अनुवाद: मौलाना सय्यद अली हाशिम आबिदी
हौज़ा न्यूज़ एजेंसी
इमाम अली रज़ा अलैहिस्सलाम के सहाबा और शागिर्दों में कई ऐसी महान हस्तियां गुज़री हैं, जिन्होंने इल्मे हदीस हासिल करने, रिवायतों को सुरक्षित रखने, फ़िक़्ह और अहले-बैत अलैहिमुस्सलाम की शिक्षाओं और मआरिफ़ को फैलाने तथा इन शिक्षाओं को अगली पीढ़ियों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। नीचे उनमें से कुछ प्रमुख सहाबा का संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत किया जा रहा है।
1- जनाब हसन बिन अली बिन ज़ियाद वश्शा रज़वानुल्लाहि तआला अलैह
नजाशी बयान करते हैं कि जनाब हसन बिन अली बिन ज़ियाद वश्शा रज़वानुल्लाहि तआला अलैह, जनाब इलियास सैरफ़ी रज़वानुल्लाहि तआला अलैह के पोते थे। जनाब इलियास सैरफ़ी रज़वानुल्लाहि तआला अलैह इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम के सहाबा में गिने जाते थे। जनाब हसन बिन अली वश्शा रज़वानुल्लाहि तआला अलैह भी इमाम अली रज़ा अलैहिस्सलाम के बेहतरीन और प्रमुख सहाबा में से थे।
जनाब हसन बिन अली वश्शा रज़वानुल्लाहि तआला अलैह अपने बुज़ुर्ग दादा जनाब इलियास सैरफ़ी रज़वानुल्लाहि तआला अलैह से रिवायत करते हैं कि जब उनकी मृत्यु का समय निकट आया तो उन्होंने कहा:
"गवाह रहो! यह वह समय है जब झूठ नहीं बोला जाता। मैंने अबू अब्दुल्लाह अलैहिस्सलाम को यह कहते हुए सुना है: ख़ुदा की क़सम! वह बंदा जो अल्लाह और उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि से मोहब्बत करता हो और इमामों की विलायत को स्वीकार करता हो, उसे आग नहीं छुएगी।"
जनाब इलियास सैरफ़ी रज़वानुल्लाहि तआला अलैह ने यह बात दूसरी और तीसरी बार भी दोहराई, जबकि किसी ने उनसे इस बारे में कोई सवाल नहीं किया था।
हदीस से असाधारण लगाव
जनाब अहमद बिन मुहम्मद क़ुम्मी रज़वानुल्लाहि तआला अलैह बयान करते हैं कि मैं हदीस हासिल करने और इल्म की तलाश में कूफ़ा गया। वहां मेरी मुलाकात जनाब हसन बिन अली वश्शा रज़वानुल्लाहि तआला अलैह से हुई। मैंने उनसे अनुरोध किया कि अलाअ बिन रज़ीन और अबान बिन उस्मान की किताबें मुझे दे दें। उन्होंने वे दोनों किताबें मुझे दे दीं और कहा: "जल्दी मत करो; इन किताबों से जो कुछ तुम्हें लिखना है, इत्मीनान से लिख लो।"
फिर उन्होंने कहा: "अगर मुझे मालूम होता कि तुम्हारी तरह हदीस का इतना शौक़ रखने वाला व्यक्ति भी मौजूद है तो मैं इससे कहीं अधिक हदीसें याद करता; क्योंकि मैंने इसी मस्जिद में 900 मुहद्दिसों को देखा, जिनमें से हर एक कहता था: 'मुझसे जाफ़र बिन मुहम्मद ने हदीस बयान की।'"
यह घटना उस दौर के असाधारण इल्मी और हदीसी माहौल तथा इमामाने अहले-बैत अलैहिमुस्सलाम की हदीसें हासिल करने के लिए उलमा और मुहद्दिसों के शौक़ को दर्शाती है।
इमाम अली रज़ा अलैहिस्सलाम की बारगाह में हाज़िरी
जनाब हसन बिन अली वश्शा रज़वानुल्लाहि तआला अलैह का इमाम अली रज़ा अलैहिस्सलाम से इल्मी संबंध और हदीसों तथा मसाइल को हासिल करने का शौक़ इस घटना से भी स्पष्ट होता है कि एक बार उन्होंने विभिन्न मसाइल पर आधारित एक लेख तैयार किया, ताकि इमाम अली रज़ा अलैहिस्सलाम की सेवा में उपस्थित होकर उन मसाइल के बारे में सवाल कर सकें।
वह बयान करते हैं: "एक सुबह मैं इमाम अली रज़ा अलैहिस्सलाम के घर की ओर रवाना हुआ। जब वहां पहुंचा तो देखा कि इमाम अलैहिस्सलाम के दरवाज़े पर लोगों की बहुत बड़ी भीड़ है। इसी दौरान मेरी नज़र इमाम अलैहिस्सलाम के एक ख़ादिम पर पड़ी, जो लोगों से पूछ रहा था:
'हसन बिन अली वश्शा, इलियास की बेटी के बेटे, बग़दादी कहां हैं?'
