंततः हज़रत फ़ातिमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा ने दुआ की कि ऐ परवरदिगार! मेरी मृत्यु जल्द हो जाए।

उन्होंने कहा कि जिस तरह बनी इसराईल पर सुकून और एकता से वंचित रहने का समय आ गया था और वे धरती पर भटकने लगे थे, उसी तरह उम्मत के लिए भी भटकाव और ग़ैबत का दौर शुरू हुआ, जिसमें इंसानियत आज भी हैरान और परेशान है।

उन्होंने याद दिलाया कि इंसानियत की इस हैरानी और भटकाव से मुक्ति का एकमात्र रास्ता पैग़ाम-ए-फ़ातमिया पर लब्बैक कहना और अल्लाह की हुज्जत के ख़ेमे की ओर लौटना है। इमाम की पहचान का रास्ता हज़रत फ़ातिमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा के माध्यम से पहचाना जाता है। हम सभी को अपने इमाम की पहचान हासिल करने के लिए हज़रत ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा से तवस्सुल करना चाहिए।

उन्होंने कहा कि इतिहास गवाह है कि यद्यपि सभी लोग अमीरुल मोमिनीन इमाम अली अलैहिस्सलाम से ग़ाफ़िल नहीं हुए थे, लेकिन हज़रत फ़ातिमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा ने सच्चाई और विलायत के हक़ होने को पहचानने के लिए जो व्यावहारिक आदर्श प्रस्तुत किया, उसके माध्यम से लोगों ने हक़ और बातिल के बीच अंतर को अपनी आंखों से साकार रूप में देखा।

हौज़ा ए इल्मिया के शिक्षक ने कहा कि आज भी सभी लोगों ने अपने इमाम को नहीं भुलाया है। अय्याम-ए-फ़ातमिया के अवसर पर रात की तन्हाई में सज्दों के दौरान और दिन की भागदौड़ के बीच भी ऐसे लोग मौजूद हैं, जो अपने इमाम से दूर नहीं हैं। जबकि इमाम से ग़ाफ़िल मुसलमान हैरानी, गुमराही, अनजानियों और ग़फ़लत के रेगिस्तान में भटक रहे हैं।

उन्होंने कहा कि इमाम की पहचान और विलायत का पालन करने का रास्ता हज़रत फ़ातिमा ज़हेरा सलामुल्लाह अलैहा की मारिफत से होकर गुजरता है। इस संबंध में उन रिवायतों की अहमियत भी स्पष्ट है, जिनकी सनद मज़बूत है और जो सृष्टि की व्यवस्था में हज़रत फ़ातिमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा के स्थान, महानता और अल्लाह की बारगाह में उनके उच्च मकाम को बयान करती हैं।

उन्होंने अंत में कहा कि हज़रत फ़ातिमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा ने हमें दिखाया कि हर दौर में जो लोग किसी न किसी बहाने अपने इमाम की सहायता और समर्थन करने में संदेह और असमंजस का शिकार होते हैं, वे इमाम के ज़हूर के दौर में भी उनकी मदद से हाथ खींच सकते हैं। ऐसे लोग अपनी नफ़्सानी इच्छाओं, धन-दौलत और दुनिया के अस्थायी पदों एवं प्रतिष्ठा के लालच में अपने इमाम को अकेला छोड़ देते हैं।

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