मंगलवार 11 अगस्त 2026 - 10:40
इमाम ख़ुमैनीः इस्लाम का अस्तित्व फ़िक़्ह और धार्मिक शिक्षण केंद्रों का ऋणी है

इमाम ख़ुमैनी ने धार्मिक शिक्षण केंद्रों को इस्लाम की रक्षा का मज़बूत क़िला बताते हुए ज़ोर दिया कि यदि फ़िक़्ह, धार्मिक ज्ञान और धर्मगुरुओं के प्रशिक्षण की व्यवस्था कमज़ोर पड़ गई, तो आने वाली पीढ़ियां इस्लाम की शिक्षाओं से वंचित हो सकती हैं।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, इमाम ख़ुमैनीؒ ने धार्मिक शिक्षण केंद्रों को इस्लाम की रक्षा का मज़बूत क़िला बताते हुए ज़ोर दिया कि यदि फ़िक़्ह, धार्मिक ज्ञान और धर्मगुरुओं के प्रशिक्षण की व्यवस्था कमज़ोर पड़ गई, तो आने वाली पीढ़ियां इस्लाम की शिक्षाओं से वंचित हो सकती हैं।

इमाम ख़ुमैनीؒ ने अपने महत्वपूर्ण संबोधन में धार्मिक शिक्षण केंद्रों की मजबूती और फ़िक़्ह की पारंपरिक पद्धति की रक्षा पर ज़ोर देते हुए कहा कि इस्लाम आज जिस रूप में हम तक पहुंचा है, उसमें इस्लामी फ़क़ीहों की सदियों की मेहनत की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

उन्होंने चेतावनी दी कि यदि क़ुम, मशहद, तबरेज़ और अन्य शहरों के धार्मिक केंद्रों को मज़बूत नहीं किया गया और ऐसे विद्वानों तथा फ़क़ीहों को तैयार नहीं किया गया जो इस्लामी ज्ञान को आगे पहुंचाएं, तो एक समय ऐसा आ सकता है कि इस्लाम का नाम भी बाकी न रहे।

इमाम ख़ुमैनीؒ ने कहा कि यदि इस्लाम के आरंभिक दौर से लेकर आज तक इस्लामी फ़क़ीह मौजूद न होते, तो आज हमें इस्लाम के बारे में कुछ भी मालूम न होता। फ़क़ीहों ने इस्लाम को समझा, फ़िक़्ह की शिक्षा दी, किताबें लिखीं और अपनी मेहनत से इस विद्वतापूर्ण विरासत को अगली पीढ़ियों तक पहुंचाया। इसलिए धार्मिक शिक्षण केंद्रों को मज़बूत करना एक धार्मिक और शरीअत के अनुसार ज़िम्मेदारी है।

उन्होंने कहा कि धार्मिक शिक्षण केंद्रों में ऐसे लोगों का होना आवश्यक है जो सामाजिक और राजनीतिक मामलों में भी अपनी भूमिका निभाएं, लेकिन इसके साथ फ़िक़्ह और धार्मिक ज्ञान से लापरवाही नहीं होनी चाहिए। यदि फ़िक़्ही विद्वता की उपेक्षा कर दी गई, तो इस्लाम की शिक्षाएं भी धीरे-धीरे लोगों के मन से मिट सकती हैं।

इमाम ख़ुमैनीؒ ने आगे ज़ोर देते हुए कहा कि धार्मिक शिक्षण केंद्रों को हर दिन पहले से अधिक मज़बूत होना चाहिए। फ़िक़्ह, धार्मिक पुस्तकों, विद्वतापूर्ण चर्चा और शोध तथा इस्लामी ज्ञान के उन क्षेत्रों को जीवित रखने की आवश्यकता है, जो समय बीतने के साथ पीछे छूट गए हैं।

उन्होंने फ़िक़्ह और धार्मिक ज्ञान को इस्लाम का मज़बूत क़िला बताते हुए कहा कि हमारी ज़िम्मेदारी है कि इस्लाम को उसी तरह अगली पीढ़ी तक पहुंचाएं, जिस तरह वह हम तक पहुंचा है, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी इसे अपनी अगली पीढ़ियों तक पहुंचाती रहें और अंततः इसे इसके वास्तविक वारिस इमाम महदीؑ को सौंप दें।

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