मैंने कहा: 'ऐ ख़ुदा के बंदे! जिस व्यक्ति को तुम तलाश कर रहे हो, वह मैं ही हूं।'
उन्होंने मुझे एक लिखित पत्र दिया और कहा: 'ये उन मसाइल के जवाब हैं जिन्हें तुम अपने साथ लेकर आए हो।'"
यह घटना जनाब हसन बिन अली वश्शा रज़वानुल्लाहि तआला अलैह की इमाम अली रज़ा अलैहिस्सलाम से गहरी इल्मी وابستगी और इमाम अलैहिस्सलाम के इल्म और मक़ाम की एक महत्वपूर्ण झलक पेश करती है।
(रिजालुे नज्जाशी; मुअजम रिजालिल हदीस, जिल्द 5, पृष्ठ 35; मनाक़िबे आले अबी तालिब, जिल्द 4, पृष्ठ 335।)
2-जनाब हसन बिन अली बिन फ़ज़्ज़ाल रिज़वानुल्लाहि तआला अलैह
जनाब हसन बिन अली बिन फ़ज़्ज़ाल रज़वानुल्लाहि तआला अलैह उन महान सहाबा में से थे जिन्होंने इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम का ज़माना पाया था। वे इमाम अली रज़ा अलैहिस्सलाम के रावी भी थे और आप अलैहिस्सलाम से विशेष संबंध और वाबस्तगी रखते थे।
रिजाल के उलमा ने उनके बारे में लिखा है कि वे अत्यंत महान, ज़ाहिद, परहेज़गार और विश्वसनीय व्यक्ति थे।
उनकी इबादत और बंदगी का यह हाल था कि जब वे रेगिस्तान में जाते तो इबादत और लंबे सज्दों में इतने मग्न हो जाते कि रेगिस्तान के पक्षी उनके चारों ओर जमा हो जाते। वे इबादत में इस हद तक डूब जाते कि कभी-कभी बेहोशी की हालत में ज़मीन पर गिर पड़ते। दूर से देखने वाला यह समझता कि ज़मीन पर कोई कपड़ा पड़ा हुआ है।
जनाब हसन बिन अली बिन फ़ज़्ज़ाल रज़वानुल्लाहि तआला अलैह इल्मी दृष्टि से भी एक प्रमुख व्यक्तित्व थे और कई किताबों के लेखक थे। उनकी रचनाओं में निम्नलिखित किताबों का उल्लेख मिलता है: किताबुज़ ज़ियारात, किताबुल बशारात, किताबुन नवादिर, किताबुर रद्द अलल ग़ुलात, किताबुश्शवाहिद, किताबुल मुतआ, किताबुन नासिख़ वल मंसूख़, किताबुल मलाहिम, किताबुस्सलात और किताबुर रिजाल।
इसके अलावा एक और किताब का भी उल्लेख मिलता है, जिसे अहले-क़ुम ने उनके पिता जनाब अली बिन फ़ज़्ज़ाल से बयान किया है।
जनाब हसन बिन अली बिन फ़ज़्ज़ाल रज़वानुल्लाहि तआला अलैह की शख्सियत में इल्म, रिवायत, ज़ुह्द, परहेज़गारी और इबादत का सुंदर मेल दिखाई देता है। वे इमाम अली रज़ा अलैहिस्सलाम के उन प्रमुख सहाबा में गिने जाते हैं जिन्होंने अहले-बैत अलैहिमुस्सलाम के उलूम और मआरिफ़ को सुरक्षित रखने और अगली पीढ़ियों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
(मौअजम रिजालिल हदीस, जिल्द 5, पृष्ठ 48।)
3- जनाब हसन बिन महबूब रिज़वानुल्लाहि तआला अलैह
जनाब हसन बिन महबूब रज़वानुल्लाहि तआला अलैह अपने समय के चार प्रमुख स्तंभों में गिने जाते थे और असहाबे इज्मा में से थे। उन्होंने इमाम अली रज़ा अलैहिस्सलाम से अनेक हदीसें रिवायत कीं। इसके अलावा इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम के लगभग 60 सहाबा से भी हदीसें बयान कीं।
जनाब हसन बिन महबूब रज़वानुल्लाहि तआला अलैह के पिता अपने बेटे को हदीस हासिल करने, सुनने और लिखने की प्रेरणा देते थे। वह उनसे कहा करते थे: "बेटे! अली बिन रिआब से जो हदीस तुम सुनोगे और उसे लिखोगे, मैं हर हदीस के बदले तुम्हें एक दिरहम दूंगा।"
