बुधवार 12 अगस्त 2026 - 09:28
रसूले आज़म सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि वसल्लम

रसूले आज़म हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि वसल्लम की शहादत मानव इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदियों में से एक है। वह महान हस्ती दुनिया से विदा हुईं, जिनके माध्यम से इंसानियत ने तौहीद, न्याय, नैतिकता, रहमत और हिदायत का रास्ता पाया। आपने अपनी पूरी मुबारक ज़िंदगी इंसानों को अज्ञानता के अंधेरों से निकालकर ईमान, ज्ञान और इंसानियत की रोशनी प्रदान करने में लगा दी।

लेखक: मौलाना सय्यद अली हाशिम आबिदी

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी  रसूले आज़म हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा (स) की शहादत मानव इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदियों में से एक है। वह महान हस्ती दुनिया से विदा हुईं, जिनके माध्यम से इंसानियत ने तौहीद, न्याय, नैतिकता, रहमत और हिदायत का रास्ता पाया। आपने अपनी पूरी मुबारक ज़िंदगी इंसानों को अज्ञानता के अंधेरों से निकालकर ईमान, ज्ञान और इंसानियत की रोशनी प्रदान करने में लगा दी।

आपका यौमे शहादत, 28 सफ़र, इसी महान मुसीबत की याद दिलाता है। यह वह दिन है जब ख़ातमुन नबीयीन हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि वसल्लम ने सांसारिक जीवन का सफ़र पूरा करके अपने पालनहार की बारगाह में प्रस्थान किया।

बीमारी के बावजूद मस्जिद में तशरीफ़ लाना

रसूले अकरम (स) की मुबारक ज़िंदगी के अंतिम दिनों में बीमारी की तीव्रता बढ़ चुकी थी, लेकिन इस गंभीर बीमारी के बावजूद आप उम्मत की हिदायत, नमाज़ की पाबंदी, लोगों के अधिकार और अन्य महत्वपूर्ण मामलों के बारे में लगातार ताकीद फ़रमाते रहे।

बीमारी की गंभीरता के बावजूद कभी-कभी आप मस्जिदे नबवी में तशरीफ़ ले जाते, लोगों के साथ नमाज़ अदा फ़रमाते और उन्हें महत्वपूर्ण मामलों की याद दिलाते थे।

एक दिन बीमारी की हालत में, जबकि आपने अपने मुबारक सिर पर कपड़ा बांध रखा था और अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली अलैहिस्सलाम और फ़ज़्ल बिन अब्बास आपके दोनों बाज़ुओं को थामे हुए थे, आप मस्जिद में तशरीफ़ लाए और मिम्बर पर विराजमान हुए।

आपने लोगों को संबोधित करते हुए फ़रमाया: "ऐ लोगो! अब वह समय क़रीब आ गया है कि मैं तुम्हारे बीच से विदा हो जाऊं। अगर मैंने किसी से कोई वादा किया है तो मैं उसे पूरा करने के लिए तैयार हूं, और जिस व्यक्ति का मुझ पर कोई अधिकार या कर्ज़ हो, वह उसे बताए ताकि मैं उसे अदा कर दूं।"

इसी अवसर पर एक व्यक्ति खड़ा हुआ और उसने कहा: "या रसूलल्लाह! कुछ समय पहले आपने मुझसे वादा किया था कि अगर मैं शादी करूंगा तो आप मुझे कुछ धन देंगे।"

रसूले अकरम (स) ने तुरंत फ़ज़्ल बिन अब्बास को आदेश दिया कि उस व्यक्ति को वादे के अनुसार धन अदा कर दें।

यह घटना इस बात का स्पष्ट उदाहरण है कि रसूले अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि वसल्लम अपनी मुबारक ज़िंदगी के अंतिम दिनों में भी लोगों के अधिकारों की अदायगी को अत्यंत महत्व दे रहे थे।

