हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार ,कर्बला ख़त्म हो चुकी थी, मगर कर्बला का सवाल अभी बाक़ी था।
दश्त-ए-नैनवा में नवासा-ए-रसूल हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम, अपने वफ़ादार असहाब व अनसार समेत शहीद किये जा चुके थे। ख़ैमे जलाये जा चुके थे, अहल-ए-हरम को असीर बना लिया गया था और यज़ीदी इक़्तेदार ये समझ रहा था कि उसने इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को शहीद करके हुसैनियत की आवाज़ को भी ख़ामोश कर दिया है।
मगर तारीख़ ने बहुत जल्द साबित कर दिया कि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को क़त्ल किया जा सकता है, हुसैनियत को नहीं; इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के जिस्म-ए-अतहर को ख़ाक में दफ़्न किया जा सकता है, मगर उनके पैग़ाम को नहीं।
कर्बला के मैदान में तलवारें ख़ामोश हुईं तो कूफ़ा व शाम के दरबारों में ख़िताबत ने क़ियाम किया। इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम और हज़रत ज़ैनब-ए-कुबरा अलैहा अस्सलाम ने असीरी को कमज़ोरी नहीं बनने दिया। उन्होंने दरबार-ए-ज़ुल्म में खड़े होकर कर्बला को ज़िंदा रखा और दुनिया को बता दिया कि शहादत के बाद भी हक़ का सफ़र जारी रहता है।
हज़रत ज़ैनब सलामुल्लाह अलैहा की बेमिसाल ख़िताबत और इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम की बसीरत-अफ़रोज़ गुफ़्तगू ने यज़ीदी इक़्तेदार के इस दावे को ख़ाक में मिला दिया कि कर्बला में हक़ का ख़ातमा कर दिया गया है। जिन्हें क़ैदी समझा गया था, वही ज़ुल्म के ख़िलाफ़ सबसे बुलंद आवाज़ बन गए; और जिन्हें फ़ातेह समझा जा रहा था, वो तारीख़ के कठघरे में खड़े नज़र आने लगे।
बिलआख़िर अहल-ए-बैत अलैहिमुस्सलाम के साथ अमवी हुकूमत के रवैये में तब्दीली आई और उन्हें मदीना रवाना किया गया। शाम में अहल-ए-बैत अलैहिमुस्सलाम की अज़ादारी ने गोया ये ऐलान कर दिया कि मक़्तल में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का ख़ून बहा ज़रूर है, मगर शिकस्त इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की नहीं बल्कि यज़ीदी फ़िक्र व इक़्तेदार की हुई है।
कूफ़ा; जहाँ ख़ुतूत भी थे और ख़ामोशी भी
कर्बला से पहले कूफ़ा ने इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को ख़ुतूत लिखे थे, मोहब्बत के दावे किये थे और नुसरत के वादे किये थे। लेकिन जब इब्न-ए-ज़ियाद ने ख़ौफ़, धमकी और सियासी जब्र का माहौल पैदा किया तो बहुत से लोग पीछे हट गए।
कुछ लोग इब्न-ए-ज़ियाद के लश्कर में शामिल हो गए, कुछ ने ख़ामोशी इख़्तियार कर ली और कुछ ऐसे भी थे जिन्हें क़ैद कर दिया गया ताकि वो कर्बला तक पहुँच ही न सकें।
जनाब सुलेमान बिन सुरद ख़ुज़ाई रिज़वानुल्लाह तआला अलैह और जनाब मुख़्तार सक़फ़ी रिज़वानुल्लाह तआला अलैह भी उन अफ़राद में शामिल थे जो वाक़िया-ए-कर्बला के वक़्त क़ैद में थे।
लेकिन कर्बला गुज़रने के बाद उनके सामने एक ऐसा सवाल खड़ा हो गया जिससे फ़रार मुमकिन न था: क्या इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की नुसरत से महरूमी के बाद सिर्फ़ अफ़सोस काफ़ी है?