जनाब अली बिन रिआब रज़वानुल्लाहि तआला अलैह कूफ़ा के बड़े शिया उलमा और विश्वसनीय तथा प्रतिष्ठित रावियों में गिने जाते थे।
यह बात भी उल्लेखनीय है कि जनाब हसन बिन महबूब रज़वानुल्लाहि तआला अलैह के बुज़ुर्ग पूर्वज को अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली अलैहिस्सलाम की मदद से आज़ादी मिली थी। आज़ादी के बाद वे हज़रत अमीरुल मोमिनीन अलैहिस्सलाम की सेवा में रहे और आपके सेवक थे।
जनाब हसन बिन महबूब रज़वानुल्लाहि तआला अलैह इल्मी और हदीसी दृष्टि से भी बहुत ऊंचा स्थान रखते थे। उनकी कई किताबों का उल्लेख मिलता है, जिनमें किताबुल हुदूद वद्दियात, किताबुल फ़राइज़, किताबुन्निकाह, किताबुत्तलाक़ और किताबुन नवादिर शामिल हैं। किताबुन नवादिर लगभग 1,000 पृष्ठों पर आधारित थी। उनकी एक किताब तफ़्सीरे क़ुरआन के विषय पर भी थी।
जनाब हसन बिन महबूब रज़वानुल्लाहि तआला अलैह का 224 हिजरी में 65 वर्ष की आयु में निधन हुआ।
जनाब हसन बिन महबूब रज़वानुल्लाहि तआला अलैह की शख्सियत इल्मे हदीस, रिवायत, लेखन और अहले-बैत अलैहिमुस्सलाम के मआरिफ़ की प्रसार-प्रचार की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण थी। वे इमाम अली रज़ा अलैहिस्सलाम के उन प्रमुख सहाबा में गिने जाते हैं जिन्होंने अहले-बैत अलैहिमुस्सलाम की हदीसों को सुरक्षित रखने और अगली पीढ़ियों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
(मुन्तहअल-आमाल, जिल्द 2, पृष्ठ 361।)
4-जनाब ज़करिया बिन आदम रिज़वानुल्लाहि तआला अलैह
जनाब ज़करिया बिन आदम रज़वानुल्लाहि तआला अलैह क़ुम के महान, विश्वसनीय और प्रतिष्ठित सहाबा में गिने जाते थे। उन्हें इमाम अली रज़ा अलैहिस्सलाम के निकट विशेष सम्मान और स्थान प्राप्त था और आप अलैहिस्सलाम उन पर विशेष भरोसा करते थे।
शैख़ कश्शी ने अपनी किताब रिजाल में नक़्ल किया है कि एक बार जनाब ज़करिया बिन आदम रज़वानुल्लाहि तआला अलैह ने इमाम अली रज़ा अलैहिस्सलाम की सेवा में अर्ज़ किया: "मैं अपने परिवार और रिश्तेदारों से अलग होकर किसी दूसरी जगह जाने का इरादा रखता हूं, क्योंकि उनके बीच नादान और कम समझ लोगों की संख्या बहुत बढ़ गई है।"
इमाम अली रज़ा अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया: "ऐसा मत करो, क्योंकि तुम्हारी वजह से तुम्हारे परिवार से मुसीबतें दूर की जाती हैं, जिस तरह अबुल हसन इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम की वजह से बग़दाद के लोगों से मुसीबतें दूर की जाती हैं।"
यह फ़रमान जनाब ज़करिया बिन आदम रज़वानुल्लाहि तआला अलैह के ऊंचे स्थान और इमाम अली रज़ा अलैहिस्सलाम के निकट उनके विशेष भरोसे और सम्मान की स्पष्ट निशानी है।
दीन और दुनिया के अमीन
इमाम अली रज़ा अलैहिस्सलाम के विश्वसनीय सहाबी जनाब अली बिन मुसय्यब हमदानी रज़वानुल्लाहि तआला अलैह बयान करते हैं: मैंने इमाम अली रज़ा अलैहिस्सलाम की सेवा में अर्ज़ किया: "मेरा घर आपसे बहुत दूर है और मैं हर समय आपकी सेवा में उपस्थित नहीं हो सकता। ऐसी स्थिति में अपने धार्मिक आदेश और मसाइल किससे पूछूं?"
