शनिवार 29 अगस्त 2026 - 04:56
पैग़म्बर (स) की सीरत में नमाज़ की अहमियत

अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली (अ) एक रिवायत में नमाज़ की अहमियत और पैग़म्बर ए अकरम (स) की सीरत में इसके विशेष स्थान की ओर संकेत करते हैं।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी  के अनुसार, निम्नलिखित रिवायत ‘तनबीहुल ख़वातिर’ किताब से ली गई है। इस रिवायत का पाठ इस प्रकार हैः

امام علی علیه‌السلام:
کَانَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّی اللَّهُ عَلَیْهِ وَآلِهِ لَا یُؤْثِرُ عَلَی الصَّلَاةِ عَشَاءً وَلَا غَیْرَهُ، وَکَانَ إِذَا دَخَلَ وَقْتُهَا کَأَنَّهُ لَا یَعْرِفُ أَهْلًا وَلَا حَمِیمًا.

इमाम अली (अ) ने फ़रमाया:

“रसूलुल्लाह (स) नमाज़ के ऊपर न तो रात के खाने को प्राथमिकता देते थे और न ही किसी दूसरी चीज़ को। जब नमाज़ का समय हो जाता था तो ऐसा लगता था जैसे वे न अपने परिवार को पहचानते हैं और न किसी घनिष्ठ मित्र को।”

तनबीहुल ख़वातिर, भाग 2, पेज 78

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