ये सवाल सिर्फ़ जनाब सुलेमान बिन सुरद रिज़वानुल्लाह तआला अलैह का नहीं था; ये कूफ़ा के उस इज्तेमाई ज़मीर का सवाल था जो कर्बला के बाद अपने आप को मुजरिम समझ रहा था।
तौबा का दरवाज़ा
जनाब सुलेमान बिन सुरद ख़ुज़ाई रिज़वानुल्लाह तआला अलैह ने लोगों को जमा किया। उन्होंने अपनी कोताही का एतराफ़ करते हुए कहा कि हम से ख़ता हुई कि हमने इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का साथ नहीं दिया, लेकिन अभी तौबा का दरवाज़ा बंद नहीं हुआ।
ये अल्फ़ाज़ सिर्फ़ एक तक़रीर नहीं थे; ये एक तहरीक की बुनियाद थे। लोग जमा हुए, अपनी साबिक़ा कोताही पर नादिम हुए और क़ातिलान-ए-हुसैन से इंतिक़ाम के लिए बैअत की। इसी लिए उन्हें तव्वाबीन कहा गया।
ये नाम अपने अंदर पूरी तहरीक की रूह समोये हुए था कि हम ख़ताकार थे; हमें अपनी ख़ता का कफ़्फ़ारा अदा करना है।
61 हिजरी से 64 हिजरी तक तव्वाबीन ने ख़ामोशी के साथ तैयारी की। बज़ाहिर वक़्त गुज़र रहा था, मगर हक़ीक़त में कर्बला के बाद एक नई मुज़ाहमत की फ़िक्र तश्कील पा रही थी।
कर्बला की तरफ़ वापसी
रबीउल अव्वल 65 हिजरी में जनाब सुलेमान बिन सुरद ख़ुज़ाई रज़वानुल्लाह तआला अलैह की क़यादत में तव्वाबीन का लश्कर कूफ़ा से रवाना हुआ।
लेकिन उनका पहला रुख़ दुश्मन के लश्कर की तरफ़ नहीं, बल्कि कर्बला की तरफ़ था। वो कर्बला पहुँचे। वहाँ शोहदा-ए-कर्बला की क़ब्रों के सामने खड़े हुए।
जिन लोगों ने इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की ज़िंदगी में उनकी नुसरत न की थी, वो अब उनकी क़ब्र के सामने अपनी बेबसी और कोताही का एतराफ़ कर रहे थे। आँखों में आँसू थे, दिलों में हसरत थी और ज़बानों पर तौबा। कर्बला में उस दिन सिर्फ़ चंद अफ़राद नहीं रो रहे थे; कूफ़ा का वो ज़मीर रो रहा था जो इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के साथ खड़ा न हो सका था। उनका गिरया महज़ ग़म का इज़हार नहीं था बल्कि अपने आप को बदलने का अहद भी था।
कर्बला से वो शाम की जानिब रवाना हुए, जहाँ उनका मक़सद क़ातिलान-ए-हुसैन से मुक़ाबला करना था।
ऐनुल वर्दा; जहाँ तौबा ने ख़ून का लिबास पहना
1 रबीउस्सानी 65 हिजरी को ऐनुल वर्दा के मक़ाम पर तव्वाबीन और अमवी लश्कर के दरमियान जंग हुई।
जंग से क़ब्ल जनाब सुलेमान बिन सुरद ख़ुज़ाई रिज़वानुल्लाह तआला अलैह ने हज़रत अमीरुल मोमेनीन अलैहिस्सलाम से मनक़ूल आदाब-ए-जंग के मुताबिक़ अपने जानशीन मुक़र्रर किये।
(अल-कामिल फ़ित-तारीख़, जिल्द 4, पेज 180-181)
जंग शुरू हुई। तलवारें चलीं। सफ़ें टकराईं। तव्वाबीन के जाँबाज़ एक के बाद दूसरे मैदान में उतरते और शहीद होते गए। उनके क़ायदीन यके बाद दीगरे शहीद होते गए, मगर कर्बला का ग़म उनके क़दम नहीं रोक रहा था।
आख़िरकार जनाब सुलेमान बिन सुरद ख़ुज़ाई रिज़वानुल्लाह तआला अलैह भी शहीद हो गए। रफ़ाआ बिन शद्दाद ने बाक़ी मानदा अफ़राद को जंग से रोक दिया और वो कूफ़ा वापस लौट आए।
(तारीख़ुल इस्लाम व वफ़यातिल मशाहीर वल-आलाम, जिल्द 1, पेज 48)
ऐनुल वर्दा ने तव्वाबीन से उनके बहुत से जाँबाज़ छीन लिये, लेकिन उनके ख़ून ने तारीख़ में एक नया बाब ज़रूर रक़म कर दिया।
क्या तव्वाबीन नाकाम हो गए?