इमाम अली रज़ा अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया: "ज़करिया बिन आदम क़ुम्मी से पूछो; वह दीन और दुनिया के अमीन हैं।"
जनाब अली बिन मुसय्यब रज़वानुल्लाहि तआला अलैह कहते हैं: "जब मैं इमाम अलैहिस्सलाम की सेवा से विदा हुआ तो ज़करिया बिन आदम रज़वानुल्लाहि तआला अलैह के पास पहुंचा और जिन मसाइल की मुझे ज़रूरत थी, उनके बारे में उनसे पूछा।"
यह घटना ज़करिया बिन आदम रज़वानुल्लाहि तआला अलैह के इल्मी स्थान और इमाम अली रज़ा अलैहिस्सलाम के निकट उनके विश्वसनीय होने को स्पष्ट करती है।
इमाम अली रज़ा अलैहिस्सलाम के हमसफ़र
जनाब ज़करिया बिन आदम रज़वानुल्लाहि तआला अलैह की महान सआदतो में से एक यह भी थी कि उन्हें एक वर्ष मदीना से मक्का तक के सफ़र और हज के दौरान इमाम अली रज़ा अलैहिस्सलाम के साथ रहने का सम्मान प्राप्त हुआ।
शैख़ कश्शी विश्वसनीय सनद के साथ रिवायत करते हैं कि ज़करिया बिन आदम रज़वानुल्लाहि तआला अलैह ने कहा: "एक रात फ़ज्र के निकलने तक मैं इमाम अली रज़ा अलैहिस्सलाम के साथ उलूम, मआरिफ़ और रहस्यों के बारे में बातचीत करता रहा। फिर इमाम अलैहिस्सलाम उठे और फ़ज्र की नमाज़ अदा की।"
ज़करिया बिन आदम रज़वानुल्लाहि तआला अलैह की ज़िंदगी इमाम अली रज़ा अलैहिस्सलाम के उन प्रमुख सहाबा का उज्ज्वल उदाहरण है जिन्होंने इल्म, तक़वा, अमानत और दीन की सेवा के माध्यम से अहले-बैत अलैहिमुस्सलाम के मआरिफ़ की रक्षा और उनके प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
(मौअजम रिजालिल हदीस, जिल्द 5, पृष्ठ 270।)
5-जनाब मुहम्मद बिन इस्माइल बिन बज़ीअ रिज़वानुल्लाहि तआला अलैह
जनाब मुहम्मद बिन इस्माइल बिन बज़ीअ रज़वानुल्लाहि तआला अलैह शिया समाज के नेक और सदाचारी लोगों, विश्वसनीय रावियों और इमाम अली रज़ा अलैहिस्सलाम के प्रमुख सहाबा में गिने जाते थे। उन्होंने अपने जीवन का एक हिस्सा इमाम मुहम्मद तक़ी जवाद अलैहिस्सलाम की सेवा में भी गुज़ारा।
उनकी कई रचनाओं का उल्लेख मिलता है, जिनमें दो किताबें विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं: किताब सवाबुल हज और किताबुल हज।
एक बार जनाब मुहम्मद बिन इस्माइल बिन बज़ीअ रज़वानुल्लाहि तआला अलैह ने इमाम मुहम्मद तक़ी जवाद अलैहिस्सलाम से अनुरोध किया कि उनके कफ़न के लिए अपना कुर्ता अता फ़रमाएं। इमाम अलैहिस्सलाम ने अपना कुर्ता उनके लिए भेज दिया और फ़रमाया: "इसके बटन निकाल देना।"
जनाब मुहम्मद बिन इस्माइल बिन बज़ीअ रज़वानुल्लाहि तआला अलैह मक्का और मदीना के बीच रास्ते में एक स्थान पर निधन हुआ।