क़ेसास का वाक़िया; शहादत से पहले अधिकारों की अदायगी

रसूले अकरम (स) की शहादत से कुछ दिन पहले एक बार फिर आप मस्जिदे नबवी में तशरीफ़ लाए और लोगों को संबोधित करते हुए फ़रमाया: "जिस व्यक्ति का मुझ पर कोई अधिकार है, वह खड़ा होकर अपना अधिकार बताए; क्योंकि दुनिया में क़िसास लेना आख़िरत के क़िसास से अधिक आसान है।"

इस अवसर पर सवादह बिन क़ैस नामक व्यक्ति खड़ा हुआ और उसने कहा: "या रसूलल्लाह! ताइफ़ की जंग से वापसी के समय आप एक ऊंट पर सवार थे। आपने ऊंट को हांकने के लिए अपना चाबुक उठाया, लेकिन संयोग से वह चाबुक मेरे पेट पर लग गया। अब मैं उसका क़िसास लेना चाहता हूं।"

रसूले अकरम (स) ने आदेश दिया कि वही चाबुक लाकर पेश किया जाए। फिर आपने अपना मुबारक वस्त्र ऊपर उठा दिया ताकि सवादह क़िसास ले सके।

उस समय रसूले ख़ुदा (स) के सहाबा ग़म से निढाल और आंखों में आंसू लिए हुए इस दृश्य को देख रहे थे। सभी के दिलों में यह सवाल था कि क्या सवादह वास्तव में रसूले अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि वसल्लम से क़िसास लेगा?

अचानक सवादह आगे बढ़ा और रसूले ख़ुदा (स) के सीने का बोसा ले लिया।

इस अवसर पर रसूले अकरम (स) ने सवादह के लिए दुआ फ़रमाई: "ऐ अल्लाह! सवादह को माफ़ फ़रमा, जिस तरह उसने तेरे रसूल को माफ़ कर दिया है।" (मनाक़िबे आले अबी तालिब, जिल्द 1, पृष्ठ 164)

यह घटना रसूले अकरम (स) के उच्च नैतिक चरित्र, अधिकारों की अदायगी और उम्मत के सामने जवाबदेही की भावना का एक दिल को छू लेने वाला उदाहरण है।

रसूले अकरम (स) की बीमारी की गंभीरता

जैसे-जैसे बीमारी की तीव्रता बढ़ती गई, रसूले अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि वसल्लम की हालत अत्यंत नाज़ुक होती चली गई।

आपके अहलेबैत अलैहिमुस्सलाम आपके बिस्तरे बीमारी के पास मौजूद रहते थे। हज़रत फ़ातिमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा अपने पिता के मुबारक बिस्तर के पास बैठी रहती थीं और आपके नूरानी चेहरे को देखकर ग़मगीन होती थीं।

हज़रत फ़ातिमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा के दिल पर अपने पिता की बीमारी का गहरा प्रभाव था। आप हज़रत अबू तालिब अलैहिस्सलाम का वह प्रसिद्ध शेर पढ़ रही थीं, जो उन्होंने रसूले अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि वसल्लम की शान में कहा था:

"वह रौशन चेहरा हैं, जिनके वसीले से बादलों से बारिश मांगी जाती है; वह अनाथों का सहारा और विधवाओं के संरक्षक हैं।"

रसूले अकरम (स) ने अपनी बेटी को क़ुरआने करीम की इस आयत की ओर ध्यान दिलाया:

"وَمَا مُحَمَّدٌ إِلَّا رَسُولٌ قَدْ خَلَتْ مِنْ قَبْلِهِ الرُّسُلُ أَفَإِنْ مَاتَ أَوْ قُتِلَ انْقَلَبْتُمْ عَلَىٰ أَعْقَابِكُمْ وَمَنْ يَنْقَلِبْ عَلَىٰ عَقِبَيْهِ فَلَنْ يَضُرَّ اللّٰهَ شَيْئًا وَسَيَجْزِي اللّٰهُ الشَّاكِرِينَ۔"