अगर कामयाबी का मेयार सिर्फ़ मैदान-ए-जंग हो तो तव्वाबीन कामयाब नहीं हुए।
लेकिन अगर तारीख़ को सिर्फ़ तलवार के तराज़ू से न तोला जाए तो मंज़र मुख़्तलिफ़ नज़र आता है।
तव्वाबीन ने एक ऐसी रिवायत को जन्म दिया जिसमें कर्बला महज़ एक ग़मनाक वाक़िया नहीं रही बल्कि ज़ुल्म के ख़िलाफ़ अमली जद्दोजहद का सरचश्मा बन गई।
ये तहरीक बारिश के पहले क़तरे की मानिंद थी। पहला क़तरा शायद ज़मीन को सैराब न कर सके, लेकिन वो आने वाली बारिश की ख़बर ज़रूर देता है।
तव्वाबीन की शिकस्त के बाद कर्बला का इंतिक़ाम ख़त्म नहीं हुआ; बल्कि एक नए मरहले में दाख़िल हो गया।
मुख़्तार; एक नए मरहले की इब्तेदा
क़याम-ए-तव्वाबीन के दौरान जनाब मुख़्तार रिज़वानुल्लाह तआला अलैह क़ैद में थे। जब उन्हें जनाब सुलेमान बिन सुरद ख़ुज़ाई रिज़वानुल्लाह तआला अलैह और उनके साथियों की शहादत और तव्वाबीन की शिकस्त की ख़बर मिली तो उन्होंने बाक़ी मानदा अफ़राद से ताज़ियत की और उन्हें अपने आइंदा क़याम में शिरकत की दावत दी।
(तारीख़-ए-तबरी, जिल्द 5, पेज 606)
यूँ तव्वाबीन का ख़ून एक दूसरी तहरीक के लिए ज़मीन हमवार कर गया।
तव्वाबीन ने जिस सवाल को मैदान में उठाया था, क़याम-ए-मुख़्तार ने उसी सवाल को एक नए सियासी व अस्करी मरहले में आगे बढ़ाया।
कर्बला के बाद इंतिक़ाम की पहली मुसल्लह सदा अगर तव्वाबीन थे तो इस सदा की अगली गूँज क़याम-ए-मुख़्तार में सुनाई दी।
शिकस्त के असबाब
तारीख़ी वाक़ियात के मुतालेया से क़याम-ए-तव्वाबीन की नाकामी के कई असबाब सामने आते हैं:
1. जनाब मुख़्तार रिज़वानुल्लाह तआला अलैह का अदम-ए-तआवुन: जनाब मुख़्तार रिज़वानुल्लाह तआला अलैह जनाब सुलेमान बिन सुरद ख़ुज़ाई रिज़वानुल्लाह तआला अलैह के कुछ सियासी व अस्करी नज़रियात से मुत्तफ़िक़ नहीं थे और क़यादत के हवाले से भी उनका नुक़्ता-ए-नज़र मुख़्तलिफ़ था, इस लिए वो क़याम-ए-तव्वाबीन का हिस्सा नहीं बने।
2. शहादत को मक़सद-ए-क़याम का मरकज़ी हिस्सा बनाना: तव्वाबीन के एक बड़े हिस्से के लिए अपनी साबिक़ा कोताही का कफ़्फ़ारा अदा करना और शहादत हासिल करना बुनियादी जज़्बा था। इसके नतीजे में वसी सियासी और अस्करी हिक्मत-ए-अमली महदूद रही।
3. अस्करी क़ुव्वत में वाज़ेह तफ़ावुत: तव्वाबीन की तादाद और वसाइल उमवी लश्कर के मुक़ाबले में कम थे, जिसने जंग के नतीजे पर गहरा असर डाला।