उनके एक मित्र उनकी क़ब्र पर पहुंचे और वहां यह रिवायत बयान की कि मैंने साहिबे-क़ब्र जनाब मुहम्मद बिन इस्माइल बिन बज़ीअ रज़वानुल्लाहि तआला अलैह से सुना था कि इमाम अली रज़ा अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया:
"जो व्यक्ति अपने मोमिन भाई की क़ब्र की ज़ियारत करे, उसकी क़ब्र के पास बैठे, क़िब्ला की ओर मुंह करे, अपना हाथ क़ब्र पर रखे और सात बार सूरह 'इन्ना अंज़लनाहु फ़ी लैलतिल क़द्र' पढ़े, वह सबसे बड़े भय से सुरक्षित रहेगा।"
हुसैन बिन ख़ालिद सैरफ़ी बयान करते हैं: हम कुछ लोग इमाम अली रज़ा अलैहिस्सलाम की सेवा में उपस्थित थे। इसी दौरान जनाब मुहम्मद बिन इस्माइल बिन बज़ीअ रज़वानुल्लाहि तआला अलैह का ज़िक्र हुआ। इमाम अली रज़ा अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया: "मेरी इच्छा है कि तुम लोगों में भी उनके जैसा एक व्यक्ति मौजूद हो।"
इमाम अली रज़ा अलैहिस्सलाम का यह कथन जनाब मुहम्मद बिन इस्माइल बिन बज़ीअ रज़वानुल्लाहि तआला अलैह के ईमान, तक़वा, इख़लास, इल्म और ऊंचे स्थान की गवाही देता है और यह स्पष्ट करता है कि वे इमाम अलैहिस्सलाम के निकट विशेष विश्वास और सम्मान रखते थे।
(मौअजम रिजालिल हदीस, जिल्द 15, पृष्ठ 95।)
6-जनाब रय्यान बिन सल्त रिज़वानुल्लाहि तआला अलैह
नजाशी ने अपनी किताब रिजाल में लिखा है कि रय्यान बिन सल्त इमाम अली रज़ा अलैहिस्सलाम से रिवायत करने वाले रावियों में से थे। वे विश्वसनीय और सच्चे थे। उन्होंने एक किताब भी लिखी थी, जिसमें इमाम अली रज़ा अलैहिस्सलाम के उन कथनों को जमा किया गया था जिनमें आल और उम्मत के बीच अंतर बयान किया गया है।
मुअम्मर बिन ख़ल्लाद बयान करते हैं: फ़ज़्ल बिन सहल ने मुझे ख़ुरासान जाने की ज़िम्मेदारी सौंपी। इसी दौरान रय्यान बिन सल्त रज़वानुल्लाहि तआला अलैह ने मुझसे कहा: "मेरी इच्छा है कि जब तुम ख़ुरासान पहुंचो तो इमाम अली रज़ा अलैहिस्सलाम की सेवा में मेरा सलाम पहुंचाना और उनसे अनुरोध करना कि अपने कपड़ों में से एक कपड़ा मुझे अता फ़रमाएं तथा अपने नाम से ढाले गए कुछ दिरहम भी मुझे प्रदान करें।"
मुअम्मर कहते हैं: जब मैं इमाम अली रज़ा अलैहिस्सलाम की सेवा में उपस्थित हुआ तो इससे पहले कि मैं अपनी बात कहता, इमाम अलैहिस्सलाम ने स्वयं फ़रमाया:
"रय्यान कहां हैं? क्या वह हमारे पास आना चाहते हैं, ताकि मैं उन्हें अपने कपड़ों में से एक कपड़ा पहनाऊं और अपने दिरहम में से कुछ उन्हें दूं?"