("मुहम्मद अल्लाह के रसूल हैं। उनसे पहले भी बहुत से रसूल गुज़र चुके हैं। तो क्या अगर वह वफ़ात पा जाएं या क़त्ल कर दिए जाएं, तो तुम अपने पिछले तरीक़े की ओर लौट जाओगे? और जो व्यक्ति अपनी एड़ियों के बल पीछे लौट जाए, वह अल्लाह को हरगिज़ कोई नुक़सान नहीं पहुंचा सकता, और अल्लाह शुक्र करने वालों को जल्द ही बदला प्रदान करेगा।")

हज़रत फ़ातिमा ज़हरा (स) से आख़िरी सरगोशी

रसूले अकरम (स) के आख़िरी दिनों में हज़रत फ़ातिमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा लगातार आपके मुबारक बिस्तर के पास रहती थीं।

एक दिन रसूले अकरम (स) ने अपनी प्यारी बेटी को अपने पास आने का इशारा किया। हज़रत फ़ातिमा सलामुल्लाह अलैहा करीब हुईं तो रसूले ख़ुदा (स) ने उनसे धीमी आवाज़ में कुछ फ़रमाया। यह सुनकर हज़रत फ़ातिमा सलामुल्लाह अलैहा रोने लगीं।

फिर रसूले अकरम (स) ने उन्हें दोबारा अपने पास बुलाया और कुछ फ़रमाया। इस बार हज़रत फ़ातिमा (स) के मुबारक चेहरे पर मुस्कान आ गई।

वहां मौजूद लोगों ने इस बदलाव को महसूस किया और हज़रत फ़ातिमा (स) इसका कारण पूछा, लेकिन आपने फ़रमाया: "मैं रसूले ख़ुदा (स) की ज़िंदगी में उनका राज़ उजागर नहीं करूंगी।"

रसूले अकरम (स) के विसाल के बाद हज़रत फ़ातिमा ज़हरा (स) ने उस राज़ से पर्दा उठाते हुए फ़रमाया कि पहली बार रसूले ख़ुदा (स) ने उन्हें अपनी वफ़ात की ख़बर दी, जिस पर वह रोने लगीं। फिर आपने फ़रमाया: "तुम मेरे अहलेबैत में सबसे पहली व्यक्ति होगी जो मुझसे आ मिलेगी।"

यह सुनकर हज़रत फ़ातिमा ज़हरा (स)खुश हुईं, क्योंकि उन्हें मालूम हो गया कि वह अधिक समय तक अपने पिता से दूर नहीं रहेंगी। (अल-तबक़ातुल कुबरा, जिल्द 2, पृष्ठ 247; अल-कामिल फ़ित तारीख़, जिल्द 2, पृष्ठ 219)

आख़िरी दिनों में रसूले अकरम (स) की वसीयत

रसूले अकरम (स) ने अपनी बीमारी के आख़िरी दिनों में नमाज़ की पाबंदी और अपने अधीन रहने वाले लोगों के साथ अच्छा व्यवहार करने की ताकीद फ़रमाते रहे।

आप नमाज़ के बारे में बार-बार ताकीद फ़रमाते थे: "الصَّلَاةَ الصَّلَاةَ" यानी "नमाज़! नमाज़!"

एक रिवायत के अनुसार कअबुल अहबार ने दूसरे ख़लीफ़ा से पूछा कि रसूले अकरम (स) ने आख़िरी समय में क्या फ़रमाया था? उन्होंने हज़रत अमीरुल मोमिनीन अली (अ) की ओर इशारा करते हुए कहा: "इनसे पूछो।"

हज़रत अमीरुल मोमिनीन अली (अ) ने फ़रमाया: "रसूले अकरम (स) का सिर मेरे कंधे पर था और आप फ़रमा रहे थे: الصَّلَاةَ الصَّلَاةَ; नमाज़! नमाज़!" (अल-तबक़ातुल कुबरा, जिल्द 2, पृष्ठ 254)

रसूले अकरम (स) ने किसके सीने से लगकर वफ़ात पाई?

