हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार, इमाम ए जुमआ क़ुम अलमुकद्देसा आयतुल्लाह सैयद मोहम्मद सईदी ने कहा कि आयतुल्लाहिल उज़्मा जवादी आमुली ने तफ़सीर तसनीम के अंतरराष्ट्रीय सेमिनार में ज़ोर देकर कहा कि हमारी ज़िम्मेदारी है कि इमाम और उम्मत के निज़ाम की हिफ़ाज़त करें क्योंकि इस्लामी क्रांति हज़रत वली-ए-असर अ.ज. की बरकतों और इनायतों से सफल हुई और हमें वर्तमान इमाम को इमामे ज़माना (अज) का उत्तराधिकारी समझना चाहिए।
क़ुम में नमाज़े जुमआ के ख़ुतबे में आयतुल्लाह सईदी ने तफ़सीर तसनीम के अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का हवाला देते हुए कहा कि रहबर-ए-मुअज़्ज़म ने इस तफ़सीर को शिया मक्तब और हौज़ा-ए-इल्मिया के लिए गर्व का कारण बताया है। उन्होंने कहा कि इस तफ़सीर में अक़ली (बौद्धिक) चिंतन के ज़रिए कुछ सूक्ष्म और गहरे क़ुरआनी मफ़ाहीम को बेहतर तरीके से समझा जा सकता है।
आयतुल्लाह सईदी ने आयतुल्लाह जवादी आमुली के हवाले से कहा कि यह कि शहीद सैयद हसन नसरुल्लाह ने दुनिया को हिला कर रख दिया यह सब क़ुरआन की बरकतों का नतीजा था। जब कोई व्यक्ति क़ुरआनी जीवनशैली अपनाता है और अहले बैत अ.स.के फ़रमानों पर अमल करता है तो उसे ऊँचा मुक़ाम हासिल होता है।
आयतुल्लाह सईदी ने ख़ुतबे में माहे रमज़ान की तैयारी की अहमियत को रौशन करते हुए कहा कि इमाम रज़ा अ.स.की एक हदीस में ज़िक्र है कि इस मुक़द्दस महीने में दाख़िल होने से पहले तौबा (इस्तिग़फ़ार), क़ुरआन की तिलावत और हुक़ूक़ुल इबाद (बंदों के हक़) अदा करना ज़रूरी है ताकि पाकीज़ा रूह के साथ इस महीने में दाख़िल हुआ जा सके।
उन्होंने आगे कहा कि तमाम लोगों को माहे रमज़ान की पवित्रता का सम्मान करना चाहिए और जो लोग किसी मजबूरी की वजह से रोज़ा नहीं रख सकते उन्हें भी ज़ाहिरी तौर पर इस महीने की हुरमत (सम्मान) का ख़याल रखना चाहिए।
इमामे जुमआ क़ुम ने अपने ख़ुतबे के अंत में मुसलमानों को इस्लामी क़द्रों क़ुरआनी तालीमात और विलायत-ए-फ़क़ीह के निज़ाम की हिफ़ाज़त पर ज़ोर दिया और कहा कि यही रास्ता इस्लामी समाज की स्थिरता और तरक्की का ज़ामिन (गारंटी) है।
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