मुअम्मर कहते हैं: मैंने अर्ज़ किया: "सुब्हानल्लाह! ख़ुदा की क़सम! मैंने अभी अपना सवाल भी आपकी सेवा में प्रस्तुत नहीं किया था।"
इमाम अली रज़ा अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया: "ऐ मुअम्मर! मोमिन को तौफ़ीक़ हासिल होती है। जाओ और रय्यान से कहो कि हमारे पास आए।"
चुनांचे जनाब रय्यान रज़वानुल्लाहि तआला अलैह इमाम अली रज़ा अलैहिस्सलाम की सेवा में उपस्थित हुए और इमाम अलैहिस्सलाम से एक कुर्ता प्राप्त किया। जब वह इमाम अलैहिस्सलाम के घर से बाहर निकले तो मैंने उनसे पूछा: "तुम्हारे हाथ में क्या है?"
उन्होंने जवाब दिया: "30 दिरहम।"
रय्यान बिन सल्त रज़वानुल्लाहि तआला अलैह का यह घटना इमाम अली रज़ा अलैहिस्सलाम के निकट उनके विशेष स्थान और आपके अपने मुख़लिस सहाबा पर कृपा और ध्यान को स्पष्ट करती है।
(मौअजम रिजालिल हदीस, जिल्द 7, पृष्ठ 209।)
ग़िना के बारे में इमाम अली रज़ा अलैहिस्सलाम का दृष्टिकोण
जनाब रय्यान बिन सल्त रज़वानुल्लाहि तआला अलैह बयान करते हैं: मैंने इमाम अली रज़ा अलैहिस्सलाम की सेवा में अर्ज़ किया: "हिशाम बिन इब्राहीम अब्बासी यह दावा करता है कि आपने ग़िना सुनने की अनुमति दी है।"
इमाम अली रज़ा अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया: "वह ज़िंदीक़ झूठ बोलता है। उसने मुझसे ग़िना सुनने के बारे में सवाल किया था। मैंने उसे बताया कि एक व्यक्ति ने इमाम मुहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम से भी यही सवाल किया था।"
इमाम मुहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम ने उससे फ़रमाया: "अगर अल्लाह तबारक व तआला हक़ और बातिल को एक स्थान पर जमा कर दे तो ग़िना इन दोनों में से किसके साथ होगा?"
उस व्यक्ति ने जवाब दिया: "बातिल के साथ।"
इमाम मुहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया: "यही तुम्हारे लिए जवाब है; तुमने स्वयं अपने विरुद्ध फैसला दे दिया है।"
इसके बाद इमाम अली रज़ा अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया: "मेरा आदेश भी यही है।"
(बिहारुल अनवार, जिल्द 49, पृष्ठ 263।)
7-जनाब नस्र बिन क़ामूस रिज़वानुल्लाहि तआला अलैह
शैख़ मुफ़ीद रज़वानुल्लाहि तआला अलैह ने जनाब नस्र बिन क़ामूस रज़वानुल्लाहि तआला अलैह को इमाम अली रज़ा अलैहिस्सलाम के विशेष सहाबा और विश्वसनीय रावियों में गिना है। वे उन्हें अहले-इल्म, परहेज़गार और शिया फ़ुक़हा में से बताते हैं।
जनाब नस्र बिन क़ामूस रज़वानुल्लाहि तआला अलैह बयान करते हैं: मैं इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम के घर में मौजूद था। इमाम अलैहिस्सलाम ने मेरा हाथ पकड़ा और मुझे अपने घर के एक कमरे के दरवाज़े तक ले गए। फिर आपने दरवाज़ा खोला। अंदर देखा तो आपके बेटे अली अलैहिस्सलाम एक किताब हाथ में लिए उसका अध्ययन कर रहे थे।
इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम ने मुझसे फ़रमाया: "क्या तुम इन्हें पहचानते हो?"
मैंने अर्ज़ किया: "जी हां, ये आपके बेटे हैं।"
इमाम अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया: "ऐ नस्र! क्या तुम जानते हो कि यह कौन-सी किताब है जिसका वे अध्ययन कर रहे हैं?"
मैंने अर्ज़ किया: "नहीं।"
इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया: "यह जफ़्र है; इसे नबी या नबी के वसी के अलावा कोई नहीं देखता।"
यह रिवायत इमाम अली रज़ा अलैहिस्सलाम के इल्मी और रूहानी स्थान तथा उनसे संबंधित विशेष उलूम और मआरिफ़ की ओर संकेत करती है।
(मुन्तहल-आमाल, जिल्द 2, पृष्ठ 366।)
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