रसूले अकरम (स) के आख़िरी पलों में हज़रत अमीरुल मोमिनीन अली (अ) आपके पास मौजूद थे।

कुछ रिवायतों में उल्लेख मिलता है कि रसूले ख़ुदा (स) ने फ़रमाया: "मेरे भाई को बुलाओ।"

अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली (अ) के पास तशरीफ़ लाए। रसूले अकरम (स) की हालत और अधिक नाज़ुक हुई तो मौला अली (अ) ने आपको सहारा दिया और अपने सीने से लगा लिया।

कुछ रिवायतों में जनाब इब्ने अब्बास से नक़्ल हुआ है कि रसूले ख़ुदा (स) ने हज़रत अली (अ) की गोद में वफ़ात पाई और हज़रत अली (अ) ने फ़ज़्ल बिन अब्बास के साथ मिलकर आपको ग़ुस्ल दिया।

हज़रत अमीरुल मोमिनीन अली (अ) से नक़्ल हुआ है: "وَلَقَدْ قُبِضَ رَسُولُ اللّٰهِ وَإِنَّ رَأْسَهُ لَعَلَى صَدْرِي... وَلَقَدْ وَلَّيْتُ غُسْلَهُ وَالْمَلَائِكَةُ أَعْوَانِي"

"रसूले ख़ुदा (स) ने इस हालत में वफ़ात पाई कि आपका सिर मेरे सीने पर था। मैंने स्वयं आपको ग़ुस्ल दिया, जबकि फ़रिश्ते मेरी मदद कर रहे थे।"

रसूले अकरम (स) के आख़िरी कलाम

रसूले अकरम (स) के आख़िरी पलों के बारे में रिवायतों में "الرَّفِيقَ الْأَعْلَى" का उल्लेख मिलता है।

एक रिवायत में जनाब आयशा से नक़्ल हुआ है कि रसूले अकरम (स) बीमारी के दौरान फ़रमाया: "اللّٰهُمَّ الرَّفِيقَ الْأَعْلَى" यानी "ऐ अल्लाह! रफ़ीक़े आला के साथ।"

कुछ रिवायतों में ये शब्द भी नक़्ल हुए हैं: "لَا، مَعَ الرَّفِيقِ الْأَعْلَى" यानी "नहीं, बल्कि रफ़ीक़े आला के साथ।"

क़ुरआने करीम में अल्लाह तआला फ़रमाता है:

"فَأُولٰئِكَ مَعَ الَّذِينَ أَنْعَمَ اللّٰهُ عَلَيْهِمْ مِنَ النَّبِيِّينَ وَالصِّدِّيقِينَ وَالشُّهَدَاءِ وَالصَّالِحِينَ وَحَسُنَ أُولٰئِكَ رَفِيقًا۔"

"तो ऐसे लोग उन लोगों के साथ होंगे जिन पर अल्लाह ने इनाम फ़रमाया है, यानी नबियों, सिद्दीक़ों, शहीदों और नेक लोगों के साथ; और ये कितने अच्छे साथी हैं।"

इस तरह रसूले अकरम (स) अपने पालनहार की बारगाह में हाज़िर हुए और सांसारिक जीवन का आख़िरी सफ़र पूरा हुआ।

28 सफ़र मुसलमानों, विशेष रूप से अहलेबैत (अ) मोहब्बत रखने वालों के लिए ग़म और दुख का दिन है। रसूले आज़म हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा (स) दुनिया से विदा हो गए, लेकिन आपकी शिक्षाएं, आपकी सीरत, आपका लाया हुआ क़ुरआन और आपकी दी हुई हिदायत आज भी इंसानियत के लिए मार्गदर्शन की मशाल हैं।