4. पेचीदा सियासी हालात: उस ज़माने में मुख़्तलिफ़ सियासी क़ुव्वतें अपने अपने मफ़ादात के साथ सरगर्म थीं। आल-ए-ज़ुबैर और दीगर सियासी अवामिल ने भी तव्वाबीन की तहरीक के लिए हालात को मज़ीद पेचीदा कर दिया।
अलबत्ता तव्वाबीन की सबसे बड़ी मीरास उनकी अस्करी फ़तह नहीं बल्कि एहसास-ए-ज़िम्मेदारी था।
उन्होंने आने वाली नस्लों को ये बताया कि कर्बला सिर्फ़ आँसू बहाने का नाम नहीं; कर्बला अपने ज़मीर को ज़िंदा रखने का नाम भी है।
उन्होंने अपनी कोताही का एतराफ़ किया, तौबा की और फिर अपने एतराफ़ को अमल में बदलने की कोशिश की।
यही वजह है कि तव्वाबीन तारीख़ में सिर्फ़ एक शिकस्त-ख़ुर्दा लश्कर के तौर पर नहीं बल्कि कर्बला के बाद बेदार होने वाले ज़मीर की पहली मुसल्लह आवाज़ के तौर पर याद किये जाते हैं।
कर्बला 10 मोहर्रम 61 हिजरी को ख़त्म नहीं हुई थी। वो इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की शहादत के बाद इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम की इबादत में ज़िंदा रही। वो हज़रत ज़ैनब-ए-कुबरा अलैहा अस्सलाम की ख़िताबत में ज़िंदा रही। वो अहल-ए-हरम के आँसुओं में ज़िंदा रही। वो मदीना की अज़ादारी में ज़िंदा रही। और फिर वो कूफ़ा के उन दिलों में ज़िंदा हुई जिन्होंने अपनी कोताही का एतराफ़ किया।
तव्वाबीन इसी ज़िंदा कर्बला का पहला मुसल्लह इज़हार थे।
उन्होंने मैदान-ए-जंग में कामयाबी हासिल न की, मगर उन्होंने उस फ़िक्र को शिकस्त नहीं होने दी जो कर्बला के साथ पैदा हुई थी कि ज़ुल्म के सामने ख़ामोशी इख़्तियार करना इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के पैग़ाम के ख़िलाफ़ है।
इसी लिए तव्वाबीन का सफ़र कर्बला से ऐनुल वर्दा तक महज़ एक लश्कर का सफ़र नहीं था; ये निदामत से अज़्म, ख़ामोशी से मुज़ाहमत और शिकस्त से आने वाली तहरीकों तक पहुँचने वाला एक तारीख़ी सफ़र था। उनका ख़ून ज़मीन पर गिरा, मगर उसने तारीख़ के ज़मीर को जगाया। और तारीख़ का ये सबक़ आज भी बाक़ी है:
कर्बला के बाद सबसे बड़ा सवाल सिर्फ़ ये नहीं कि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को किस ने क़त्ल किया; बल्कि ये भी है कि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के बाद हमने हक़ के साथ क्या किया।
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