आपकी रहलत उम्मत के लिए एक बहुत बड़ा सदमा थी। मदीना मुनव्वरा पर ग़म की ऐसी फ़िज़ा छा गई थी, जिसे शब्दों में बयान करना आसान नहीं है।

रसूले अकरम (स) की तदफ़ीन

रसूले अकरम (स) को ग़ुस्ल और कफ़न देने के बाद उसी हुजरे मुबारक में दफ़्न किया गया, जहां आपने वफ़ात पाई थी।

हज़रत अमीरुल मोमिनीन अली (अ) ने रसूले ख़ुदा (स) की तजहीज़, तकफ़ीन और तदफ़ीन की ज़िम्मेदारी निभाई।

इस तरह मदीना मुनव्वरा की वह धरती, जिसने रसूले ख़ुदा (स) की दावत, इबादत, हिजरत और संघर्ष के महान दिनों को देखा था, आपके मदफ़न की सआदत से भी सम्मानित हुई।

हज़रत फ़ातिमा ज़हरा (स) का नौहा और रोना

रसूले अकरम (स) के विसाल के बाद हज़रत फ़ातिमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा का ग़म बयान से बाहर था।

आपने फ़रमाया:

"إِنَّا لِلّٰهِ وَإِنَّا إِلَيْهِ رَاجِعُونَ، انْقَطَعَ عَنَّا خَبَرُ السَّمَاءِ।"

"हम अल्लाह ही के हैं और उसी की ओर लौटकर जाने वाले हैं। हमसे आसमानी ख़बर और वह्य का सिलसिला कट गया है।"

और अपने पिता को याद करते हुए फ़रमाती थीं:

"يَا أَبَتَاهْ، إِلَى جَبْرَئِيلَ نَنْعَاهُ، انْقَطَعَتْ عَنَّا أَخْبَارُ السَّمَاءِ।"

"ऐ मेरे बाबा! अब आपकी जुदाई का ग़म जिब्रईल से बयान करना होगा। आपकी वफ़ात के साथ हमारे लिए आसमानी ख़बरें बंद हो गईं।"

आपके अशआर में भी अपने पिता की जुदाई का दर्द स्पष्ट दिखाई देता है:

"जब कोई व्यक्ति दुनिया से विदा हो जाता है तो धीरे-धीरे उसका ज़िक्र कम हो जाता है, लेकिन ख़ुदा की क़सम! मेरे पिता के विसाल के बाद उनका ज़िक्र दिन-ब-दिन बढ़ता ही जा रहा है। ज़रा सोचो! जब तुम्हारे दिल में ग़म और दुख बढ़ जाए तो क्या रसूले ख़ुदा (स) ज़िंदा हैं या क़ब्र ने उन्हें अपने अंदर जगह दे दी है?"

रसूले ख़ुदा (स) के बाद अहलेबैत अलैहिमुस्सलाम पर मुसीबतें

रसूले ख़ुदा (स) के विसाल का ग़म अभी ताज़ा ही था, मदीना की गलियां अभी नबीए रहमत (स) की जुदाई पर आंसू बहा रही थीं, हज़रत फ़ातिमा ज़हरा (स) के दिल पर अपने बाबा की जुदाई का पहाड़ टूट चुका था, लेकिन ग़म की यह दास्तान यहीं समाप्त नहीं हुई।

जिस घर में रसूले ख़ुदा (स) तशरीफ़ लाया करते थे, जिस दरवाज़े पर खड़े होकर अपनी बेटी को सलाम किया करते थे, उसी घर पर बाद में ऐसी मुसीबतों के साये छा गए, जिन्हें बयान करते हुए भी दिल कांप उठता है।

हज़रत फ़ातिमा ज़हरा (स) ने अपने बाबा की जुदाई का ग़म भी सहा और अपने हक़ और सम्मान पर आने वाली आज़माइशों को भी बर्दाश्त किया। वह बेटी, जिसके बारे में रसूले ख़ुदा (स) की मोहब्बत भरी निगाहें गवाही देती थीं, वही बेटी कुछ ही समय बाद इस दुनिया से विदा हो गईं और अपने बाबा से जा मिलीं।

फिर समय ने हज़रत हसन मुज्तबा (अ) को भी ऐसे ज़ख़्म दिए, जिनका इलाज दुनिया की किसी दवा में नहीं था। और जब इतिहास कर्बला तक पहुंचा तो अहलेबैत (अ) के सब्र और क़ुर्बानी की इंतिहा हो गई।

नवासा-ए-रसूल, फ़रज़ंदे फ़ातिमा, हज़रत हुसैन इब्ने अली (अ) अपने अज़ीज़ों और असहाब की लाशों के बीच अकेले खड़े थे। एक तरफ़ ज़ुल्म का लश्कर था और दूसरी तरफ़ रसूले ख़ुदा (स) का घराना।

अली अकबर (अ) की जवानी, क़ासिम (अ) की मुस्कान, अब्बास (अ) के बाज़ू, अली असग़र (अ) की मासूमियत और आख़िर में हुसैन (अ) का ख़ून—सब कुछ राहे हक़ में क़ुर्बान हो गया।

कर्बला ने दुनिया को बता दिया कि मुहम्मद और आले मुहम्मद (अ) का रास्ता केवल शब्दों का रास्ता नहीं, बल्कि क़ुर्बानी, वफ़ा, सब्र और हक़ पर डटे रहने का रास्ता है।

और आज जब हम अहलेबैत (अ) की मज़लूमियत को याद करते हैं तो दिल बेइख़्तियार पूछता है:

वह फ़ातिमा (स) कहां हैं, जो अपने बाबा को याद करके रोया करती थीं?

वह हसन (अ) कहां हैं, जिन्होंने उम्मत की ख़ातिर ज़हर का जाम पी लिया?

वह हुसैन (अ) कहां हैं, जिन्होंने दीन-ए-ख़ुदा की हिफ़ाज़त के लिए अपना सब कुछ क़ुर्बान कर दिया?

और वह ज़ैनब (स) कहां हैं, जिन्होंने कर्बला के बाद अपने दिल पर पहाड़ उठा लिया, लेकिन हक़ का परचम झुकने नहीं दिया?

यही अहलेबैत (अ) की महानता है कि मुसीबतें उनके रास्ते में आती रहीं, लेकिन उनके क़दम हक़ से नहीं हटे। उनके जिस्म ज़ख़्मी हुए, दिल लहूलुहान हुए, घर उजड़े, अज़ीज़ क़ुर्बान हुए, लेकिन उनकी ज़बान से हक़ की आवाज़ कभी ख़ामोश नहीं हुई।

आज सदियां गुज़र जाने के बाद भी जब उनका ज़िक्र होता है तो आंखें नम हो जाती हैं, सीने ग़म से भर जाते हैं और दिल से बेइख़्तियार यही आवाज़ निकलती है:

ऐ आले मुहम्मद (अ)! हम आपके दुखों को पूरी तरह समझ तो नहीं सकते, लेकिन आपके ग़म में रोना अपनी सआदत समझते हैं। आपकी मज़लूमियत हमारी आंखों का आंसू, आपकी क़ुर्बानी हमारे दिल की रोशनी और आपकी मोहब्बत हमारी ज़िंदगी का सरमाया है।

सलाम हो आप पर, ऐ रसूले ख़ुदा (स) के अहलेबैत!

सलाम हो आपके सब्र पर!

सलाम हो आपकी मज़लूमियत पर!

और सलाम हो उस हक़ पर, जिसे आपने अपनी क़ुर्बानियों से हमेशा के लिए ज़िंदा कर दिया।

अल्लाहुम्मा सल्लि अला मुहम्मदिं व आले मुहम्मद, वलअन अअदाअहुम अजमईन।

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